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| अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन |
अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन
तर्क शास्त्र
अरस्तू तर्क शास्त्र के क्षेत्र के वास्तविक अन्वेषक थे । आज भी उनके तर्क शास्त्र का अनुसरण किया जाता है । अरस्तू के अनुसार तर्क शास्त्र सही चिंतन की कला है और इसलिए इससे सत्य की प्राप्ति होती है । तर्कशास्त्र की अन्य विषयों की भांति कोई विशेष विषयवस्तु नहीं होती है, लेकिन यह अन्य विषयों के लिए एक साधन तथा यंत्र की भांति कार्य करता है ।
व्यवस्थापन
अरस्तू ने तर्कशास्त्र के व्यवस्थापन पर काफी काम किया । वे इस तथ्य पर ध्यान देने वाले पहले व्यक्ति थे कि मस्तिष्क की एक निश्चित मूल संरचना और विधि होती है और उन्होंने वह ( मस्तिष्क ) क्या है और कैसे कार्य करता है, इसे बताने का प्रयास किया । उनके अनुसार मस्तिष्क के कार्य करने के तीन मूल घटक होते हैं अवधारणा, निर्णय और तर्क ।
अरस्तू के अनुसार अवधारणा वह है, जिसमें आधार वाक्य यानि निर्धारक और वह जिसका यह निर्धारण करता है दोनों का संकल्प होता है । उन्होंने फिर अवधारणा को उसके 10 संवर्गों या भिन्न प्रकारों में व्यवस्थित किया । अतः अवधारणा विषय का विधेय ( निर्धारक ) होती है और उसका सार या मात्रा, गुण, संबंध, स्थान, समय, स्थिति, प्रकृति, कार्य या आवेग को बताती है ।
- वस्तु - मनुष्य, घोड़ा, मेज आदि
- मात्रा - दो फुट लंबा, तीन फुट लंबा
- गुण - सफेद, पढ़ालिखा
- संबंध - दोगुना, आधा या अधिक
- स्थान - लाइसियम में, बाजार में
- समय – बीता हुआ कल, पिछले वर्ष
- मुद्रा - मेज पर झुका हुआ, बैठी ( स्थिति )
- अवस्था - जूते पहने हैं, कवच में है ( प्रकृति )
- कुछ कर रहा है - कटाई, आग जलाना ( क्रिया )
- किसी विशेष स्थिति से गुजर रहा है - काटे जाना, जलाया जाना ( भावना )
उन्होंने सावधानी से परीक्षण किया कि जब हम निर्णय लेते हैं, तो क्या होता है और अनुभव किया कि अकेला यह ( निर्णय ) ही सत्यता या असत्यता का स्रोत है । फिर उन्होंने उनकी गुण ( सकारात्मक और नकारात्मक ) मात्रा ( सर्व विशेष और एकल ) तथा रूपात्मकता ( वास्तविक , आवश्यक सम्भावना ) की जाँच की । उन्होंने निर्णयों के विनिमय का भी अध्ययन किया । तर्क की भांति ही उन्होंने न्यायवाक्यों का उनके मूल प्रकारों में अपचयन करके सबसे सामान्य तर्कदोषों और तार्किकता का खुलासा किया । अंत में उन्होंने यह पता लगाने का प्रयास किया कि किस प्रकार सार्वभौमिक आधार वाक्य बनते हैं और किस प्रकार वैज्ञानिक ज्ञान का आगमनिक तर्क, संवाद, प्रदर्शन और समस्याओं के समाधान के द्वारा आगे विकास किया जा सकता है ।
परिभाषाएँ
पदों के अर्थ सम्बंधित उलझन एक प्रमुख कारक है जो असहमति आदि के लिए उत्तरदायी होते हैं । अरस्तू ने उचित परिभाषा के लिए नियम बनाए और इसके लिए कुछ बहुत अच्छे उदाहरण भी दिए । जैसे कि
