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Friday, May 20, 2022

प्लेटो ( Plato ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

प्लेटो ( Plato ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

प्लेटो ( Plato ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- निम्नलिखित कथनों में से कौन प्लेटो के अनुसार सत्य नहीं है ? 

  1. विज्ञान द्रव्य है ।
  2. विज्ञान देश एवं काल से परे है । 
  3. विज्ञान स्वयंभू है 
  4. विज्ञान गोचर है

2- प्लेटो के अनुसार विज्ञान है । 

  1. मानसिक 
  2. भौतिक 
  3. मानसिक एवं भौतिक 
  4. न मानसिक, न भौतिक 

3- सामान्यों के सम्बन्ध में निम्नलिखित सिद्धान्तों में से कौन-सा प्लेटो के द्वारा स्वीकार किया जाता है ? 

  1. नामवाद 
  2. सम्प्रत्ययवाद
  3. यथार्थवाद 
  4. संवृत्तिवाद 

4- निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्लेटो के अनुसार है ? 

  1. प्रत्यय विशेष होता है 
  2. प्रत्यय गुण है 
  3. प्रत्यय सामान्य है 
  4. प्रत्यय देश में अवस्थित हैं 

5- प्लेटो के दर्शन में प्रत्ययों से सम्बन्धित निम्न कथनों में से कौन-सा एक असत्य है ? 

  1. सत्ता एवं मूल्य की दृष्टि से प्रत्यय पदार्थों से श्रेष्ठ हैं 
  2. प्रत्यय सत् है, पदार्थ मात्र इनके अनुभव हैं 
  3. प्रत्ययों का ज्ञान इन्द्रियों से होता है न कि तर्कबुद्धि से 
  4. प्रत्यय श्रृंखलाबद्ध है 

6- निम्नलिखित कथनों में से कौन प्लेटो के प्रथम सिद्धान्त को सही रूप में प्रस्तुत करता है ? 

  1. यह प्रत्ययो का वस्तुवाद है । 
  2. यह सत्ता का प्रत्ययवाद है । 
  3. यह निरपेक्ष वस्तुवाद है 
  4. यह निरपेक्ष प्रत्ययवाद है 

7- प्लेटो के प्रत्यय सबसे उच्च प्रत्यय के अन्तर्गत सम्मिलित हैं, जोकि 

  1. ईश्वर का प्रत्यय है 
  2. शुभ का प्रत्यय है 
  3. आत्मा का प्रत्यय है 
  4. जगत् का प्रत्यय है 

8- प्लेटो के अनुसार विज्ञान अथवा प्रत्यय है - 

  1. ज्ञानमीमांसीय प्रत्यय 
  2. तत्त्वमीमांसीय सत् 
  3. मानसिक 
  4. कल्पना 

9- निम्नलिखित में से कौन-सा कथन प्लेटो के सामान्य विषयक सिद्धान्त को स्पष्ट करता है ? 

  1. केवल सामान्य ही वास्तविक तत्त्व है 
  2. सामान्य और विशेष दोनों सामान्य रूप से वास्तविक तत्त्व हैं 
  3. सामान्य विशेषों की अनुकृति है 
  4. सामान्य कोई वास्तविक तत्त्व नहीं है, वह केवल प्रत्यय है 

10- प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है ? 

  1. सामान्य, शाश्वत और इन्द्रियातीत विचार जगत् में रहता है । 
  2. सामान्य, विशेषों से पूर्व है 
  3. सामान्य, मूर्त व्यष्टि हैं 
  4. सामान्य, देश-निरपेक्ष और समय-निरपेक्ष है 

11- निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक प्लेटो को स्वीकार नहीं है ? 

  1. सामान्य परिवर्तनशील और नित्य होते हैं  
  2. सामान्य विशेषों की अपेक्षा अधिक वास्तविक होते हैं
  3. सामान्यों का स्वतन्त्र अस्तित्व है, जबकि विशेषों का अस्तित्व केवल गृहीत है 
  4. सामान्य केवल विशेषों में रह सकते हैं 

12- निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्लेटो के अनुसार सही है ? 

  1. आकार किसी भी जानने वाले मन से स्वतन्त्र बने रहते हैं 
  2. आकार ईश्वर के मन में रहने वाले प्रत्यय हैं 
  3. आकार दोनों हैं, मानसिक और भौतिक 
  4. आकार किसी भी प्रकार गृहीत नहीं हो सकते 

13- प्लेटो के अनुसार - 

  1. प्रत्यय भौतिक पदार्थ है 
  2. प्रत्यय देश कालातीत है 
  3. प्रत्यय सतत् परिवर्तनशील है 
  4. प्रत्यय वस्तुओं की प्रतिमूर्तियाँ हैं 

14- प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा सही नहीं है ? 

  1. प्रत्ययों की विविधता नहीं होती है 
  2. प्रत्ययों की एकता होती है 
  3. प्रत्यय वास्तविक तत्त्व है 
  4. प्रत्यय पदार्थों से श्रेष्ठ होते हैं 

15- निम्नलिखित में से कौन-सा कथन प्लेटो के सामान्य के सिद्धान्त का निदर्शन करता है ? 

  1. केवल सामान्य ही वास्तविक है 
  2. सामान्य तथा विशेष दोनों समान रूप से वास्तविक हैं 
  3. सामान्य विशेषों की प्रकृति है 
  4. सामान्य वास्तविक तत्त्व नहीं है, वरन् मात्र अवधारणाएँ हैं 

16- 'तृतीय मानव युक्ति' यह प्रदर्शित करती है कि प्लेटो का विज्ञान सिद्धान्त (थ्योरी ऑफ आइडियाज) ग्रस्त है - 

  1. असंगत अभिकथन के दोष से 
  2. चक्रक तर्क दोष से 
  3. आत्माश्रय दोष से 
  4. अनास्था दोष से 

17- प्लेटो के दर्शन में 'प्रत्यय' है - 

  1. सत परन्तु अस्तित्ववान नहीं 
  2. अस्तित्ववान् परन्तु असत् 
  3. न अस्तित्ववान न सत् 
  4. अस्तित्वान एवं सत् दोनों 

18- "सामान्यों का विशेष वस्तुओं से पृथक् अस्तित्व है ।" कथन है - 

  1. प्लेटो का 
  2. ह्यूम का  
  3. अरस्तू का 
  4. बौद्ध दर्शन का

19- प्लेटो के सिद्धान्त के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है ? 

  1. ईश्वर, शाश्वत है और बदलता नहीं है 
  2. ईश्वर अच्छा है, परन्तु सदाचारी नहीं है 
  3. ईश्वर सृष्टा नहीं है 
  4. ईश्वर निर्माता है 

20- समान्यों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से प्लेटों के मत है ?

