Wednesday, May 18, 2022

सुकरात ( Socrates ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

सुकरात ( Socrates ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

सुकरात ( Socrates ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 469 ई ० पू ० से 399 ई ० पू ० 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "सद्गुण ही ज्ञान है" Knowledge is Virtue

प्रमुख उपाधि - विज्ञानों के विज्ञान का जनक 

प्रमुख कथन - मैं केवल एक बात जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता । 


          सुकरात का जन्म एथेंस में 469 ई. पू. में हुआ था और वे चौथीं शताब्दी ई. पू. के उत्तरार्ध में एथेन्स के सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा बनकर लगभग 70 वर्ष तक जीवित रहें । । उनकी मृत्यू 70 वर्ष की अवस्था में 399 ई. पू. में हुई थी । वह एक मूर्तिकार और धाय ( दाई ) को लड़के थे । वह कहा करते थे कि उसकी ( दार्शनिक ) कला उसकी माँ के समान धाय की कला, जिससे बच्चे के जन्म के समान सत्य का जन्म ( उत्पन्न ) होता है, जैसी है । सुकरात की आवाज किसी के भी अन्तःकरण की आवाज मान ली गयी थी, जो यह संकेत करता है कि ईश्वर का प्रतिनिधि और कुछ सीमा तक रहस्यवादी मान मिला गया था । वे एथेंस के एक निष्ठावान नागरिक थे । उन्होंने अपनी वयस्कावस्था को एथेंस में प्रायः नीतिशास्त्र, धर्म और राजनीति से सम्बन्धित खुले दार्शनिक वाद-विवादों में बिताया ।

         सुकरात ने निम्नलिखित प्रसगों से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए होमर, हेसियड आदि सम्मानित कवियों के विचारों को उचित आधार भूमि मानने की परंपरागत दृष्टि का विरोध किया । इसके बजाय, उन्होंने इस बात पर बल दिया कि व्यक्तिगत खोज और तर्कपूर्ण बहस ही इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने का उचित आधार हो सकता है । उनका विश्वास था कि उन्हें प्रत्येक तथाकथित बुद्धिमान मनुष्यों या दूसरे शब्दों में ज्ञान के स्थापित प्राधिकरणों एवं परंपराओं की विवेचना से ज्ञान प्राप्त करने का देवीय उत्तरदायित्व प्राप्त है । विद्वान व्यक्तियों की विवेचना के द्वारा ज्ञान प्राप्ति के दैविय मिशन ने उन्हें संकट में डाल दिया । इस ज्ञान की खोज ने उन्हें एक परम ईश्वर को मानने के लिए प्रेरित किया, जो तत्कालीन ईश्वर की यूनानी अवधारणा से मेल नहीं खाता था । समाज के सत्ताधारियों ने इसे विध्वंसात्मक समझा, क्योंकि उनके अनुसार यह प्रचलित मान्य विश्वासों को क्षति पहुंचाने वाला था । इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें न्यायालय के समक्ष निम्न तीन अभियोगों के लिए मुकदमें का सामना करना पड़ा –

  1. राष्ट्रीय देवों की अस्वीकृति 
  2. नए देवों की स्थापना का प्रयास
  3. युवाओं को पथभ्रष्ट करना 

       यद्यपि, उन्होंने इन सभी अभियोगों को अपना पक्ष रखते हुए नकार दिया, लेकिन फिर भी 399 ई. पू. में उन्हें मृत्यु दण्ड दे दिया गया । इस महान एथेनियन विचारक के अन्तिम शब्द थे "वह वक्त आ गया है कि मैं मरने वाला हूँ और आप जीवित रहेंगे, मगर किसकी नियति में ज्यादा खुशी लिखी है, वह ईश्वर को छोड़ कोई नहीं जानता ।"

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जॉर्जियास ( Gorgias ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

जॉर्जियास ( Gorgias ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

जॉर्जियास ( Gorgias ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- इनमे से किस दार्शनिक ने सत्य की व्याख्या व्यक्ति के सापेक्ष रूप में की है ?