- गति - "संम्भावित ऊर्जा या उद्देश्यों की पूर्ती, जिस सीमा तक यह संभावना के रूप में विद्यमान है, गति कहलाती है”।
- समय - "पहले और बाद के क्रम में गति का मापन है" ।
विश्व-दर्शन
अरस्तू ने प्लेटो के प्रत्ययों के सिद्धांत के विरुद्ध अनेक तर्क प्रस्तुत किए । प्लेटो के सिद्धांत के अनुसार निषेधों और संबंधों के भी फोर्म होने चाहिए । परन्तु अरस्तू के अनुसार प्रत्ययों का सिद्धांत निर्थक है । यह एक असंभव सिद्धांत है कि तत्व ( पदार्थ ) और जिसका वह तत्व है, अलग-अलग पाए जाएं । पदार्थ (Substance) और गुण हम तत्वमीमांसा को गहराई से समझे बिना इन दोनों में अंतर करते हैं । पदार्थ वह है जो विषय का निर्धारक नहीं होता है, बल्कि जिससे हर वस्तु का निर्धारण किया जाता है । अथवा इसे दूसरे तरीके से कहे तो यह "वह है जो प्रथमतः विद्यमान है और जिससे होने की सभी श्रेणियाँ संदर्भित होती हैं ।" गुण वह है जो "किसी चीज से संबद्ध होते हैं और जिनका वास्तविक रूप से या तो आवश्यक रूप से या सामान्य रूप से निर्धारण किया जा सकता है ।"
कार्य और संभाव्यता/सामर्थ्यता का सिद्धांत
यह सिद्धांत पारमेनाइड्स द्वारा गति और बहुगुणता के विरुद्ध उठाए गए प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अत्यधिक तात्विक आधार प्रदान करता है । पारमेनाइडस और अन्य दार्शनिक ऐसे सत् और असत् की बात करते थे, जिनकी कोई और श्रेणी नहीं थी और जिसका निहितार्थ यह था कि किसी वस्तु के अस्तित्व के लिए उसको सिर्फ शुद्ध और सहज रूप से सत् या असत् होना चाहिए । मूलरूप से यह सिद्धांत उस स्थिति पर आधारित था कि कोई वस्तु निश्चित रूप से दो ही प्रकार की हो सकती है वह या तो ऐसे प्रकार की ( सामर्थ्य ) या वह वैसे प्रकार की हो सकती है । प्रत्येक परिवर्तन से तात्पर्य यह है कि परिवर्तित होने वाली वस्तु में होने वाले परिवर्तन की सम्भाव्यता विद्यमान है । अंत में, किसी परिवर्तन का अर्थ उसमें मौजूद सामर्थ्य के वास्तविकीकरण से होता है । अतः उसकी सामर्थ्य वास्तविकीरण ( या कार्य ) के संदर्भ में उसकी क्षमता होती है, जबकि कार्य ( या वास्तविकीकरण ) किसी प्रकार की पूर्णता या गुणवत्ता होती है । सामर्थ्य निष्क्रिय हो सकती है, उदाहरण के लिए, ध्वनि को सुना जा सकता है अर्थात् सुने जाने की निष्क्रिय सामर्थ्य सक्रिय सामर्थ्य कार्य करने की शक्ति या क्षमता होती है । ( उदाहरण कान में सुनने की सक्रिय सामर्थ्य होती है ) । ये ध्यान दिया जाना चाहिए कि निष्क्रिय सामर्थ्य भी किसी न किसी रूप में संबंधित वस्तु की ओर से पूर्व निर्धारित होती है । उदाहरण के लिए, ध्वनि में सुने जाने की निष्क्रिय सामर्थ्य होती है, जबकि रंग में यह नहीं होती । कार्य और सामर्थ्य के इस सिद्धांत के अरस्तू के दर्शन शास्त्र में अनेक निहितार्थ हैं ।
