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Friday, May 13, 2022

पाइथागोरस ( Pythagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

पाइथागोरस ( Pythagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- इनमें से किसने आत्मा के आवागमन सिद्धान्त को स्वीकार किया है ?

  1. थेल्स 
  2. एनेक्जागोरस 
  3. अनाक्जमेनीज 
  4. पाइथागोरस 

2- इनमें से किसने संख्या को सृष्टि की उत्पत्ति का मूल आधार माना है ?

  1. पाइथागोरस 
  2. थेल्स 
  3. हेराक्लिट्स
  4. इनमें से कोई नहीं 

3- पाइथागोरस के अनुयायियों के अनुसार विश्व का केन्द्र है -

  1. पृथ्वी 
  2. सूर्य 
  3. अग्नि 
  4. जल 

4- "शरीर आत्मा का बंदीगृह है" - यह कथन किसका है ?

  1. पार्मेनाइडीज 
  2. पाइथागोरस 
  3. हेराक्लिट्स 
  4. थेल्स 

5- पाइथागोरस के दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सुसंगत नहीं है ?

  1. आत्मा का आवगम सिद्धान्त चिरस्थाई है । 
  2. सम एवं विषम क्रमशः असीमित एवं सीमित से सम्बन्धित है । 
  3. शरीर पूर्णजन्म का बंदीगृह है । 
  4. मानव आत्मा एक दैवी सम्पदा है । 

6- निम्नलिखित में से किसका विचार है कि 'पदार्थ, पदार्थ है क्योंकि उनकी गणना की जा सकती है' -

  1. पाइथागोरस  
  2. एनेक्जागोरस 
  3. एम्पेडोक्लीज 
  4. डेमोक्रेट्स 

7- निम्नलिखित कथनों पर पाइथागोरस के दृष्टिकोण से विचार करें और सही कूट का चयन करें । 

  1. पाइथागोरस शाश्वत पुनः आवर्तन की अवधारणा में विश्वास रखता था । 
  2. पाइथागोरस का विचार था कि आत्मा अमर है और इसका पुनर्जन्म होता है । 
  3. पाइथागोरस ने इस विचार को अस्वीकृत किया कि विश्व की प्रक्रिया अंतहीन और अपरिवर्तनीय है । 
     कूट 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 3 
  4. 1 और 2 

8- 'तीन श्रेणी के मनुष्य - बुद्धि के प्रेमी, सम्मान के प्रेमी और अर्जन के प्रेमी' - सिद्धान्त प्रतिपादित किया ?

  1. पाइथागोरस ने 
  2. हेराक्लिट्स ने 
  3. अरस्तू ने 
  4. ल्यूसिपस् ने 
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पाइथागोरस ( Pythagoras ) का दर्शन

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का दर्शन 

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का दर्शन 

नैतिक संस्था

      पाइथागोरस के समय के समाज में धार्मिक पुनरुद्धार की प्रबल भावना थी । अतः उनसे वास्तविक धार्मिक शिक्षाएं प्रदान करने की शुरूआत हुई । पाइथागोरस ने नैतिक, धार्मिक और राजनैतिक उद्देश्य के लिए एक संस्था की स्थापना की । उनका उद्देश्य अपने अनुयायियों के बीच राजनैतिक सद्गुणों को विकसित करना था, जिससे उन्हें राष्ट्र की भलाई की शिक्षा दी जा सके और वे अच्छी प्रजा बन सके । इसके लिये व्यक्ति को स्वयं पर नियंत्रण रखना, अपने मनोविकारों का दमन करना, अपनी आत्मा के साथ सामंजस्य करना सीखना चाहिए । उसके मन में अपने बड़ों, शिक्षकों और राष्ट्र के लिए सम्मान होना चाहिए । इसी कारण यह धारण बनी कि पाइथागोरियन मात्र एक राजनैतिक समुदाय था । लेकिन पाइथागोरियन अनिवार्य रूप से राजनैतिक नहीं बल्कि धार्मिक या नैतिक थे । उनकी शिक्षा का मुख्य अभिप्राय उन धार्मिक-सन्यासी विचारों से था जो शुद्ध और शुद्धता पर आधारित थे । 