  1. सामान्य अनेक से परे तक होता है । 
  2. सामान्य अनेक में से एक होता है । 
  3. सामान्य शाश्वत होता है । 
कूट 
  1. 1 और 3 
  2. 1 और 2 
  3. 2 और 3 
  4. ये सभी 
21- प्लेटों के सिद्धान्त के सम्बन्ध में निम्नलिखित में कौन-से कथन उन्हें सामान्य के बारे में वस्तुवादी प्रदर्शित करते है ?
  1. जब कुछ वस्तुओं का एक सामान्य नाम हो, तो उनका आकार भी सामान्य होता है । 
  2. विशेष प्रत्यय, प्रत्यय की अपूर्ण प्रतिलिपियाँ होते है । 
  3. 'बिल्ली' शब्द का अर्थ आदर्श, विलक्षण एवं सनातन बिल्ली है । 
  4. विशेष पदार्थ ज्ञान के विषय नहीं है । 
कूट 
  1. 1 और 2 
  2. 1, 2 और 3 
  3. 2 और 3 
  4. 2, 3 और 4 

22- "प्लेटो के दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व से सम्बन्धित प्रमाण दिए गए हैं ।" निम्नलिखित में से इनमें सम्मिलित नहीं है 

  1. विश्व कारणमूलक युक्ति 
  2. आकारिक कारणमूलक युक्ति 
  3. असम्भव्यतामूलक युक्ति 
  4. सत्तामूलक युक्ति 
कूट 
  1. 1 और 4 
  2. 2 और 3 
  3. 3 और 4 
  4. ये सभी 

23- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. सामान्य पूर्व एवं परम सत् है । 
  2. प्रत्येक सामान्य एक इकाई है । 
  3. सामान्य अपरिवर्तनशील एवं अविनाशी है । 
  4. सामान्य विशिष्टों के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 2 और 4 
  2. 2, 3 और 4 
  3. 1, 3 और 4 
  4. 1, 3 और 2 

24- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. मानवीय बुद्धि सक्रिय व निष्क्रिय दोनों होती है । 
  2. निष्क्रिय बुद्धि नाशवान है । 
  3. सक्रिय बुद्धि आत्मा के विकास की प्रक्रिया के आविर्भूत होती है । 
  4. सक्रिय बुद्धि अनश्वर है । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 2, 3 और 4 
  2. 1, 2 और 3 
  3. 1, 3 और 4 
  4. 1, 2 और 4 

25- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. लाल वस्तुओं के अलावा, लालपन है जिसका लाल वस्तुओं से स्वतन्त्र अस्तित्व है । 
  2. लालपन, अन्य सामान्यों की भाँति सार के रूप में विचारित होना चाहिए और इस प्रकार यह स्वयं में वास्तविक है । 
उपरोक्त कथनों में कौन-सा / से कथन द्वारा प्रस्तुत विचार के अनुरूप है / हैं ? 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 2 
  4. न तो 1 और न ही 2 

26- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. प्रत्यय सोपान क्रमिक होते हैं । 
  2. प्रत्यय देश-काल से परे होते हैं । 
  3. प्रत्यय स्वभावतः विशिष्ट होते हैं । 
  4. प्रत्यय सार्वभौमिक होते हैं । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 2 और 3 
  2. 1 , 3 और 4 
  3. 2, 3 और 4 
  4. 1, 2 और 4 

27- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए । 

  1. सामान्य नित्य एवं प्रत्ययों के अतीन्द्रिय जगत् में रहते हैं । 
  2. सामान्य विशेषों से पहले होते हैं । 
  3. सामान्य मूर्त विशेष हैं । 
  4. सामान्य देश एवं काल दोनों से परे हैं । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 3 और 2 
  2. 1, 2 और 4 
  3. 2 और 3 
  4. 3 और 4 

28- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए सामान्यों के विषय में प्लेटो का मुख्य सरोकार निम्न सन्दर्भ में है । 

  1. व्यक्तियों की भौतिक एवं रासायनिक विशेषताएँ 
  2. नैतिक विशेषताएँ एवं गणित सम्बन्धी सत्ताएँ 
  3. कला एवं विज्ञान 
  4. राजनीति एवं कानून 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 3 और 4 
  2. 1 और 4 
  3. केवल 3
  4. केवल 2  

29- सामान्य के विषय में प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा / से सही है / हैं ? 

  1. क्योंकि मेजों की तरह वस्तुएँ होती हैं, इसलिए इस प्रकार के सामान्य हैं; जैसे- मेजपन । 
  2. सभी मेजें, मेजें हैं, क्योंकि इसमें प्रत्येक में इसका अपना सामान्य होता है । 
  3. सभी मेजें 'मेजपन' के सामान्य का दृष्टान्त हैं । 
  4. सभी मेजें वास्तविक हैं, क्योंकि इस सभी में 'मेजपन' है । 
कूट 
  1. 1 और 2 
  2. 2 और 3 
  3. 3 और 4 
  4. केवल 3 

30- आकारों के विषय में निम्नलिखित कथनों में से कौन-से प्लेटो के दर्शन के अनुसार संगत हैं ? 

  1. आकार वास्तविक सत्ताएँ हैं 
  2. आकारों की विविधता है 
  3. आकार विशेषों से उत्कृष्ट है 
कूट 
  1. 1, 2 और 3 
  2. 1 और 2 
  3. 2 और 3
  4. 1 और 3

31- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. सामान्य सत् तथा मूल्य के दृष्टिकोण विशेषों से श्रेष्ठतर होते हैं । 
  2. सामान्य सत् एवं विशेष मात्र आभास होते हैं ।
  3. विशेष उसी सीमा तक सत् होते हैं, जिस सीमा तक वे सामान्य में सहभागी होते हैं । 
  4. सामान्य तर्कतः परस्पर सम्बन्धित होते हैं तथा एक तारतम्य का निर्माण करते हैं । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन प्लेटो के अनुसार सही हैं ? 
  1. 1, 2 और 4 
  2. 2, 3 और 4 
  3. 1, 3 और 4 
  4. ये सभी 

32- नीचे दिए गए कथन एवं कारणों को ध्यानपूर्वक पढ़कर कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए 
कथन ( A ) प्लेटो के अनुसार परम शुभ का प्रत्यय निरपेक्ष सत् है । 
कारण ( R ) परम शुभ का प्रत्यय भौतिक जगत् की रचना करता है । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

33- कथन ( A ) प्लेटो के अनुसार सामान्य मानसिक है । 
कारण ( R ) सामान्य ईश्वर के मन में रहता है । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

34- प्लेटो के अनुसार विचार कीजिए -
कथन ( A ) प्रत्यय सामान्य और नित्य होते हैं । 
कारण ( R ) भौतिक पदार्थ के प्रत्ययों की अनुभूतियाँ हैं । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

35- कथन ( A ) प्लेटो के अनुसार सामान्य विशेषों के अस्तित्व के आधार हैं । 
कारण ( R ) विशेष सामान्य के ही अन्तर्गत प्राप्त विशेषताओं से युक्त होते हैं । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

36- नीचे कथन ( A ) और कारण ( R ) दिए गए हैं । उन पर प्लेटो के आकार सिद्धान्त के आलोक में विचार करें और सही कूट का चयन करें -
कथन ( A ) चक्रीयता भौतिक जगत् में विद्यमान नहीं होती है । 
कारण ( R ) चक्रीयता आकार का एक उदाहरण नहीं होती है । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R यही है 

37- प्लेटो की तत्त्वमीमांसा के प्रकाश में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें और सही कूट का चयन करें 

  1. सचमुच वास्तविक वे वस्तुएँ होती हैं, जिनका हम संवेदी अनुभव में सामना करते हैं । 
  2. सचमुच वास्तविक वे आकार होते हैं, जिन्हें केवल बौद्धिक रूप से ग्रहण किया जा सकता है । \
  3. आकार शाश्वत और परिवर्तनशील होते हैं । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. 1 और 3 
  3. केवल 2
  4. 2 और 3

38- प्लेटो के लिए कोई व्यक्ति हो सकता है 

  1. इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके सम्बन्ध में प्रत्यक्षण द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है 
  2. बिम्ब जिसके बारे में प्रत्यक्षण द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है 
  3. इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके बारे में तर्क द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है 
  4. इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके बारे में कल्पना द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है

39- प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से किसे 'सम्मति' के अन्तर्गत रखा जा सकता है ? 