सत् शुद्ध कार्य है, इसमें कोई अपूर्ण संम्भाव्यता शेष नहीं है, जिसका की अनुभव करना बाकी हो । यह स्वयं में पूर्णता है । इसी प्रकार का सत् ईश्वर होना चाहिए । फलक के दूसरे सिरे पर महज सामर्थ्य/सम्भाव्यता प्रधान तत्व होता है । इनके बीच में मिश्रित कार्य और हमारे दैनिक अनुभव होते हैं । इनमें कुछ पूर्णता ऐसी होती है जिनका अनुभव वास्तव में हो चुका है, लेकिन इनमें अनेक सामर्थ्य पूर्णता को अर्जित करने या खोने की भी होती है । ये सब परमेनाइड्स और उनके मतानुयायीयों द्वारा गति और अनेकता पर उठाए गए प्रश्नों के समाधान हैं ।
चार कारण
अरस्तू का कारण सिद्धांत उसके एक दूसरे सिद्धांत कार्य और सामर्थ्य को समाहित किये हुए है । अरस्तू ने अनुभव किया कि मनुष्य तभी संतुष्ट हो सकते हैं, जब वे किसी वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त कर ले और जब वे वस्तु के पीछे के कारण को समझ ले । वस्तुतः हम जो कुछ भी देखते हैं उसके चार सिद्धांत या कारण होते हैं, जो उसे प्रभावित करते हैं । प्रथमतः दो आन्तरिक कारण होते हैं । ये आन्तरिक कारण इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि वे कार्य से अपर्याप्त रूप से विभेदित होते हैं । ये दो कारण हैं - उपादान कारण ( वह जिससे ये कोई वस्तु बनी है ), उदाहरण के लिए मेज की लकड़ी, और औपचारिक या आकारिक कारण ( जो किसी वस्तु को वैसा बनाते हैं जैसी वह है, उदाहरणार्थ लकड़ी का रूप लकड़ी को लकड़ी बनाता है ) । फिर दो बाह्य कारण होते हैं जो अपने कार्य से पूर्ण रूप से स्वतन्त्र होते हैं किन्तु ये आरंभ करने वाले होते हैं । ये है, निमित्त कारण, उदाहरणार्थ मेज के संदर्भ में बढ़ई, और प्रयोजन या अंतिम कारण ( वह कारण जिसके लिए कार्य उत्पन्न होता है जैसे बढ़ई के मेज बनाने के लिए धन ।
अरस्तू ने दिखाया कि कैसे उपादान कारण आकारिक कारण के सन्दर्भ में ठीक ऐसे ही सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है जैसे कि 'मैटर’ ‘फौर्म’ के लिये करता है ।
प्रथम-दर्शन
प्रथम दर्शन तत्वमीमांसा भी कहलाता है। यह सभी वस्तुओं के चरम सिद्धांत और कारणों का अध्ययन करता है, वे क्या है ?
यह सत् प्लेटो के 'फोर्म' ( आकार ) नहीं है
'फोर्म' संभवतः एक ही प्रकार के अनेक जीवों में पाई जाने वाली समानता को प्रदर्शित करती है और अपने आप में स्वतन्त्र रूप से वैयक्तिक वास्तविकताएं होती हैं । लेकिन अरस्तू के अनुसार यह स्थिति विरोध उत्पन्न करती है । यदि फौर्म वास्तव में विशेषीकृत सत् ( पदार्थ ) है तो यह मानना निर्थक है कि ये अन्य दूसरे विशेषीकृत पदार्थों से कोई भागीदारी कर सकती है । अंत में, हम किसी भी प्रकार से यह ज्ञात नहीं कर सकते कि किस प्रकार 'फौर्म', जो शाश्वत् रूप से अपरिवर्तनीय हैं, परिवर्तित होती है । जबकि ये स्वयं विश्व में घटित सभी घटनाओं का मूल सिद्धांत और आदि कारण मानी जाती है ।
गणित के सम्बंध में स्थिति
