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| प्लेटो ( Plato ) का दर्शन |
प्लेटो ( Plato ) का दर्शन
ज्ञान का सिद्धांत
सर्वप्रथम, प्लेटो नकारात्मक रूप से तर्क करते हुए कहते हैं कि कुत्ते के लिए भी ज्ञान महज संवेदन नहीं हो सकता है । उनका मानना था कि जिसमें संवेदन होगा, उसमें ज्ञान भी होगा । उनके ज्ञान के सकारात्मक सिद्धांत को प्रसिद्ध दृष्टांत "एलीगरी ऑफ द केव" द रिपब्लिक बुक में दिया गया है ।
गुफा का दृष्टांत ( The Allegory of the Cave )
प्लेटो अपनी प्रस्तुति ऐसे वृतान्त से शुरू करते हैं, जिसमें जिसे लोग वास्तविक समझते है, वह वास्तव में भ्रम होता है । उन्होंने ग्लॉकोन से कहा कि वह एक ऐसी गुफा की कल्पना करें जिसमें वे कैदी हो जिन्हें बचपन से ही बेड़ियों में जकड़कर स्थिर रखा गया हो । न सिर्फ उनके हाथों और पैरों को बांध कर रखा गया हो, बल्कि उनके सिर भी स्थिर हो और वे अपने सामने की दीवार को टकटकी बांधकर देखने के लिए विवश हो । कैदियों के पीछे आग हो और कैदियों और आग के बीच में एक ऊँचा गलियारा जिसमें अनेक जानवरों, पौधों और अन्य वस्तुओं के पुतले गतिशील हो । पुतलों की परछाई दीवार पर पड़े और कैदी इन परछाइयों को देखें । वे गलियारे में होने वाले शोर की गूंज को दीवारों से सुनें । ऐसे में यह सोचना उचित ही होगा कि कैदियों को वे परछाइयाँ वास्तविक वस्तुएँ और गूंज वास्तविक ध्वनियां लगेंगी । मान लीजिए कि उनमें से एक कैदी मुक्त हो जाता है और उन वस्तुओं को देखता है, जिनकी परछाई दीवार पर पड़ रही थी । तब वह उन्हें नहीं पहचान पाएगा और वह मानेगा कि दीवार पर पड़ने वाली परछाइयाँ अधिक वास्तविक हैं, जिन्हें उसने पहले देखा है । मान लीजिए अगर उन लोगों को अग्नि को देखने के लिए बाध्य किया जाए, तो वो कुछ देख नहीं पाएंगे और पुनः परछाइयों को देखने लगेंगे, क्योंकि उन्हें वो स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और सत्य मानते हैं । मान लीजिए, कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को बलात् खींचकर बाहर धूप में ले जाए तो वह व्यथित हो जाएगा और किसी भी वस्तु को नहीं देख पाएगा । धीरे-धीरे वह तारों आदि के प्रतिबिम्ब को अपने सामने रखे जल के कुंड में देख पाएगा । यद्यपि कुछ समय तक सतह पर रहने के बाद मुक्त कैदी अनुकूलित हो जाएगा । वह अपने आसपास की अधिक से अधिक चीजों को देख पाएगा । उसके बाद वह ऊपर सूर्य को देखेगा । वह समझ जाएगा कि सूर्य ही ऋतुओं और वर्षों के होने का स्रोत है और दृश्य जगत की सभी चीजों का संचालक है और किसी न किसी रूप में उन सभी चीजों का कारण है जो वह और उसके साथी देखते रहे हैं ।
दृष्टांत का अर्थ
गुफा का दृष्टांत ज्ञान के चार स्तरों का प्रतीक है, जिनके द्वारा मन प्रत्ययों को जानता है । प्रत्येक स्तर गुफा के अंदर और बाहर मनुष्य की विशेष अवस्था को प्रदर्शित करता है ।
- बेड़ियों में मनुष्य : कल्पना की अवस्था
यह ज्ञान का पहला स्तर है । परछाइयाँ और प्रतिध्वनियाँ सिर्फ अन्य वस्तुओं का प्रतिबिंब है । इस स्थिति में व्यक्ति पूर्वाग्रहों, मनोभावों और कृत्रिमता की स्थिति में रहते हैं तथा परछाइयों के कारवां को ठीक से नहीं समझ पाते हैं । बेड़ियों में जकड़े और मुक्त होने की इच्छा न रखते हुए वे अपनी विरूपित दृष्टि को ही सही मानते हैं ।
- गुफा में बेड़ियों से मुक्त व्यक्ति : विश्वास की अवस्था
बेड़ियों से मुक्त लेकिन गुफा में ही रहने वाला व्यक्ति ज्ञान के दूसरे स्तर विश्वास/मान्यता का प्रतीक है । जब कैदियों को अग्नि की ओर मोड़ा जाता है, जो सूर्य का दृश्य चित्र है और वे राह में आने वाली भौतिक वस्तुओं को देखते हैं, तो वे यह जान पाते हैं कि छायाएं महज स्वपनवत् हैं ।
- गुफा से बाहर व्यक्ति : तर्क की अवस्था