  1. कुर्सी का विश्वास 
  2. कुर्सीपन 
  3. कुर्सी का कालापन 
  4. कुर्सी का सफेदीपन 

40- "यदि कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ नहीं है, तो ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं होगा, जिसके स्वरूप को चक्रीय कहा जाए ।" किसे मान्य है ? 

  1. सुकरात 
  2. प्लेटो 
  3. अरस्तू 
  4. सन्त ऑगस्टाइन 

41- प्लेटो की तत्त्वमीमांसा के आलोक में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट को चिह्नित कीजिए 

  1. जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते हैं, वे सत्यात्मक तथ्य नहीं हैं । 
  2. आकार को केवल बौद्धिक रूप से समझा जा सकता है । 
  3. आकार किसी के मन का प्रत्यय या सम्प्रत्यय है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. 1 और 2 
  3. 1 और 3 
  4. 1, 2 और 3 

42- नीचे दिए गए दो कथनों में से एक को कथन ( A ) और दूसरे को कारण ( R ) की संज्ञा दी गई है । कथन ( A ) और कारण ( R ) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए 
कथन ( A ) प्लेटो ने अपनी पुस्तक 'थीसिटस' में इस विचार को अस्वीकार किया कि ज्ञान विचार है । 
कारण ( R ) ज्ञान आस्था पर आधारित होना चाहिए, न कि बुद्धि पर 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है । 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R यही है 

43- नीचे दो कथन दिए गए हैं, इनमें से एक को कथन ( A ) और दूसरे को कारण ( R ) की संज्ञा दी गई है । प्लेटो की ज्ञानमीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ( A ) और ( R ) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए -
कथन ( A ) संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है । 
कारण ( R ) संकल्पनात्मक ज्ञान अनुकूल आदर्श अथवा अमूर्त वस्तुओं की यथार्थता के लिए आवश्यक नहीं होता । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है । 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R यहीं हैं 

44- प्लेटो के ज्ञान के सिद्धान्त के सन्दर्भ में न्यूनतम से अधिकतम के सही क्रम का चयन करें 

  1. ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, काल्पनिक ज्ञान, विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि 
  2. काल्पनिक ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि 
  3. ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, काल्पनिक ज्ञान, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि, विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि 
  4. विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि, काल्पनिक ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि 

45- निम्नलिखित में से कौन-सी पुस्तकें प्लेटो द्वारा लिखी गई हैं ? 

  1. रिपब्लिक 
  2. लॉज 
  3. पॉलिटिक्स
  4. क्रीटो
कूट 
  1. 1 और 4 
  2. 2, 3 और 4 
  3. 2 और 4
  4. 1, 2 और 4 

46- प्लेटो के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा / से अभिकथन सही है / हैं ? 

  1. न्याय आत्मा का गुण है । 
  2. सामूहिकता की आत्मा को व्यक्ति को व्याप्त करना चाहिए । 
  3. नैतिकता शाश्वत परम्परा मात्र नहीं है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 3 
  4. ये सभी 

47- निम्नलिखित में से किस एक विचारक ने 'न्याय' को 'मुख्य सद्गुण' के रूप में स्वीकार किया है ? 

  1. साफिस्ट 
  2. अरिस्टिपस 
  3. बेन्थम 
  4. प्लेटो 

48- प्लेटो के अनुसार, विज्ञानों के अधिक्रम का सही क्रम बताइए -

  1. गणित, ज्यामिति, खगोल विज्ञान, संनाद-विश्लेषण और तर्कशास्त्र 
  2. तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, संनाद-विश्लेषण और ज्यामिति 
  3. तर्कशास्त्र, खगोल विज्ञान, गणित, ज्यामिति और संनाद-विश्लेषण 
  4. गणित, खगोल विज्ञान, तर्कशास्त्र, ज्यामिति और संनाद-विश्लेषण
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Thursday, May 19, 2022

प्लेटो ( Plato ) का दर्शन

प्लेटो ( Plato ) का दर्शन 

प्लेटो ( Plato ) का दर्शन  

ज्ञान का सिद्धांत

        सर्वप्रथम, प्लेटो नकारात्मक रूप से तर्क करते हुए कहते हैं कि कुत्ते के लिए भी ज्ञान महज संवेदन नहीं हो सकता है । उनका मानना था कि जिसमें संवेदन होगा, उसमें ज्ञान भी होगा । उनके ज्ञान के सकारात्मक सिद्धांत को प्रसिद्ध दृष्टांत "एलीगरी ऑफ द केव" द रिपब्लिक बुक में दिया गया है । 

गुफा का दृष्टांत ( The Allegory of the Cave )

        प्लेटो अपनी प्रस्तुति ऐसे वृतान्त से शुरू करते हैं, जिसमें जिसे लोग वास्तविक समझते है, वह वास्तव में भ्रम होता है । उन्होंने ग्लॉकोन से कहा कि वह एक ऐसी गुफा की कल्पना करें जिसमें वे कैदी हो जिन्हें बचपन से ही बेड़ियों में जकड़कर स्थिर रखा गया हो । न सिर्फ उनके हाथों और पैरों को बांध कर रखा गया हो, बल्कि उनके सिर भी स्थिर हो और वे अपने सामने की दीवार को टकटकी बांधकर देखने के लिए विवश हो । कैदियों के पीछे आग हो और कैदियों और आग के बीच में एक ऊँचा गलियारा जिसमें अनेक जानवरों, पौधों और अन्य वस्तुओं के पुतले गतिशील हो । पुतलों की परछाई दीवार पर पड़े और कैदी इन परछाइयों को देखें । वे गलियारे में होने वाले शोर की गूंज को दीवारों से सुनें । ऐसे में यह सोचना उचित ही होगा कि कैदियों को वे परछाइयाँ वास्तविक वस्तुएँ और गूंज वास्तविक ध्वनियां लगेंगी । मान लीजिए कि उनमें से एक कैदी मुक्त हो जाता है और उन वस्तुओं को देखता है, जिनकी परछाई दीवार पर पड़ रही थी । तब वह उन्हें नहीं पहचान पाएगा और वह मानेगा कि दीवार पर पड़ने वाली परछाइयाँ अधिक वास्तविक हैं, जिन्हें उसने पहले देखा है । मान लीजिए अगर उन लोगों को अग्नि को देखने के लिए बाध्य किया जाए, तो वो कुछ देख नहीं पाएंगे और पुनः परछाइयों को देखने लगेंगे, क्योंकि उन्हें वो स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और सत्य मानते हैं । मान लीजिए, कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को बलात् खींचकर बाहर धूप में ले जाए तो वह व्यथित हो जाएगा और किसी भी वस्तु को नहीं देख पाएगा । धीरे-धीरे वह तारों आदि के प्रतिबिम्ब को अपने सामने रखे जल के कुंड में देख पाएगा । यद्यपि कुछ समय तक सतह पर रहने के बाद मुक्त कैदी अनुकूलित हो जाएगा । वह अपने आसपास की अधिक से अधिक चीजों को देख पाएगा । उसके बाद वह ऊपर सूर्य को देखेगा । वह समझ जाएगा कि सूर्य ही ऋतुओं और वर्षों के होने का स्रोत है और दृश्य जगत की सभी चीजों का संचालक है और किसी न किसी रूप में उन सभी चीजों का कारण है जो वह और उसके साथी देखते रहे हैं ।

दृष्टांत का अर्थ 

        गुफा का दृष्टांत ज्ञान के चार स्तरों का प्रतीक है, जिनके द्वारा मन प्रत्ययों को जानता है । प्रत्येक स्तर गुफा के अंदर और बाहर मनुष्य की विशेष अवस्था को प्रदर्शित करता है । 