  1. प्रोटोगोरस 
  2. डेमोक्रेटस 
  3. हेराक्लिटस 
  4. जॉर्जियास 


जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन

जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन 

जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन  

तत्वमीमांसा

        शुरूआती दौर में गोर्जियास की एम्पीडोकल्स और प्राकृतिक विज्ञानों के दर्शन में दिलचस्पी थी । सामान्यतः यह माना जाता है कि उन्होंने ऑप्टिक्स ( प्रकाश विज्ञान ) पर एक पुस्तक लिखी थी । बाद में वह जीनो के तर्कशास्त्र द्वारा संशयवाद की ओर आकर्षित हो गए और उन्होंने ऑन नॉट बीइंग ओर नेचर ( On Not - being or Nature ) के शीर्षक से एक पुस्तक लिखी । उनकी पुस्तक से पता चलता है कि गोर्जियास ने एलियाई तर्कशास्त्र पर प्रोटागोरस की अपेक्षा भिन्न तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त की थी । जहां प्रोटागोरस का मानना था कि सब कुछ सत्य है, वहीं गॉर्जियास ने पूर्ण शून्यवाद पर जोर दिया । इस सिद्धान्त के तीन आधारभूत तर्कवाक्य इस प्रकार है

  1. कुछ भी अस्तित्वमान नहीं है
  2. यदि कुछ है, तो वह जाना नहीं जा सकता
  3. यदि किसी प्रकार का ज्ञान हो भी जाय, तो इस ज्ञान को अन्य लोगों को संज्ञापित नहीं किया जा सकता है ।

       इसमें कोई दोराय नहीं कि ये विचार मूलतः बहुत उत्तेजक है । लेकिन क्या गॉर्जियास ने इन्हें गंभीरता से अपनी तत्वमीमांसा के रूप में प्रस्तुत किया था ? कुछ का विचार है कि उन्होंने ऐसा किया था । अन्य ने इसे एक मजाक के रूप में और यह माना कि उनका उद्देश्य यह दर्शाना मात्र था कि शब्दों के चार्तुयपूर्ण उपयोग द्वारा क्या किया जा सकता है । निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि गॉर्जियास एलिया के द्वंद्ववाद का उपयोग एलिया के दर्शन को अर्थहीन सिद्ध करने के लिए करना चाहते थे । बाद में गॉर्जियास दर्शन को त्याग कर व्याख्यान विद्या का अध्ययन करने लगे थे ।

व्याख्यान शास्त्र ( Rhetoric )

        गॉर्जियास ने देखा कि व्याख्यान शास्त्र में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को लोगों को सहमत करने की कला में पारंगत होना चाहिए और इसके लिए व्यवहारिक मनोविज्ञान का बारीकी से अध्ययन करने की आवश्यकता होती है । उन्होंने जानबूझकर परामर्श देने की कला का अभ्यास किया, जिसका उपयोग व्यवहारिक और कलात्मक कार्यों दोनों के लिए किया जा सकता था । कलात्मक उपयोग के संदर्भ में गॉर्जियास ने न्यायसंगत छल की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसका 'त्रासदी' स्पष्ट उदाहरण था । दर्शक पर 'त्रासदी' की शक्ति की तुलना भाव-विरेचन ( Purgative ) के प्रभाव से की जा सकती है, जो किसी को भी अरस्तू के 'कथार्सिस' के सिद्धान्त की याद दिलाता है ।

जॉर्जियास ( Gorgias ) के प्रमुख दार्शनिक विचार 

  • सत्य सापेक्ष ही है, निरपेक्ष सत्य असम्भव है । 
  • प्रथम तो कोई सत्य नहीं है, द्वितीय यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते, तृतीय यदि जान भी ले तो उसे दूसरे को नहीं समझा सकते । 
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गोर्जियास ( Gorgias ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

गोर्जियास ( Gorgias ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

गोर्जियास ( Gorgias ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 483 ई० पू० से 375 ई० पू० 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "सत्य सापेक्ष ही है, निरपेक्ष सत्य असम्भव है"

प्रमुख उपाधि - भयंकर बालक ( Infant Terrible ) 

प्रमुख कथनप्रथम तो कोई सत्य नहीं है, द्वितीय यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते, तृतीय यदि जान भी ले तो उसे दूसरे को नहीं समझा सकते । 

    गोर्जियास जन्म से सिसिलीवासी थे । वे 427 ई. पू. में एथेन्स में अपने निवासी राष्ट्र के राजदूत के रूप में आए थे । वे सर्वव्यापी यूनानी संस्कृति के पुरोधा थे । गोर्जियास को भयंकर बालक ( Infant Terrible ) की उपाधि मिली । उनके अनुसार सत्य सापेक्ष ही है, निरपेक्ष सत्य असम्भव है । उनका मत है कि प्रथम तो कोई सत्य नहीं है, द्वितीय यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते, तृतीय यदि जान भी ले तो उसे दूसरे को नहीं समझा सकते । 

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Tuesday, May 17, 2022

प्रोटागोरस ( Protagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न


प्रोटागोरस ( Protagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

प्रोटागोरस ( Protagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- "मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मानदण्ड है" यह कथन किसका है ?