आत्म विचार 

     पाइथागोरसवादियों ने मानव-आत्मा को प्राण आत्मा के उस रूप में देखा जो व्यक्ति के पहले शरीर की मृत्यु के बाद भी रहती है और फिर दूसरे मानव या जंतु शरीर में प्रवास करती है । आत्माओं के पुर्नजन्म या देहांतरण का यह सिद्धान्त नैतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आगामी पुर्नजन्मों में अच्छे कार्यों के लिए पुरुस्कार और बुरे कर्मों के लिए सजा का प्रावधान करता है । उन्होंने आत्मा के मृदुकरण के लिए मौन, संगीत और गणित की शिक्षा दी । हम निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते हैं कि ये सभी शिक्षाएं पाइथागोरस की है अथवा उसके अनुयायियों द्वारा दी गई हैं । डायोजीन्स, लेशियस, जीनोफेन्स की उस कविता के बारे में बताते हैं जिसमें पाइथागोरस ने किसी व्यक्ति को कुत्ते को मारता हुआ देखकर उसे कुत्ते को मारना बंद करने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें उस कुत्ते की चीत्कार में किसी मित्र की आवाज का अनुभव हुआ था । यह पुनर्जन्म की शिक्षा को मजबूती से प्रस्तुत करता है । अतः उन्होंने शरीर को नहीं बल्कि आत्मा को महत्व दिया । इसीलिए उन्होंने अपने जीवन में आत्मा के शुद्धीकरण और आत्मा के प्रशिक्षण पर जोर दिया । यह कहा जाता है कि ऐसा उनके ओरफियसवाद ( orphicism ) से प्रभावित होने के कारण था, जो कि वस्तुतः दर्शन की अपेक्षा एक धर्म था और उसका झुकाव सर्वेश्वरवाद की ओर था । यह मात्र विश्वविज्ञान का कोई पूर्वानुमान न होकर एक जीवनपद्धति भी थी । इस अर्थ में पाइथागोरस के अनुनायियों ने ऑफियसवाद से कुछ बातों को ग्रहण अवश्य किया था । 

विपरीतों का सिद्धान्त 

       पाइथागोरस के अनुयायियों ने विपरीतों का सिद्धान्त भी विकसित किया जिसमें ससीम और असीम मुख्य जोड़ा था । उन्होंने ससीम को किसी वस्तु के निश्चित और मापनीय गुण के रूप में समझा तथा असीम उसे समझा जो पाइथागोरस के अनुसार परिभाषा और मापन के प्रयासों के विरूद्ध था । असीम का उनका मानक ज्यामितीय उदाहरण किसी आयत का विकर्ण था । इसके अनुसार महज पार्श्व भागों के संदर्भ में विकर्ण की लंबाई को व्यक्त करना असंभव है । 

नैतिक सिद्धान्त 

      नैतिक समस्याओं को समझने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण प्रस्थान बिन्दु यह है कि 'शुभम' को उचित और बुद्धिमत्तापूर्ण अतः, चौथी शताब्दी ई.पू. में, एक बाद के पाइथागोरियन टारेन्टम के आर्कीटस ने सबसे पहले यह प्रतिपादित किया कि 'उचित तर्क' अच्छे व्यवहार की कुंजी है । उन्होंने यह भी कहा कि "सही समझ का पता चल जाने पर यह नागरिक संघर्ष को रोक देता है और मेलमिलाप को बढ़ा देता है ... (यह) एक मानक है जो गलत करने वालो को रोकता है।" वास्तव में नैतिक निर्णय के रूप में उचित तर्क (रेक्टा राशा) का अरस्तुवादी और मध्ययुगीन सिद्धान्त पाईथागोरियन बौद्धिकता का प्रत्यक्ष रूप से ऋणी है । प्राचीन यूनान में तर्क पूर्ण (लोगोस) जीवन का अत्यधिक सम्मान किया जाता था । अरस्तू के नीतिशास्त्र की रचना मानव-आत्मा की बुद्धिमता के महत्व से ही की गई है । पाइथागोरस के 'शुभ' की अवधारणा के कारण ही होमर के 'शुभ' का, इसके सभी गुणों के साथ, बौद्धिकीकरण किया गया और उसे दर्शन के स्तर पर स्थापित किया गया । 

संख्या की अवधारणा 

      अरस्तू अपने लेखन 'मेटाफिजिक्स' में पाइथागोरस के अनुयायीयों को गणित के प्रति समर्पित बताते हैं । वे पहले लोग थे जिन्होंने इस अध्ययन की शुरूआत की । पाइथागोरस की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि सभी वस्तुओं का मूल तत्व संख्या है । संख्या सभी वस्तुओं का आधार है और ब्रहमांड का सिद्धान्त है । उन्होंने ब्रहमांड को संख्याओं की अवधारणा से समझाया । सभी वस्तुएँ गणनीय हैं और हम अनेक वस्तुओं को सांख्यिकीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं । इसलिए दो संबन्धित वस्तुओं के बीच संबन्ध को गणनीय अनुपात के अनुसार प्रदर्शित किया जा सकता है । जिस प्रकार संगीत के सुर संख्या पर निर्भर है, उसी प्रकार ब्रहमांड का सामंजस्य संख्या पर निर्भर है । विश्व सिर्फ व्यवस्था, सौंदर्य और तंत्र नहीं, बल्कि बुद्धिमत्तापर्ण और बहु अनुपातों या संख्याओं का संबन्ध है । फिलोलॉस ने इसे निम्न शब्दों में सही तरीके से व्यक्त किया है, "प्रत्येक ज्ञात वस्तु के मूल के में संख्या है और इसके (संख्या के) बिना कुछ भी सोचा या ज्ञात नहीं किया जा सकता है .... असत्य कभी भी संख्या तक नहीं पहुच सकता है, क्योंकि संख्या की प्रकृति असत्यता की विरोधी है, जबकि सत्य संख्या के साथ उपयुक्त और स्वभाविक रूप से मेल खाता है। प्रेम, मित्रता, न्याय, गुण, स्वास्थ्य आदि संख्याओं पर चित्रित है । प्रेम और मित्रता की गणना आठ की संख्या से की जाती है, क्योंकि इनमें समन्वय है और अष्टक में भी समन्वय है”। 