  • बेड़ियों में मनुष्य : कल्पना की अवस्था 

         यह ज्ञान का पहला स्तर है । परछाइयाँ और प्रतिध्वनियाँ सिर्फ अन्य वस्तुओं का प्रतिबिंब है । इस स्थिति में व्यक्ति पूर्वाग्रहों, मनोभावों और कृत्रिमता की स्थिति में रहते हैं तथा परछाइयों के कारवां को ठीक से नहीं समझ पाते हैं । बेड़ियों में जकड़े और मुक्त होने की इच्छा न रखते हुए वे अपनी विरूपित दृष्टि को ही सही मानते हैं । 

  • गुफा में बेड़ियों से मुक्त व्यक्ति : विश्वास की अवस्था 

          बेड़ियों से मुक्त लेकिन गुफा में ही रहने वाला व्यक्ति ज्ञान के दूसरे स्तर विश्वास/मान्यता का प्रतीक है । जब कैदियों को अग्नि की ओर मोड़ा जाता है, जो सूर्य का दृश्य चित्र है और वे राह में आने वाली भौतिक वस्तुओं को देखते हैं, तो वे यह जान पाते हैं कि छायाएं महज स्वपनवत् हैं । 

  • गुफा से बाहर व्यक्ति : तर्क की अवस्था 

          जब कोई व्यक्ति गुफा से बाहर आता है तो उसका सामना ज्ञान के तीसरे स्तर तर्क से होता है । तर्क की वस्तुएं, जिनका प्रतीकन जल में सूर्य और तारों के प्रतिबिंब से होता है, प्राथमिक रूप से रेखागणित और अंक गणित की इकाइयाँ है । 

  • पूर्णतः मुक्त मानव : संज्ञान की अवस्था 

         जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क को पूरी तरह से बदलती संवेदनाओं के बंधनों से मुक्त कर लेता है, वह विशेष बौद्धिक स्तर से ज्ञान के उच्चतम स्तर संज्ञान ( Noesis ) या समझ पर पहुँच जाता है । 

इस आधार पर प्लेटो ने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि ज्ञान और कुछ नहीं बल्कि जन्म से पूर्व उपस्थित ज्ञान को अनुस्मृत करना है । 

अनुस्मरण की प्रक्रिया

         इसमें हम चार मूल चरणों से गुजरते हैं और अंततः पूर्ण ज्ञान, पूर्ण अनुस्मरण पर पहुंचते हैं, जिसका स्पष्टीकरण प्लेटो ने रेखा की उपमा से विकसित किया था तथा जो स्पष्टीकरण रिपब्लिक में भी पाया जाता है । पहले वस्तुओं के बारे में हमारा ज्ञान अस्पष्ट, आभासी और धुंधला होता है । फिर हम धीरे-धीरे निम्नीकृत ज्ञान से अपनी कल्पना के द्वारा अधिक स्पष्ट, अधिक प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं का अनुभव करते हैं । यह विश्वास की दृढ़ मान्यता का स्तर है । अगला चरण वह है जिसमें हमारा तर्क का संकाय भाग लेता है और हम तर्क और तुलना करने लगते हैं । अंत में ज्ञान के उच्चतम स्तर, विशुद्ध बौद्धिक कार्यकलाप, का क्षेत्र आ जाता है, जहाँ हम विचारों और उनके अंतर संबंधों का चिंतन करने लगते हैं । 

प्रत्ययों का सिद्धांत

         इस प्रसिद्ध सिद्धांत की मूल प्रेरणा के पीछे प्लेटो का यह प्रेक्षण था कि अनेकों 'विशेष' ( वस्तुएं ) होते हैं, जो मूल प्रकृति में प्रत्ययों में समान रूप से भागीदारी करते हैं । इनमें विभिन्न जीव, मनुष्य, घोड़ें, पौधें, खनिज आदि सम्मिलित हैं । उन्हें काम कर रहे कारीगरों से भी इस मॉडल या प्रकार को अपनाने का विचार मिला कि प्रत्येक जीव की रचना एक आदर्श प्रकार या प्रारूप या मॉडल के अनुसार हुई है ( जिसे प्लेटो प्रत्यय कहते हैं ), जिसका उपयोग किसी विश्वकर्मा या सक्रिय आत्मा ने हमारे आसपास के जगत की रचना करने के लिए किया है । जहाँ बाद के चिंतकों ने इन 'प्रत्ययों' को महज अस्तित्व बताया, वहीं प्लेटो ने उन्हें वास्तव में किसी दूसरी ‘चमकते प्रकाश की रहस्यमयी दुनिया’ में तात्विक रूप में विद्यमान माना । उनका कहना था कि प्रत्येक आदर्श प्रत्यय प्रत्येक संदर्भ में आदर्श है अर्थात् वह पूर्ण है और हम अपने आसपास के जगत में जो देखते हैं, वो और कुछ नहीं बल्कि इनकी निर्बल नकल या छायाएं है । कुछ समय तक प्लेटो यह कहने में हिचकिचाते रहे कि धूल और कीचड़ जैसी जगत की प्रत्येक वस्तु का भी एक 'आदर्श प्रत्यय' मौजूद है । अंत में उन्होंने इस सिद्धांत की तार्किक माँगों को स्वीकार किया और यह माना कि इनका भी प्रत्यय के आदर्श जगत में स्थान है । 

प्रत्ययों की भागीदारी

          जब प्लेटो इस सिद्धांत की गहराई में गए तो उन्होंने स्वीकार किया कि प्रत्यय स्वयं में पूरी तरह से असंबद्ध और बिना किसी वस्तु से जुड़े नहीं रह सकते हैं । परिणाम स्वरूप उन्होंने माना कि प्रत्यय आपस में भागीदारी करते हैं ।  उदाहरण के लिए, कुत्ते का प्रत्यय स्तनधारी जीव के प्रत्यय में और गोरैया का प्रत्यय पक्षी के प्रत्यय में भागीदारी करेगा और अन्ततः ये दोनों फिर जंतु के प्रत्यय मे भी भागीदारी करेंगे । अंततः सभी प्रत्यय सर्वोच्च प्रत्यय यानि शुभ के प्रत्यय में भागीदारी करते हैं । अब चूंकि कलाकार प्रतियों की नकल करते हैं । अतः प्लेटो के आदर्श राज्य में उनका कोई तार्किक स्थान नहीं हो सकता ।

मानव-दर्शन

  • आत्माओं का पूर्व अस्तित्व 

          जन्म से पहले मनुष्यों की आत्मा आदर्श जगत में शुद्ध और पूर्ण प्रत्ययों का अनुचिन्तन करती है । कुछ रहस्यमय दोष ( पतन ) के कारण आत्माएं संसार में जन्म लेती हैं । शरीर में कैद हो जाती हैं और प्रत्ययों के चिंतन की बुलंदी तक पहुंचने से रोक दी जाती हैं । शुद्ध ज्ञान वह है जब मानव विस्मरण पर विजय प्राप्त कर लें और उन प्रत्ययों को अनुस्मृत कर लें, भले ही वे बहुत धुंधले हों जिनका उसने कभी अनु चिन्तन किया था । 

  • दो घोड़ें 

         प्लेटो ने मानव के अवचेतन में द्वंद्व को स्पष्ट रूप से देखा और फैड्स में उन्होंने इसकी ( मानव-आत्म की ) तुलना उस सारथी से की जो उन घोड़ों की लगाम कसके नियंत्रित करने के लिए संघर्ष करता है, जो दो अलग-अलग दिशाओं में रथ को खींचना चाहते हैं । मनुष्य में चरित्र एक बौद्धिकतत्व है, जो मनुष्य के आध्यात्मिक और सांसारिक घटक रूपी में दो घोड़ों के विरोधी खिंचाव के बीच सामंजस्य रखने के लिए संघर्ष करता है । आध्यात्मिक, घटक वास्तव में अच्छा घोड़ा है, यह विनम्र और तर्क को मानने वाला है और भलाई की दिशा में बढ़ता है । लेकिन सांसारिक घटक उम्र और निरंकुश है और उसे सिर्फ चाबुक से ही काबू में किया जा सकता है । 