  1. डेमोक्रेटस 
  2. पाइथागोरस 
  3. प्रोटोगोरस 
  4. जॉर्जियास 

2- इनमें से किस दार्शनिक ने सत्य की व्याख्या व्यक्ति सापेक्ष के रूप में की है ?

  1. प्रोटोगोरस 
  2. डेमोक्रेटस 
  3. हेराक्लेटस 
  4. जॉर्जियास 

3- प्रोटोगोरस के अनुसार सद्गुण और सुख -

  1. परस्पर अभिन्न नहीं है  
  2. परस्पर भिन्न है  
  3. भिन्न और अभिन्न दोनों है  
  4. इनमें से कोई नहीं 

4- प्रोटोगोरस के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही है ? सही कूट का चयन कीजिए - 

  1. मनुष्य सभी वस्तुओं का मानदंड है । 
  2. सत्य वस्तुनिष्ठ है । 
  3. एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है यह आवश्यक नहीं कि दुसरें के लिए भी सत्य हो । 
कूट 

  1. केवल 1 
  2. 1 और 2 
  3. 1 और 3 
  4. 2 और 3 
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प्रोटागोरस ( Protagoras ) का दर्शन

प्रोटागोरस की ज्ञानमीमांसा

        प्रोटागोरस को सबसे अधिक अपने इस कथन के लिए जाना जाता है कि "मानव सभी बातों का मापदंड है, जो है वह वास्तविक है और जो नहीं है वह वास्तविक नहीं है ।" यहाँ पर 'मनुष्य' और 'वस्तु' शब्द के अर्थ अत्यन्त विवाद के विषय है । प्लेटो की थिएटेटस में प्रोटागोरस के उपर्युक्त कथन की बोध की अनुभूति के संदर्भ में वैयक्तिक बोध के रूप में व्याख्या की गई है । जब कहीं पवन बहती है तो उससे किसी को ठंडा लग सकती है और किसी को नहीं । सुकरात के अनुसार क्या हमें प्रोटागोरस से सहमत होना चाहिए कि पवन उसके लिए ठंडी है जिसे सर्दी लग रही है और उसके लिए नहीं है, जिसे सर्दी नहीं लग रही है । इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रोटागोरस के कथन को व्यक्तिगत मनुष्य के अर्थ में लेना चाहिए, विशिष्ट मनुष्य के रूप में नहीं । यही नहीं, ध्यान इस बात पर भी दिया जाना चाहिए कि सोफिस्टों का अर्थ यह नहीं था कि पवन ठंडी प्रतीत होती है, बल्कि यह था कि वह एक व्यक्ति के बोध की अनुभूति के लिए ठंडी हो सकती है, जबकि दूसरे के लिए नहीं भी हो सकती है ।

प्रोटागोरस का नीतिशास्त्र

        प्लेटों के अनुसार, प्रोटागोरस परंपरा और सामाजिक रीतिरिवाजों को समृद्ध करने वाले प्रतीत होते हैं । उन्होंने शिक्षा के महत्व तथा राष्ट्र की नैतिक परंपराओं को आत्मसात् करने के महत्व पर अत्यधिक बल दिया और साथ ही इस बात को भी माना कि ज्ञानी लोग राष्ट्र के लिए बेहतर कानून बना सकते हैं । जहां तक व्यक्तिगत नागरिकों की बात है, तो उचित आचरण परंपरा के प्रति निष्ठावान और समुदायिक नियमावली की स्वीकृति में निहित होता है । ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई एक मार्ग दूसरे से अधिक सत्य नहीं होता है । प्रोटागोरस के शब्दों में कहे तो, “राष्ट्र के कानून के विरूद्ध अपना निजी निर्णय न स्थापित करें, क्योंकि कोई भी संहिता दूसरे से अधिक सत्य नहीं होती है” । इस प्रकार, प्रोटागोरस परंपरा ओर रीतिरिवाजों के संदर्भ में अपने सापेक्षवाद का मेल कराने में सक्षम हैं, ऐसा सापेक्षतावाद जिसे अनेक व्यक्तियों द्वारा सोद्देश्य रूप से क्रांतिकारी माना गया है ।