'फौर्म' का सबसे उचित तर्क गणितीय प्रकृति का प्रतीत होता है । क्या गणित का प्रत्यय (फौर्म) अपने आप में वर्ग से तथा अपने आप मे त्रिकोण से संबंध रखता है ? अरस्तू मानते हैं कि गणित से लेकर प्लेटो की फौर्म तक प्राकृतिक जगत से स्वतंत्र और कोई तार्किक सत् नहीं है । गणित प्राकृतिक विज्ञान की भांति एक विज्ञान है । इसमें प्राकृतिक वस्तुओं के सिर्फ कुछ अमूर्त रूपों का अध्ययन बिना यह माने किया जाता कि ऐसे अमूर्तरूप स्वयं वस्तु होते हैं । गणित या रेखागणित में समझने के लिए संकल्पनात्मक रूप से गुणों का पृथककरण किया जाता है ।
पदार्थ ( मैटर ) और आकार ( फौर्म )
पदार्थ वह है जो मूल आधार या प्राथमिक रूप से होता है । वह क्या है , जो किसी वस्तु को पदार्थ बनाता है ? प्राकृतिक वस्तुएं मैटर और फौर्म की बनी होती है । क्या यह मैटर है, जो किसी पदार्थ को वस्तु बनाता है । ऐसा नहीं है । मैटर आकार से पृथक होकर सिर्फ संभावय होकर रह जाता है । मूल तत्व से यह अपने आप में कोई वस्तु नहीं है । इसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हो सकता है । यह आकारिक रूप में ही पाया जाता है । अतः यह मैटर नहीं है, जो किसी वस्तु को वैसा बनाता है जैसी वह है । तब, क्या यह फौर्म हो सकता है ? अरस्तू के अनुसार यह फौर्म ही है ।
पदार्थों के भौतिक रूप के लिए उत्तरदायी फौर्म को उन्होंने वस्तु का सार कहा है । सार की अभिव्यक्ति उन परिभाषाओं से होती है, जो हमें बताती हैं कि वस्तुएं क्या है ? अतः फौर्म वस्तुओं का सार है । लेकिन पदार्थ वह है, जो स्वतंत्र रूप से एक अलग इकाई के रूप में रह सकता है । इससे एक बहुत ही दिलचस्प संभावना पैदा होती है कि क्या ऐसा पदार्थ भी हो सकता है, जो मैटर और फौर्म के योग से न बना हो ? क्या ऐसे पदार्थ भी हो सकते हैं जो शुद्ध आकार हो ? उत्तर है, पूरी प्रकृति भौतिक पदार्थों की बनी है, जिसमें मैटर उसमें पाए जाने वाले फौर्म की उपस्थिति द्वारा किसी निश्चित आकार में निरूपित होता है ।
ईश्वर-विचार
प्रकृतिक जगत में सबसे अच्छी चीजें वे होती हैं जो आदर्शों के सबसे समीप होती है । अरस्तू का मानना था कि ये खगोलीय पिंड हैं, जो निरंतर वृहत वृत्तों में घूमते रहते हैं । लेकिन ऐसी अनवरत गति भी स्व-व्याख्यात्मक नहीं है । मेटाफिजिक्स में अरस्तू ने कहा है कि कोई ऐसी वस्तु है जो सदैव अविराम रूप से गति करती रहती है और यह गति वृत्तीय होती है और ... इसलिए प्रथम दैवीय सत् अवश्य ही अनंत होगा । तब कुछ ऐसा अवश्य होना चाहिए जो इसे गति उत्पन्न करता है । लेकिन चूँकि वह गति करता है तथा गतिशील वस्तुएं मध्यवर्ती होती हैं । अतः कुछ ऐसा अवश्य है जो स्वयं स्थिर रहते हुए विश्व को गति प्रदान करता हो, जो अनन्त हो । यही वास्तविक सत् होगा ।
प्राकृतिक जगत, जिसमें खगोलीय पिंडों की अनंत गति है, क्या इसका कोई अनंत और चरम चालक है ? अरस्तू का कहना है कि ऐसा अवश्य ही होगा अन्यथा हम किसी भी वस्तु की गति के विषय में कुछ भी नहीं बता सकते हैं । सभी 'चालक' 'मध्यवर्ती' चालक नहीं हो सकते हैं । क्योंकि ऐसा होने पर यह श्रृंखला अनंत तक चलती जाऐगी, लेकिन अनंत रूप से अनेक वस्तुओं की वास्तव में गणना नहीं हो सकती है । अतः अवश्य ही कुछ ऐसा है, जो स्वयं बिना गति किए चीजों को गति प्रदान कराता हैं ।