  • मरणोपरांत जीवन 

          यदि शरीर आत्मा की कैद है तो मृत्यु उसकी हर्षपूर्ण मुक्ति का क्षण है । यह वह घड़ी है जब आत्मा अंततः शरीर से मुक्त हो जाती है । आत्मा की अमरता को इस तथ्य से उचित ठहराया जा सकता है कि शरीर के विपरीत यह अंगों में विभाजित नहीं होती है । रिपब्लिक के ‘मिथ ऑफ एर’ में प्लेटों ने अपने मर्णोपरान्त जीवन सम्बधी विज्ञान को प्रस्तुत किया है । वह आत्माओं के पारगमन में यकीन रखते थे । अंततः आत्मा एक चरम और अपरिवर्तनीय प्रतिफल में निवास करने लगती है और जहाँ अच्छाई ( अच्छी आत्मा ) एक प्रकार के स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है और बुराई ( बुरी आत्म ) पाताल यंत्रणा के लिए भेज दी जाती हैं । 

ईश्वर विचार

         विश्व उत्पन्न हुआ है । अतः इसका अवश्य ही कोई कारण होगा । परिणाम स्वरूप प्लेटो ने विश्वकर्मा ( Demiurge ) का तर्क दिया । विश्वकर्मा शाश्वत् प्रत्ययों के प्रतिमान के अनुरूप वस्तुओं को बनाता है । प्लेटो उच्चतम प्रत्यय, शुभ और सौंदर्य के प्रत्यय की बात करते हैं । परन्तु उन्होंने इस प्रत्यय को स्पष्ट रूप से ईश्वर नहीं कहा है । 

आचरण और राजनीति का दर्शन

         सुकरात से प्लेटो ने नीतिपरक जीवन के आधार का निर्धारण करने की विकट समस्या को विरासत में लिया । नैतिकता प्राकृतिक ( फिसिस ) है या फिर प्रथा ( nomos ) ? पुराने समय में इसे प्राकृतिक माना जाता था । इसकी उत्पत्ति ईश्वरीय मानी जाती थी, लेकिन फिर भी मानवीकृत देव इसे प्रदान नहीं कर सकते थे । सोफिस्टों के अनुसार नैतिक नियमों/कानूनों को मनुष्यों द्वारा बनाया गया था और संभवतः उन्हें उसी आसानी से बदला भी जा सकता था । धीरे-धीरे इन विचारों को गति मिल गई । इसके कारण सामाजिक विद्रोह की जो आंधी उठी उसने उन स्थिर नैतिक परंपराओं को क्षति पहुंचाई जिन पर नगर-राज्य का क्रमबद्ध विकास काफी हद तक निर्भर करता था । जब मानवीकृत देवों का प्रभाव कम हुआ तो नगर-राष्ट्र के पुनरुद्धार के लिए कुछ ऐसे नए अनुभवातीत सिद्धांतों की आवश्यकता महसूस हुई जो राजनीतिक ढाँचे की सुव्यवस्था तथा कानूनों की वैधता को आधार प्रदान कर सके ।

प्रेम की प्रकृति

         ‘द सिम्पोजियम’ में प्लेटो ने प्रेम की प्रकृति को बताया है । उन्होंने प्रश्न किया प्रेमी कौन है ? प्रेमी वह है जो चिर अस्थाई प्रसन्नता प्रदान करने वाली वस्तुओं से वंचित है । प्रेम करने वाले को प्रसन्नता शाश्वत शुभ और सुन्दरता की प्राप्ति से होती है ( प्यार इन्हीं शाश्वत मूल्यों की अनुपलब्धता और इन्हें प्राप्त करने की योग्यता से उत्पन्न होता है ) । यह इन मूल्यों को प्राप्त करने की लालसा से संचालित योग्यता या साधन सम्पन्नता ही प्रेमी को प्यार की सीढ़ी पर ऊपर पहुंचाती है । प्रेम के प्रत्येक चरण में प्रेमी सिर्फ आंशिक रूप से संतुष्ट होता है और इसलिए वह सशक्त रूप से यह खोजने के लिए प्रेरित होता है कि क्या इससे अधिक संतुष्टीदायक भी कुछ है । जगत् में रहने के कारण वह उस सौंदर्य से आरंभ करता है जो उसे जगत में दिखाई देता है । सुंदर लड़की या लड़का प्रेम में पड़ते हैं, लेकिन वे पाते हैं कि यह सौंदर्य विशिष्ट नहीं है । धीरे-धीरे प्रेमी अधिक सुंदर आत्मा, गुण, नियमों और संस्थाओं के सौंदर्य की ओर बढ़ता है और अंत में वह शुभ के विचार की ओर प्रस्थान करता है । इस पूरी प्रक्रिया में प्रेम ही वह तत्व है जो सौंदर्य के अवलोकन तक पहुँचने के लिए आवश्यक गति और संवेग प्रदान करता है । इस बाद वाले विचार की स्थापना सिम्पोजियम में की गई है । 

न्याय

         अपने दर्शन में प्लेटो न्याय के विचार को प्रमुख स्थान देते हैं । प्लेटो ऐथेन्स की मौजूदा विघटनकारी स्थिति से अत्यधिक असंतुष्ट थे । एथेन्स का प्रजातंत्र नष्ट होने की कगार पर था और अंततः सुकरात की मृत्यु के लिए जिम्मेदार था । आत्म-संतोष की नीति के संदर्भ में सोफिस्टों के शिक्षण के कारण अत्यधिक व्यक्तिवादी सोच विकसित हो गई थी । इस व्यक्तिवादी दृष्टि में नागरिकों को अपने स्वार्थी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्र की कार्यकारी ईकाइयों को अपने कब्जे में लेने के लिए प्रेरित किया । सोफिस्टों के अनुसार न्याय के नियम महज प्रथाऐं थी । उनके अनुसार आदर्श न्याय की कल्पना ऊँचे दर्जे की बेवकूफी थी । उचित एवं न्यायपूर्ण वही है जो स्वयं के लिए लाभदायक हो, अपने जीवन के लिए सबसे लाभदायक हो, अधिकांश व्यक्तियों का ऐसा ही मत प्रतीत होता था । यद्यपि, प्लेटो का यह मानना था कि न्याय का एक आदर्श है, जिसे हम सबको यथासंभव अपनाना चाहिए । उनके अनुसार सुकरात की भर्त्सना भले ही कानूनी तौर पर ठीक थी, लेकिन उचित नहीं थी । रिंग ऑफ गाइजीस ( Ring of Gyges ) के मिथक में, उस एक गड़रिया का वर्णन है, जो अधोलोक में पहुंच गया और उसे वहाँ शव पर एक अंगूठी मिली जिसका मुख उसकी तरफ होने पर वह अदृश्य हो जाता था और बाहर की ओर होने पर दृश्य हो जाता है । इस अंगूठी की सहायता से उसने राजा की पत्नी के साथ व्यभिचार किया । राजा को मार दिया और बाद में उसका राज्य हड़प लिया । गड़रिया उचित नहीं था, क्योंकि उसका अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं था । प्लेटो के अनुसार आदर्श समाज वह है जिसमें 'न्याय' का सर्वोच्च स्थान हो । प्लेटो के अनुसार न्याय की प्रकृति सुव्यवस्थित समाज का मौलिक सिद्धांत है । प्लेटो के अनुसार न्याय वह मानवीय गुण है, जो व्यक्ति को स्व-संयमित और अच्छा बनाता है । सामाजिक रूप से न्याय एक सामाजिक चेतना है, जो समाज को आंतरिक रूप से सौहार्दपूर्ण और अच्छा बनाती है । 

