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जॉर्जियास ( Gorgias ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

  जॉर्जियास ( Gorgias ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न  जॉर्जियास ( Gorgias ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न  1- इनमे से किस दार्शनिक ने सत्य की व्याख्या व्यक्ति के सापेक्ष रूप में की है ? प्रोटोगोरस  डेमोक्रेटस  हेराक्लिटस  जॉर्जियास 

जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन

जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन  जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन    तत्वमीमांसा         शुरूआती दौर में गोर्जियास की एम्पीडोकल्स और प्राकृतिक विज्ञानों के दर्शन में दिलचस्पी थी । सामान्यतः यह माना जाता है कि उन्होंने ऑप्टिक्स ( प्रकाश विज्ञान ) पर एक पुस्तक लिखी थी । बाद में वह जीनो के तर्कशास्त्र द्वारा संशयवाद की ओर आकर्षित हो गए और उन्होंने ऑन नॉट बीइंग ओर नेचर ( On Not - being or Nature ) के शीर्षक से एक पुस्तक लिखी । उनकी पुस्तक से पता चलता है कि गोर्जियास ने एलियाई तर्कशास्त्र पर प्रोटागोरस की अपेक्षा भिन्न तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त की थी । जहां प्रोटागोरस का मानना था कि सब कुछ सत्य है , वहीं गॉर्जियास ने पूर्ण शून्यवाद पर जोर दिया । इस सिद्धान्त के तीन आधारभूत तर्कवाक्य इस प्रकार है – कुछ भी अस्तित्वमान नहीं है यदि कुछ है , तो वह जाना नहीं जा सकता यदि किसी प्रकार का ज्ञान हो भी जाय , तो इस ज्ञान को अन्य लोगों को संज्ञापित नहीं किया जा सकता है ।        इसमें कोई दोराय नहीं कि ये विचार मूलतः बहुत उत्तेजक है । लेकिन क...

गोर्जियास ( Gorgias ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

गोर्जियास ( Gorgias ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां  गोर्जियास ( Gorgias ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां  दार्शनिक जीवन - 483 ई० पू० से 375 ई० पू०  प्रमुख दार्शनिक विचार - "सत्य सापेक्ष ही है, निरपेक्ष सत्य असम्भव है" प्रमुख उपाधि - भयंकर बालक ( Infant Terrible )  प्रमुख कथन -  प्रथम तो कोई सत्य नहीं है, द्वितीय यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते, तृतीय यदि जान भी ले तो उसे दूसरे को नहीं समझा सकते ।      गोर्जियास जन्म से सिसिलीवासी थे । वे 427 ई. पू. में एथेन्स में अपने निवासी राष्ट्र के राजदूत के रूप में आए थे । वे सर्वव्यापी यूनानी संस्कृति के पुरोधा थे ।  गोर्जियास को भयंकर बालक ( Infant Terrible ) की उपाधि मिली । उनके अनुसार सत्य सापेक्ष ही है, निरपेक्ष सत्य असम्भव है । उनका मत है कि प्रथम तो कोई सत्य नहीं है, द्वितीय यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते, तृतीय यदि जान भी ले तो उसे दूसरे को नहीं समझा सकते ।  -------------