प्रोटागोरस का धर्म विचार

       प्रोटागोरस की पुस्तक ‘ऑन द गॉड्स’ के सिर्फ कुछ अंश ही हमारे पास उपलब्ध है । इन अंशों में उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व और प्रकृति के संदर्भ में विशिष्ट संशयवाद को अभिव्यक्त किया है । इस प्रकार के कथनों की व्याख्या आसानी से धर्म में आस्था के विरोधी के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है । यद्यपि, वास्तव में ऐसा नहीं है । प्रोटागोरस में सोफिस्ट उस समय अपनी नैसर्गिक आस्था की अधीनता की स्तुति करते हैं, जब वह राष्ट्र के कानूनों के पालन की वकालत करते हैं । इसी प्रकार, यदि हम पूर्ण सत्य को लेकर निश्चित नहीं हो सकते हैं, तो हमें अपने पूर्वजों के धर्म को नकारने का कोई अधिकार नहीं है । किसी भी कीमत पर, प्रोटागोरस की सोच वास्तव में इतनी विध्वंसक नहीं है जितनी कि धार्मिक रूढीवादी सोचते हैं । वास्तविकता यह है कि यूनानी धर्म तार्किक आस्था पर आधारित नहीं था । उनका मुख्य जोर पूजा पर था, न कि धर्म सैद्धान्तिक अनुमोदनों या खंडनों पर यद्यपि सोफिस्ट चिंतन की सामान्य प्रकृति मनुष्य की परंपरा में आस्था को कमजोर करना था । प्रोटागोरस स्वंय स्वभाव से रूढ़िवादी थे और उनकी क्रांतिकारियों को शिक्षित करने की कोई मंशा नहीं थी । इसके विपरीत, उनका दावा था कि उनका काम अच्छे नागरिकों को शिक्षित करना है । सभी मनुष्यों में जन्मजात नैतिक प्रवृत्तियां सिर्फ संगठित समाजों में ही फलीभूत होती हैं । इसलिए एक अच्छे नागरिक को सामाजिक परंपराओं को आत्मसात् करके अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए । माना कि यह परंपरा पूर्ण सत्य नहीं है, लेकिन यह अच्छे नागरिक के लिए एक मानक है ।

प्रोटागोरस ( Protagoras ) के प्रमुख दार्शनिक विचार 

  • मानव सभी बातों का मापदंड है । 
  • सद्गुण और सुख परस्पर अभिन्न नहीं है ।
  • जो है वह वास्तविक है और जो नहीं है वह वास्तविक नहीं है ।
  • एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है यह आवश्यक नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सत्य हो । अतः सत्य व्यक्तिनिष्ठ होता है । 
  •  राष्ट्र के कानून के विरूद्ध अपना निजी निर्णय न स्थापित करें, क्योंकि कोई भी संहिता दूसरे से अधिक सत्य नहीं होती है । 


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प्रोटागोरस ( Protagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

प्रोटागोरस ( Protagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

प्रोटागोरस ( Protagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 481 ई० पू० से 411 ई० पू० 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "मानव सब पदार्थों का मानदण्ड है" 

प्रमुख उपाधि - उपयोगितावाद के जन्मदाता 

प्रमुख कथन - एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है यह आवश्यक नहीं कि वह दूसरे के लिए भी सत्य हो अतः सत्य व्यक्तिनिष्ठ होता है । 

    प्रोटागोरस का जन्म लगभग 481 ई. पू. में थ्रेस के एन्डेरा में हुआ था । ऐसा माना जाता है कि वे शताब्दी के मध्य में किसी समय एथेन्स आए थे । पेरीकल्स ने उन्हें 444 ई. पू. में स्थापित किये गए थूरियो के उपनिवेश के संविधान को बनाने का काम सौंपा । वह 431 में और 430 के प्लेग के दौरान एथेन्स वापस चले आए । प्लेग के कारण पेरीकल्स के दो पुत्रों की मृत्यू हो गयी । ऐसा कहा जाता है कि प्रोटागोरस पर ईश्वर पर लिखी उनकी अपनी पुस्तक के कारण ईशनिन्दा का आरोप लगाया गया, परन्तु वे मुकदमें से पहले ही देश छोड़ कर भाग गए तथा सिसली को जाते समय डूब कर मर गए । 

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