राष्ट्र

         प्लेटो के दार्शनिक मतों, विशेषरूप से आदर्श राष्ट्र या सरकार के संदर्भ में अनेक सामाजिक निहितार्थ थे । कुछ सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत रिपब्लिक के साथ-साथ लॉज और स्टेट्समेन में हैं । इनमें प्लेटो ने कहा है कि समाजों की त्रिभाजी वर्ग संरचना है, जो वैयक्तिक आत्मा की त्रिसंरचना यानि क्षुधा या लालसा, भावना, तर्क के संगत है । व्यक्ति अपने कौशलों और क्षमताओं में भिन्न होते हैं । उन्हें तीन वर्गों में समूहित किया जा सकता है – 

  1. कुछ श्रमिक, बढ़ई, किसान आदि होने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होते हैं । इनमें क्षुधा प्रभावी होती है । 
  2. अन्य जो रोमांच प्रिय, बलवान, साहसी और खतरों को पसंद करने वाले होते हैं, वे राष्ट्र का सुरक्षात्मक भाग बनाते हैं । इनमें भावना का भाग प्रभावी होता है । 
  3. कुछ जो बुद्धिमान, तर्कसंगत, स्व-नियंत्रित, बुद्धि से प्रेम करने वाले होते हैं, उनमें आत्मा का तार्किक भाग नियंत्रणकारी भाग होता है । 

          विभाजन का यह मॉडल ऐथेन्स के वर्तमान प्रजातंत्र के सिद्धांतों ( जैसे कि वे आज विद्यमान हैं ) के विपरीत है । क्योंकि इस विभाजन के अनुसार नगर-राज्य के सिर्फ कुछ ही नागरिक शासन करने के लिए अनुकूल सिद्ध होते हैं । प्लेटो का कहना था कि व्याख्यानशास्त्र और अनुनय की बजाय तर्क और बुद्धि का शासन होना चाहिए । प्लेटो के शब्दों में, "जब तक दार्शनिक राजा के रूप में शासन नहीं करेंगे अथवा वे लोग, जो आज राजा या प्रभावशाली व्यक्ति कहलाते हैं, ईमानदारी और निष्ठा से दार्शनिक सोच नहीं रखेंगे अर्थात जब तक राजनैतिक शक्ति और दर्शन पूरी तरह से एकरूप नहीं होंगे और अनेक राजा, जो वर्तमान में या तो शासक की दृष्टि से या फिर दार्शनिक की दृष्टि से शासन करते हैं, शासन करते रहेंगे और यदि किसी भी शासक को इन दोनों दृष्टियों के एकीकरण से बलात् रोका जाता रहेगा, तब तक नगरों को बुराइयों से छुटकारा नहीं मिलेगा और न ही मैं समझता हूँ कि मानव जातियों को छुटकारा मिलेगा।" 

प्लेटो की प्रजातंत्र की आलोचना

          प्रजातंत्र में शासकों को उनके गुणों के कारण नहीं, बल्कि उनके तरीके, आवाज, रंगरूप की सुंदरता आदि के लिए चुना जाता है । वे ऐसे रसोइयों की तरह होते हैं, जो दावा करते हैं कि रोगी के लिए श्रेष्ठ भोजन क्या है, जबकि इस प्रकार के किसी भी निर्धारण के लिए चिकित्सक का होना आवश्यक है, न की रसोइये का । यद्यपि विशेष रूप से प्रशिक्षित संभ्रांत वर्ग के हाथों में सर्वोच्च सत्ता केवल तभी सौंपनी चाहिए जब –

  1. मनुष्यों की बौद्धिक क्षमताओं में अपरिवर्तनीय अंतर हो 
  2. यदि इन अंतरों का पता जीवन के आरंभिक वर्षों में ही चल जाए 
  3. यदि उन्हें निश्चित एवं असंदिग्ध राजनैतिक सिद्धांतों को पूर्ण ज्ञान कराना सम्भव हो और 
  4. संभ्रांत जन, ये जानते हों कि सबके लिए क्या अच्छा है और उसी के अनुसार कार्य करें । 

चूँकि हम जानते हैं कि इसकी संभावना कम ही है, इसलिए प्लेटो की आदर्श राष्ट्र की अवधारणा सदैव एक आदर्शलोक की अवधारणा रहेगी, जिसके आदर्श सदैव संदिग्ध रहेंगे । 

कला का दर्शन

        कला के सिद्धांत का निर्धारण भी प्रत्यय-सिद्धांत ( Theory of Idea ) द्वारा होता है । कोई वस्तु उसी हद तक सुंदर होती है, जहाँ तक वह सौंदर्य के प्रत्यय में भागीदारी करती है । प्लेटो के अनुसार विश्व में सर्वत्र व्याप्त व्यवस्था सौंदर्य को प्रस्तुत करती है । जो कलाकार कृत्रिम जगत् ( प्रतिलिपि ) को महिमामंडित करता है वह उस रसोइए और व्याख्यान शास्त्री की तरह है जो मात्र अनभिज्ञ मनुष्यों की कल्पनाशक्ति को गुदगुदा कर अपर्याप्त कला प्रदान करता है । जिन कलाकृतियों को हम कलात्मक कार्य कहते हैं वे और कुछ नहीं बल्कि परछाइयों ( कृत्रिम भौतिक जगत् ) की परछाइयाँ मात्र हैं ।

प्लेटों के प्रमुख दार्शनिक विचार

  • सामान्य आदर्श ( प्रत्यय ) का अर्थ ऐसे सामान्यों से है जो स्वतंत्र रूप से विशेषों ( वस्तुओं ) से अलग अपनी निजी दुनिया में पाएं जाते । 
  • सामान्य वह है, जो ' विशेष ' ( वस्तु ) के समूह को निर्दिष्ट करता है ।
  • केवल सामान्य ही वास्तविक तत्त्व है । 
  • सामान्य मूर्त व्यष्टि है । 
  • यदि कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ नहीं है, तो कोई भी पदार्थ नहीं होगा, जिसके स्वरूप को चक्रीय कहा जाए । 
  • चक्रियता भौतिक जगत् में विद्यमान नहीं होती है । 
  • सचनुच वास्तविक वे आकार होते है जिन्हें केवल बौद्धिक रूप से ग्रहण किया जा सकता है । 
  • जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते है, वे सत्यात्मक तथ्य नहीं है । 
  • आकार किसी के मन का प्रत्यय या संप्रत्यय है । 
  • संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है । 
  • न्याय आत्मा का गुण है । 
  • नैतिकता शाश्वत परम्परा मात्र नहीं है । 
  • सामूहिकता की आत्मा को व्यक्ति को व्यक्त करना चाहिए । 
  • न्याय मुख्य सद्गुण है । 

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प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 428 ई० पू० से 347 ई० पू० तक 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "ज्ञान ही धर्म (सद्गुण) है और अज्ञान अधर्म"

प्रमुख उपाधि - पूर्ण ग्रीक ( The Complete Greek ) की उपाधि  

प्रमुख कथन

1- आदर्श (प्रत्यय) का अर्थ ऐसे समान्यों से है जो स्वतंत्र रूप से विशेषो (वस्तुओं) से अलग अपनी निजी दुनिया में पाए जाते है । 