यही नहीं, हम उसके विषय में कुछ निश्चित तथ्य अवश्य जान सकते हैं । यह स्वयं में अनंत है, चूँकि यह स्वर्गीक पिंडों की अनंत गति के लिए उत्तरदायी है और इसलिए उनसे अधि क व्यापक है । यह अनिवार्य रूप से पदार्थ होगा, क्योंकि जिस पर अन्य पदार्थ निर्भर करते हों वह उन निर्भर पदार्थों से कम नहीं हो सकता है । निःसंदेह, यह पूर्णतः वास्तविक है, अन्यथा इसके जो अचल चालक होने का दावा किया जाता है, उसके लिए और आगे किसी अन्य चालक की आवश्यकता होगी । अरस्तू के लिए यह चालक ही अंतिम कारण है । यह निष्कर्ष एक साम्यानुमान से प्रेरित होता है ।
अब, ईच्छा और चिन्तन के विषय ठीक इसी प्रकार से वस्तुओं को बिना स्वयं गति किए गति कराते हैं । अर्थात सभी वस्तुओं का परम कारक ही अंतिम कारक है । यह वह है जिससे अन्य सभी वस्तुएँ प्रेम करती हैं । इसके लिए उनका प्रेम इसे गतिशील रखता है । सभी वस्तुओं का परम कारक और सबकी 'इच्छा' की वस्तु होने के कारण इसे सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए । यह श्रेष्ठ होगा । यह ईश्वर होगा । अतः ईश्वर उच्चतम स्तर पर इस जीवन के आनंद को ग्रहण करता है । अतः ईश्वर शाश्वत रूप से विद्यमान तत्व है, जो पूर्ण सत्य विचार का जीवन जीता है ।
अरस्तू ने अपने इस प्रथम चालक को ईश्वर कहा है । उनकी दृष्टि में कोई अलौकिक विधाता नहीं है । किसी ने ब्रह्मांड की रचना नहीं की है, क्योंकि यह शाश्वत है । यह सत्य है कि वह उसी प्रकार गति उत्पन्न करता है, जिस प्रकार की कोई सुन्दर चित्र मनुष्य को उसे खरीदने के लिए प्रेरित करता है । अरस्तू के लिए ईश्वर एक पूजा की वस्तु नहीं है, बल्कि वह एक तत्वमीमांसीय आवश्यकता है ।
मानव-दर्शन
अरस्तू मनुष्यों के संबंध में प्लेटो के विचार से शुरूआत करते प्रतीत होते हैं । अरस्तू डीऐनिमा में कहते हैं कि आत्मा तीन प्रकार की होती हैं –
- पोषक आत्मा ( वनस्पति जगत )
- संवेदनशील आत्मा ( सभी जीवधारी- पशु )
- तर्कसंगत आत्मा ( मानव )
अरस्तू के अनुसार ये तीनों प्रकार की आत्माऐं एक प्रकार का गुणात्मक एवं उद्देश्यपरक पदानुक्रम प्रदर्शित करती हैं । उच्चस्तरीय आत्म अपने आप में निम्न स्तरीय आत्म के सभी गुणों को समाहित किए रहती है । सभी निम्नस्तरीय जैविक वस्तुएं पोषण एवं प्रजनन करती हैं । जन्तु केवल पोषण एवं प्रजनन ही नहीं करते वरन् गति और एन्द्रिक सम्वेदन भी करते हैं । जबकि, मानव वनस्पति एवं जन्तुओं की सभी क्रियाओं के साथ-साथ बौद्धिकता को भो धारित करते हैं ।
अरस्तू का विश्व-दर्शन उद्देश्य परक है । यद्यपि उनके अनुसार, सम्पूर्ण जगत चेतन-जगत नहीं है तथापि इसकी सभी वस्तुएं अपने-अपने स्वरूपगत लक्ष्यों से संचालित होती हैं । एक ओर जहाँ निम्नस्तरीय वस्तुएं पोषण, प्रजनन, गति, संवेदन आदि उद्देश्यपरक क्रियाओं से संचालित होती हैं वहीं दूसरी ओर, मानव बौद्धिकता के कारण अच्छे-बुरे, सुख-दुख, उचित-अनुचित आदि के भावों के आधार पर विकल्पों का चुनाव करते हैं और उसी अनुसार निर्णय करते हैं । अपनी बौद्धिक शक्ति के आधार पर वे नये संगत नियमों, सिद्धान्तों और मानकों की खोज करते हैं ताकि वे अपने स्वगत उद्देश्यों ( उचित बुद्धिमता पूर्ण क्रियाऐं - मध्यम मार्ग ) को प्राप्त कर सके ।