पाइथागोरस ने संख्याओं को देशीय ( Spatially ) रूप में माना है । बिन्दु एक संख्या को, रेखा दो को, सतह तीन को तथा ठोस चार संख्या को प्रदर्शित करता है । अब यह कहना कि 'सभी चीजें संख्याएं हैं', का अर्थ होगा कि अंतरिक्ष में सभी पिंड बिंदु या इकाई है, जो एक साथ मिलकर संख्या बनाते हैं । अतः बिंदु, रेखाएं और सतह वास्तविक इकाईयां है जो प्रकृति के समस्त तात्विक पिंडो को बनाती है और इस अर्थ में सभी तात्विक पिंडों को संख्या समझना चाहिए । उनका मानना था कि वस्तुएं संख्या की प्रतियां या नकल है । ब्रहमांड की पूरी परिघटना को संख्याओं के तहत् अभिव्यक्त किया जा सकता है ।

पाइथागोरस ( Pythagoras )  के प्रमुख कथन 

  • शरीर आत्मा का बंदीगृह है । 
  • संख्या सृष्टि का मूल आधार है । 
  • मानव आत्मा एक दैवी सम्पत्ति है । 
  • संख्या ब्रह्माण्ड का आधारभूत स्रोत है । 
  • आत्मा का आवागमन सिद्धान्त चिरस्थाई है । 
  • पदार्थ, पदार्थ है क्योंकि इसकी गणना की जा सकती है । 
  • सम एवं विषम क्रमशः असीमित एवं सीमित से सम्बन्धित है । 
  • तीन श्रेणी के मनुष्य होते है - बुद्धि के प्रेमी, सम्मान के प्रेमी और अर्जन के प्रेमी ।   

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पाइथागोरस ( Pythagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 580 ई.पू. से 497 ई.पू.

प्रमुख दार्शनिक विचार - संख्या सभी वस्तुओं का आधार है और ब्रहमांड का सिद्धान्त है ।

प्रमुख उपाधि - संख्या का जनक 

प्रमुख कथन - सभी वस्तुओं का मूल तत्व संख्या है ।

         आयोनी दर्शन पाइथागोरस के कार्य द्वारा दक्षिण इटली में पहुंचा । सामोस के पाइथागोरस, पाइथोगोरसीय दार्शनिक परम्परा के संस्थापक थे । उनका जन्म सामोस में 580 और 570 ई.पू. के बीच हुआ था । वह वर्ष 529 ई.पू. के आसपास दक्षिण इटली में यूनानी कोलोनी में चले गए थे । एम्ब्लीकस मानते थे कि पाइथागोरस दिव्य दर्शन शास्त्र के जनक और मार्ग दर्शक थे । वी. कापेरेली ने लिखा है कि ‘पाइथागोरस का दर्शन, ज्ञान के साथ प्रबल धार्मिक भावना का मिश्रण है’ । अनैक्सीमिनिज के दर्शन पर उनकी निर्भरता स्पष्ट । वे मानते हैं कि ब्रहमांड एक पवित्र वृत्त है, जिसके केन्द्र में दिव्य शाश्वत् अग्नि या न्यूमा है, जो केंन्द्र में स्पंदन कर रहा है और सभी चीजों को ब्रहमांडीय श्वांस से अनुप्राणित कर रहा है । 

     नव-पाइथागोरियनों ने केन्द्रीय अग्नि की पहचान यूनानी जेयुस अथवा आदि देव ओलम्पस, केस्ल ऑफ जेयुस आदि से की है । अग्नि यहां एकता के कारक के रूप में है, जिससे हर वस्तु की उत्पति हुई है । उन्होंने ब्रहमांडविज्ञान, मानवविज्ञान और नैतिकशास्त्र पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । 

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अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  तर्क शास्त्र           अरस्तू तर्क शास्त्र के क्षेत्र के वास्तविक अन्वेषक थे ।...