2- सामान्य वह है जो विशेष (वस्तु) के समूह को निर्दिष्ट करता है । 


प्लेटो का जीवन

          पेलोपोनेसियन युद्ध ( 428/27 ई. पू. ) के चौथें या पांचवें वर्ष में प्लेटो का जन्म ऐथेन्स में हुआ था । वह जन्म से ही अभिजात्य थे । उन्हें पहले एरिस्टोकल्स कहा जाता था, लेकिन बाद में प्लेटो ( व्यापक ) नाम दे दिया गया था । यह ज्ञात नहीं है कि उन्हें यह नाम उनके चौड़े मस्तक, बलशाली शरीर या साहित्यिक अभिव्यक्ति के कारण दिया गया था या किसी अन्य कारण से । बीस वर्ष की आयु में में सुकरात के संपर्क में आए और यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ । सुकरात की मृत्यु के बाद वह मेगरा चले गए, जहाँ उन्होंने यूक्लीड के अंतर्गत ऐलियेटिक दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया । बाद में वह एथेन्स लौट आए जहाँ उन्होंने पहली पुस्तक लिखी । 390 ई. पू. से 388 ई. पू. के बीच, उन्होंने व्यापक रूप से यात्राएं करके विभिन्न प्रमुख विचारधाराओं के बारे में जाना और अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाया । सिरेक्यूस के डायनीसियास प्रथम के सभागार का दौरा करने के बाद उन्होंने उस तानाशाह की खुलकर भर्त्सना की और उसके लिए उन्हें दास के रूप में बेच दिया गया । सीरोन के एक अजनबी एनीसेरिस द्वारा ऐजिनियां के बाजार से छुड़ाए जाने के बाद वो एथेन्स लौट आए । लगभग 387 ई. पू. में उन्होंने एकेडेमस में एक प्रसिद्ध विद्यापीठ की स्थापना की ( तभी से एकेडमी नाम प्रचलित हुआ ) । जहाँ वह व्याख्यान और संवादों के जरिए विज्ञान और दर्शन पढ़ाते थे । 367 और 361 ई. पू. में प्लेटो 'आदर्श राज्य की अवधारणा’ को समझने के उद्देश्य से सिरेक्यूस चले गए, जिससे ऐकेडिमी के कार्य में बाधा आई । व्यवहारिक शासन कला जैसे आदर्श राज्य की स्थापना करने के असफल प्रयासों के बाद प्लेटो एथेन्स वापस आ गए और उन्होंने अपना सारा ध्यान एकेडमी में दर्शन शास्त्र के शिक्षण और लेखन पर केंद्रित कर दिया । उनकी मृत्यु 348 / 7 ई. पू. में 80/1 वर्ष की उम्र में हुई और उन्हें एकेडमी के मैदान में दफना दिया गया । लेकिन उनका दर्शन जीवित रहा । इसके आधार पर उनके अपने शिष्य अरस्तू ने ज्ञान की एक विद्या दर्शनशास्त्र की नीव रखी । वास्तव में ढीले शब्दों में कहे तो प्रत्येक वह व्यक्ति जो थोड़ा भी दर्शनशास्त्र के बारे में सोचता है वह या तो 'प्लेटोवादी' है या फिर 'अरस्तूवादी’ । एल्फ्रेड नोर्थ व्हाइटहैड ने ऐसे ही नहीं लिखा था कि "यूरोपीय दार्शनिक परंपरा का सबसे सुरक्षित सामान्य चरित्रीकरण यह है कि वह प्लेटो की टिप्पणियों की श्रृंखला मात्र है ।" 

प्लेटो के लेखन 

           टेबेरियस सम्राट के एक समकालीन थैरेसिलस के नाटक चतुष्टयों ( टेट्रालोजीस ) में व्यवस्थित प्लेटो के पारंपरिक सिद्धांतों में पैंतीस संवाद और तेरह पत्र हैं, जो एक एकल समूह के रूप में 36 पुस्तकों में हैं । इनमें से कुछ लेखनों की प्रामाणिकता विवादास्पद है । 

प्लेटो के विचारों का कालानुक्रमिक विकास 

आरंभिक सुकरात काल ( 399-388 / 7 ई. पू. )

       ये संवाद सुकरात के नैतिक-राजनैतिक सदगुणों की पड़ताल और नैतिक अवधारणाओं के उनके विश्लेषण की भावना और उद्देश्य को पुनः जाग्रत करते हैं । सामुहिक रूप से ये रचनाएं मुख्यतः सोफिस्ट विरोधी है तथा एक प्रकार से सुकरात की अनभिज्ञता को प्रदर्शित करती है । इनमें से अधिकांश लेख बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे एवं आगे और अधिक बौद्धिक विचार विमर्श की आवश्यकता पर जोर देते हुऐ समाप्त हो जाते हैं । 

  1. एपोलोजी - सुकरात पर अभियोग और बचाव 
  2. क्रिटिओ - सुकरात का अभियोग के विरूद्ध बचाव के लिए मना करना और सिद्धांतों पर अडिग रहना ।
  3. यूथीफ्रो - ईश्वरभक्ति और ईशनिन्दा की प्रकृति पर, जिसके लिए सुकरात पर अभियोग चलाया गया । 
  4. लाखेस - साहस पर । 
  5. आयन - कवियों और चारण गीतकारों के विरुद्ध । 
  6. प्रोटागोरस - सोफिस्टों का यह सिद्धांत कि कला ( orte ) को सिखाया जा सकता है बनाम सुकरात का सिद्धांत या पेइडिया कि सभी सद्गुण ईश्वरप्रदत हैं और सिखाए नहीं जा सकते हैं । 
  7. खारमीदिस - संयम और नियंत्रण पर 
  8. लाइसिस - मैत्री पर । 

संक्रामी काल ( 387-380 ई.पू. )

     प्लेटो ने अपनी विकसित बौद्धिक और साहित्यिक क्षमता से न केवल सोफिस्टों के विरूद्ध अपनी तार्किक परिचर्या को तीव्र किया, बल्कि तत्वमीमांसीय प्रत्यय सिद्धान्त की सुकराती अवधारणा को भी स्थापित किया । जहाँ पहले के संवाद सद्गुण के एक पक्ष तक सीमित थे, वहीं इस सृजनात्मक अवस्था के संवादों ने ज्ञान और अच्छे जीवन के बारे में अधिक महत्वपूर्ण प्रश्नों सम्बंधित विचारों को व्यापक और गहन बनाया । यह उनके सुव्यवस्थित दर्शनशास्त्र की शुरुआत थी । 

  1. गोर्गीअस - न्याय पर और नगर-राज्य में सोफिस्टों के शब्दाडम्बर और सत्ता की राजनीति के विरुद्ध | 
  2. मीनो - ऐनामनेसिस या अनुस्मरण सम्बंधित "सद्गुण-ज्ञान” के प्रश्न पर 
  3. एथीडीमस - प्रज्ञा पर जो प्रसन्नता लाती है और उत्तर सोफिस्टों की तार्किक भ्रांतियों के विरूद्ध । 
  4. लेसर हिप्पिआस - जानबूझकर अथवा अनजाने में गलतियाँ करने वालों के बीच तुलना । 
  5. ग्रेटर हिप्पिआस - सौंदर्य पर और भाषा सिद्धांत पर । 
  6. क्रेटीलस - भाषा पर और अपरिवर्तनीय तथा अबोधगम्य सत्ताओं और परिवर्तनीय तथा बोधगम्य तथ्यों के बीच अंतर पर । 
  7. मेनीजीनस - अंत्येष्टि प्रार्थनाओं में शब्दाडंबर पर विद्रूप ( पैरोडी ) 

परिपक्वता का काल ( 380-361 ई.पू. )