नीतिशास्त्र
नीतिशास्त्र तर्क के अनुरूप ( सही सोच के क्या मानक हैं ? ) आचरण का विज्ञान ( अच्छे जीवन के क्या मानक है ? ) है । यह सिर्फ जानने का नहीं बल्कि व्यवहार में लाने का भी विज्ञान है । इसका संबंध सिर्फ इससे नहीं है कि क्या अच्छा हैं ? बल्कि इससे भी है कि मैं कैसे अच्छा हो सकता हूँ ? नीतिशास्त्र मनोविज्ञान नहीं है यद्यपि यह उससे जुड़ा हुआ है । नीतिशास्त्र किसी दिए गए समय पर मनुष्य की आत्मा द्वारा विकल्पों के रूप में उपलब्ध व्यवहार के अनेक क्रमों में से सही चयन की आवश्यकता से विकसित हुआ है । अच्छा-बुरा मानव के सन्दर्भ में ही अर्थपूर्ण होता है, इसलिए इसका उल्लेख तभी किया जा सकता है, जब यह ज्ञात हो कि मनुष्य क्या है ? मनोविज्ञान का अध्ययन शिक्षाशास्त्र में और विशेषरूप से अच्छे व्यवहार और विचार को सीखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
अरस्तू के अनुसार मनुष्य का एक ही साध्य है, सुख सुख वह है जिसका चयन हर व्यक्ति अपने हिसाब से करता है । यह अन्य किसी और वस्तु के लिए साधन नहीं है । अतः सुख कोई ऐसी चीज है जो पूर्ण और स्वयं में पर्याप्त है । यह क्रिया का अंत है । सुख उस अधिक व्यापक, अधिक पूर्ण अधिक स्थायी संतुष्टि का नाम है जिसे मनुष्य की तर्क बुद्धि सम्भव बनाती है लेकिन साथ ही इसकी प्राप्ति मनुष्य के पास अन्य विकल्पों के होने के कारण अधिक कठिन हो जाती है । इस संभावना की कल्पना करना भी अपेक्षाकृत सरल संवेदनशील आत्मा ( निम्न श्रेणी के जीव ) द्वारा संभव नहीं है । अतः तार्किक आत्मा ( मानव ) को सुख प्राप्ति का प्रयास , बिना किसी असफलता की परवाह किए करते रहना चाहिए ।
चिंतन श्रेष्ठ सुख है
हम कह सकते हैं कि सुख वह है जिसका अनुभव हम तब करते हैं, जब हम अपनी श्रेष्ठता और पूर्णता में जीते हैं । जब हम अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करते हैं । जब हम साध्य ( सुख ) को बिना किसी बाधा के प्राप्त करने से सफल होते हैं । जब हमें अपने वास्तविक स्वरूप की पूर्ण प्राप्ति होती है । चूँकि मनुष्य की गतिविधियाँ अनेक हैं, सबसे अच्छी और ऊँची गतिविधि अर्थात् वह गतिविधि जो सबसे अधिक पूर्णता से मानव स्वभाव को समझती और अभिव्यक्त करती है, वह चिंतन है । चिंतन में ब्रह्मांड के विषय में परम सत्य का बोध होने में सबसे बड़ी प्रसन्नता निहित है, जिसके लिए मनुष्य सक्षम है ।
नीतिशास्त्र से राजनीति में संक्रमण
कोई भी व्यक्ति स्वयं में पूर्ण नहीं है । मनुष्य समुदाय के बिना ठीक से नहीं रह सकता है । अतः मनुष्य समुदायों में नगर में रहता हैं । अरस्तु ने नीतिशास्त्र पर अपने कार्य में, व्यक्ति के बारे में चर्चा की है । उन्होंने अपनी पुस्तक पालिटिक्स में नगर के जीवन के बारे में उल्लेख किया है । अरस्तू की नगर की अवधारणा जैविक है और नगर की इस रूप में अनुभूति करने वाले वह पहले व्यक्ति माने जाते हैं । अरस्तू ने नगर को एक प्राकृतिक समुदाय माना है । यही नहीं, उन्होंने नगर को परिवार से पहले माना है जो कि व्यक्ति से भी पहले आता है अर्थात जो बनने के क्रम में अंतिम और होने के क्रम में पहले स्थान पर है । अरस्तु अपने कथन "मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक पशु है" के लिए भी प्रसिद्ध है । अरस्तू ने राजनीति को एक तत्व के रूप में मशीन की बजाय जीव के रूप में समझा है । उनके अनुसार यह ऐसे भागों का समूह है, जिनमें किसी का भी दूसरे के बिना अस्तित्व सम्भव नहीं है ।
सद्गुण
अरस्तू ने बौद्धिक और नैतिक गुणों की बात की है । बौद्धिक गुण वे हैं जो हमें सत्य की और तथा अन्ततः सभी सत्यों में सबसे श्रेष्ठ सत्य-ईश्वर की प्राप्ति में सहायता प्रदान करते हैं । इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें नैतिक मूल्यों को विकसित करना पड़ता है । ये बौद्धिक सद्गुण इसमें हमारी सहायता करते हैं और जब तक ये हैं तब तक हमारी कामनाओं पर नियंत्रण रखकर हमें सही कार्य करने में समर्थ बनाते हैं । इस संदर्भ में यह स्पष्ट है कि अरस्तू कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सद्गुण दो बुराईयों के मध्य स्थित रहने वाला मूल्य ( गुण ) है । ये बुराईयाँ दो अंतियों को प्रदर्शित करती है और दोषों से उत्पन्न होती है ।
कला और साहित्य
अरस्तु पोइटिक्स में प्लेटो द्वारा त्रासदी की आलोचना करने और अपने राज्य से कवियों को निष्कासित कर देने की इच्छा की भ्रत्सना इस आधार पर करते हैं कि ऐसा विचार राजनेताओं और यौद्धाओं की भावनाओं को समाप्त करके उनकी इच्छाशक्ति और नैतिक शक्ति को कमजोर बना देता है । अरस्तू ने यह दिखाने के लिए भाव-विरेचन ( Catharsis ) के प्रसिद्ध सिद्धांत का उपयोग किया कि दया और डर की भावनाओं को प्रदर्शित करने से ( जो त्रासदी से उत्पन्न होती है ) आत्मा और उसके मनोभाव परिवर्तित और परिष्कृत हो जाते हैं । इससे कुछ हद तक आनंद और शांति की भावना का विकास होता है ।
दासत्व
अरस्तू के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र एक प्रकार का समुदाय है और प्रत्येक समुदाय की स्थापना अच्छाई के लिए की गई है । क्योंकि मनुष्य सदैव उसे प्राप्त करने के लिए कार्य करता है जिसे वह अच्छा समझता है । किंतु यदि सभी समुदायों का उद्देश्य अच्छाई करना है, तो राष्ट्र या राजनैतिक समुदाय, जिसका दर्जा सबसे ऊँचा है और जिसमें अन्य सभी शामिल हैं, का उद्देश्य किसी अन्य की तुलना में अधिक मात्रा में अच्छाई और सर्वश्रेष्ठ अच्छाई करना होना चाहिए । राष्ट्र परिवारों से मिलकर बनता है और परिवार मालिक और दास, पति और पत्नी, पिता और बच्चों