      अपने बौद्धिक विकास के चरम पर प्लेटो ने पूरी तरह से अपना निजी प्रत्ययों का सत्तामूलक सिद्धांत विकसित कर लिया और इस सिद्धांत की शाखाओं को ज्ञानमीमांसा, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, राजनीति और सौन्द्रयशास्त्र में अभिव्यक्त किया । अतः संवादों के तीसरे समूह में वे संवाद है जो या तो नए क्षेत्रों में चिंतनशील अंतर्दृष्टि डालते हैं । अथवा दूसरों के दृष्टिकोण से उत्पन्न तथ्यों और कठिनाइयों को बताते हैं । 

  1. सिम्पोज़ियम ( या बैंकेट ) - आत्मा की इरोस ( प्रेम ) जनित प्रेरणा पर उसका ( इरोस को ) आभासी से वास्तविक सौंदर्य तक का उत्थान 
  2. फीडो - प्रत्यय के सिद्धांत का अधिक स्पष्ट प्रकटन, अमरता और आत्मा की नियति सुकरात के अंतिम दिनों के सिद्धांतों के विरुद्ध परिचर्चाएं ।
  3. रिपब्लिक - आदर्श राज्य, शुभ की प्रधानता संज्ञान की चार श्रेणियाँ और आत्मा के त्रिभाजन पर । 
  4. फेड्स - दार्शनिक शब्दाडंबर, आत्मा, उसका पुनर्जन्म, पूर्व-अस्तित्व में प्रत्ययों की समझ, अनुस्मरण और प्रत्ययों के जगत की संरचना । 
  5. थिएटेट्स - ज्ञान का अपरिवर्तनीय विषयों से और अन्य बोधगम्य अनुभवों जैसे संवेदी-प्रत्यक्ष और सही मत से सम्बंध । 
  6. परमेनाइड्स - प्रत्यय के सिद्धांत का बचाव और गणितीय तथा मूल्याश्रित अवधारणाओं की प्रस्तुति एक और अनेक की समस्या । 
  7. सोफिस्ट - प्रत्ययों और परिवर्तन, जीवन, आत्मा, बौद्धिकता पर आलोचनात्मक दृष्टि और सोफिस्ट को परिभाषित करने की विश्लेषणात्मक खोज | 

वृद्धावस्था काल

      दार्शनिक परिपक्वता के बाद के काल में जब उनकी शारीरिक क्षमताएं कम हो गई और आलोचनात्मक बुद्धि कौशल बढ़ गया, तो प्लेटो अपने दर्शनशास्त्र को परिष्कृत करने के लिए नई समस्याओं और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों पर विचार करने लगे । उत्कृष्ट बौद्धिक समझ के साथ उन्होंने आलोचनात्मक ढंग से अपने तर्क शास्त्र को विस्तारित किया और ब्रह्मांड के प्रश्नों में नई दिलचस्पी पैदा की । 

  1. स्टेट्समेन ( या पोलिटिकस ) - विभाजन की विधि से स्टेटसमेन की परिभाषा, वास्तविक शासक में ज्ञान का महत्व । 
  2. फिलेबस - अच्छाई के सुख की ठोस स्थितियों पर ध्यानाकर्षित करके प्लेटो के नीतिशास्त्र का विकास, एकता और अनेकता के और अधिक अध्ययन द्वारा विचारों के सिद्धांत का वर्धन । 
  3. टिमेअस - भौतिक जगत की उत्पत्ति और डेमोअर्स की भूमिका पर ब्रहमांडीय निबंध । 
  4. क्रिटिआस - आदर्श अवस्था से एटलांटिस तक साम्राज्यवादी समुद्र शक्ति सहित विरोधाभास । 
  5. लॉज - जीवन की मूर्त स्थितियों के अनुसार रिपब्लिक की आदर्श अवस्था में रूपान्तरण । 
  6. एपीनोमिस - कानूनों की सतत्ता, शासक के बुद्धिकौशल और ईश्वरीय-भक्ति पर । 
  7. लैटर्स VII और VIII - राजनीति और प्रत्ययों की प्रासंगिकता पर 

प्लेटो के समक्ष आई दार्शनिक समस्याएं 

       थेलस द्वारा उठाये गये प्रश्नों से लेकर प्लेटो के काल तक दार्शनिक चिंतन में अनेक समस्याएं आई, जैसे कि – 
  • एक और अनेक की समस्या 
  • अभास और सत् की समस्या 
  • स्थायित्व और परिवर्तन की समस्या 
  • पाइथागोरस के अनुयाइयों का रहस्यवाद और गणित
  • फिसिस और नोमोस 
  • सोफिस्टों का संशयवाद 
राजनैतिक रूप से भी निम्न परिवर्तन हुए, जैसे कि 
  • एथेन्स का पतन 
  • भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद 
  • प्रजातंत्र का आविर्भाव 
  • सुकरात की भर्त्सना 
       प्लेटो ने माना कि उनके पूर्ववर्तियों द्वारा अपनाऐ गये दार्शनिक मतों में कुछ सच्चाई हैं तथा उन सभी को सत् की प्रकृति का प्रमाणिक अंतर्ज्ञान ज्ञान था । 

स्थिति 

         प्लेटो को मनुष्य जगत और देवत्व की समस्याओं का सामना ग्रीक के नगर-राज्यों के नैतिक-राजनैतिक संदर्भ में करना पड़ा । प्लेटो ने अपनी उम्र के सत्तर के दशक के मध्य में मित्रों और डिओन के सहयोगियों को लिखे गये मेनीफेस्टो व्हेन आई वॉस यंग में लिखा है कि ' मेरे अनुभव अनेकों अन्य लोगों के अनुभवों के समान ही थे । मैंने सोचा था कि जैसे ही मैं स्वयं अपनी मर्जी का मालिक हो जाऊँगा, मैं सामाजिक जीवन में प्रवेश कर लूँगा । लेकिन हुआ यह कि राजनैतिक स्थिति में दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तन हो गये । प्लेटो और आगे अग्रलिखित वस्तु स्थितियों का वर्णन करना चाहते थे, टाइरेंट ऑफ थर्टी, प्रजातंत्रियों द्वारा सुकरात की अन्यायपूर्ण भर्त्सना, हमारे पूर्वजों के सिद्धांतों का परित्याग, कानून और रीतिरिवाजों में भ्रष्टाचार का बढ़ना, संक्षेप में मेरे ( उसके ) आसपास की विघटित हो रही प्रत्येक वस्तु एवं घटना । ऐथेन्स और अन्य नगरों के इस पूर्ण समेकित पतन से अचंभित "मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि वे सभी बुरे शासन की चपेट में हैं" । 

नीतिशास्त्र से तत्वमीमांसीय और गूढ़विज्ञानी समस्याओं की ओर संक्रमण 

             प्लेटो ने देखा कि राजनीति के मौलिक सिद्धांतों में कोई वास्तविक सुधार व्यक्ति की प्रकृति और स्वयं वास्तविकता के बारे में उसकी संकल्पनाओं में संगत सुधार के बिना नहीं हो सकता है । प्लेटों प्रायः सोचते रहते थे कि क्या वास्तव में, पूर्ण न्याय अथवा साहस का तात्विक अस्तित्व होता है अथवा सिर्फ व्यक्ति के न्यायपूर्ण और साहसी कार्यों का ही अस्तित्व होता है ? वास्तव में, अच्छा, सुंदर आदि क्या है ? सत् क्या है ? वह विश्व में गणितीय अनुपात और वास्तविक सामंजस्य द्वारा अत्यधिक प्रभावित थे ।

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अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  तर्क शास्त्र           अरस्तू तर्क शास्त्र के क्षेत्र के वास्तविक अन्वेषक थे ।...