से बनता हैं । कुछ विचारकों का मानना है कि दास पर उसके मालिक का शासन प्रकृति के विरुद्ध है । दास और स्वतंत्र व्यक्ति के बीच अंतर सिर्फ कानूनी रूप से ही है, प्राकृतिक रूप से नहीं, तथा प्रकृति से छेड़छाड़ अनुचित है । इस सम्बंध में अरस्तू का तर्क था कि संपत्ति परिवार की होती है और दास एक जीवित सम्पत्ति है । यह एक ऐसा साधन है, जो अन्य सभी साधनों से पहले आता है । मालिक सिर्फ दास का मालिक होता है वह स्वयं उससे सम्बंधित नहीं होता है, जबकि दास न सिर्फ अपने मालिक का दास होता है, बल्कि पूरी तरह से उसकी सम्पत्ति होता है । अतः स्वामित्व को कार्य के ऐसे साधन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो स्वामी से पृथक होता है ।
प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जो स्वभाववश दास बनना चाहता हो और जिसके लिए ऐसी स्थिति उचित और सही हो या फिर सभी प्रकार की दासता प्रकृति का उल्लंघन है ? सजीव प्राणियों में आत्मा शरीर पर शासन करती है तथा भ्रष्ट लोगों में ही शरीर आत्मा पर शासन का प्रतीत होता है । पुनः पुरुष प्राकृतिक रूप में स्त्री से श्रेष्ठ होते हैं और स्त्री उससे निम्न होती है और सैद्धांतिक रूप में एक शासन करता है और दूसरा शासित होता है । ऐसा आवश्यक रूप से पूरी मानवजाति में वहाँ पाया जाता है जहा कही भी आत्मा और शरीर में या फिर मनुष्य और जन्तुओं में भेदभाव है । दास वे हैं जिनका काम अपने शरीर का उपयोग अर्थात् शारीरिक श्रम करना है, क्योंकि वे इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकते हैं । निम्नतम कोटि के जन स्वभाव से दास होते हैं और उनके लिए सभी निम्नतर जनों की भांति यह बेहतर है कि वे स्वामी के शासन में रहें । अतः जो ऐसे होते हैं, वे प्रकृति से दास स्वभाव के होते हैं तथा दूसरी ओर वे होते हैं, जो तर्कपूर्ण सिद्धान्तों को समझते हैं और उनके निर्माण में भाग लेते हैं, वे स्वभाव से मालिक होते हैं ।
अरस्तू ( Aristotle ) के प्रमुख दार्शनिक कथन
- मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक पशु है ।
- सामान्य 'विशेषों में ही अनुस्यूत है ।
- ईश्वर जगत को वैसे ही गतिशील बनाता है जैसे प्रेमिका प्रेमी को ।
- ईश्वर एक शुद्ध आकार है ।
- ईश्वर शुद्ध आकार, शुद्ध सत्ता, परमपूर्ण और सर्वज्ञ है और संसार का आदि प्रथा प्रयोजन कारण है ।
- समान के साथ समान व्यवहार और असमान के साथ असमान व्यवहार करना चाहिए ।
- आकार वस्तुओं से पृथक नहीं है बल्कि उनमें अंतर्निष्ठ है, वे इंद्रियातीत नहीं है बल्कि अनुस्यूत है ।
- आगमन में अन्तःप्रज्ञा एक आवश्यक तत्त्व है, ऐसी प्रक्रिया जिसमें इंद्रिय प्रत्यक्ष से सार्वभौमिक ज्ञान प्राप्त होता है । आत्मा जीवित शरीर का रूप है । अलग-अलग तरह के जीवों में अलग-अलग तरह की आत्मा होती है । कुछ मनुष्यों में आत्मा का बौद्धिक अंश पूर्णतः विकसित नहीं होता ।
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