जब कोई व्यक्ति गुफा से बाहर आता है तो उसका सामना ज्ञान के तीसरे स्तर तर्क से होता है । तर्क की वस्तुएं, जिनका प्रतीकन जल में सूर्य और तारों के प्रतिबिंब से होता है, प्राथमिक रूप से रेखागणित और अंक गणित की इकाइयाँ है ।
- पूर्णतः मुक्त मानव : संज्ञान की अवस्था
जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क को पूरी तरह से बदलती संवेदनाओं के बंधनों से मुक्त कर लेता है, वह विशेष बौद्धिक स्तर से ज्ञान के उच्चतम स्तर संज्ञान ( Noesis ) या समझ पर पहुँच जाता है ।
इस आधार पर प्लेटो ने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि ज्ञान और कुछ नहीं बल्कि जन्म से पूर्व उपस्थित ज्ञान को अनुस्मृत करना है ।
अनुस्मरण की प्रक्रिया
इसमें हम चार मूल चरणों से गुजरते हैं और अंततः पूर्ण ज्ञान, पूर्ण अनुस्मरण पर पहुंचते हैं, जिसका स्पष्टीकरण प्लेटो ने रेखा की उपमा से विकसित किया था तथा जो स्पष्टीकरण रिपब्लिक में भी पाया जाता है । पहले वस्तुओं के बारे में हमारा ज्ञान अस्पष्ट, आभासी और धुंधला होता है । फिर हम धीरे-धीरे निम्नीकृत ज्ञान से अपनी कल्पना के द्वारा अधिक स्पष्ट, अधिक प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं का अनुभव करते हैं । यह विश्वास की दृढ़ मान्यता का स्तर है । अगला चरण वह है जिसमें हमारा तर्क का संकाय भाग लेता है और हम तर्क और तुलना करने लगते हैं । अंत में ज्ञान के उच्चतम स्तर, विशुद्ध बौद्धिक कार्यकलाप, का क्षेत्र आ जाता है, जहाँ हम विचारों और उनके अंतर संबंधों का चिंतन करने लगते हैं ।
प्रत्ययों का सिद्धांत
इस प्रसिद्ध सिद्धांत की मूल प्रेरणा के पीछे प्लेटो का यह प्रेक्षण था कि अनेकों 'विशेष' ( वस्तुएं ) होते हैं, जो मूल प्रकृति में प्रत्ययों में समान रूप से भागीदारी करते हैं । इनमें विभिन्न जीव, मनुष्य, घोड़ें, पौधें, खनिज आदि सम्मिलित हैं । उन्हें काम कर रहे कारीगरों से भी इस मॉडल या प्रकार को अपनाने का विचार मिला कि प्रत्येक जीव की रचना एक आदर्श प्रकार या प्रारूप या मॉडल के अनुसार हुई है ( जिसे प्लेटो प्रत्यय कहते हैं ), जिसका उपयोग किसी विश्वकर्मा या सक्रिय आत्मा ने हमारे आसपास के जगत की रचना करने के लिए किया है । जहाँ बाद के चिंतकों ने इन 'प्रत्ययों' को महज अस्तित्व बताया, वहीं प्लेटो ने उन्हें वास्तव में किसी दूसरी ‘चमकते प्रकाश की रहस्यमयी दुनिया’ में तात्विक रूप में विद्यमान माना । उनका कहना था कि प्रत्येक आदर्श प्रत्यय प्रत्येक संदर्भ में आदर्श है अर्थात् वह पूर्ण है और हम अपने आसपास के जगत में जो देखते हैं, वो और कुछ नहीं बल्कि इनकी निर्बल नकल या छायाएं है । कुछ समय तक प्लेटो यह कहने में हिचकिचाते रहे कि धूल और कीचड़ जैसी जगत की प्रत्येक वस्तु का भी एक 'आदर्श प्रत्यय' मौजूद है । अंत में उन्होंने इस सिद्धांत की तार्किक माँगों को स्वीकार किया और यह माना कि इनका भी प्रत्यय के आदर्श जगत में स्थान है ।
प्रत्ययों की भागीदारी
जब प्लेटो इस सिद्धांत की गहराई में गए तो उन्होंने स्वीकार किया कि प्रत्यय स्वयं में पूरी तरह से असंबद्ध और बिना किसी वस्तु से जुड़े नहीं रह सकते हैं । परिणाम स्वरूप उन्होंने माना कि प्रत्यय आपस में भागीदारी करते हैं । उदाहरण के लिए, कुत्ते का प्रत्यय स्तनधारी जीव के प्रत्यय में और गोरैया का प्रत्यय पक्षी के प्रत्यय में भागीदारी करेगा और अन्ततः ये दोनों फिर जंतु के प्रत्यय मे भी भागीदारी करेंगे । अंततः सभी प्रत्यय सर्वोच्च प्रत्यय यानि शुभ के प्रत्यय में भागीदारी करते हैं । अब चूंकि कलाकार प्रतियों की नकल करते हैं । अतः प्लेटो के आदर्श राज्य में उनका कोई तार्किक स्थान नहीं हो सकता ।
मानव-दर्शन
- आत्माओं का पूर्व अस्तित्व
जन्म से पहले मनुष्यों की आत्मा आदर्श जगत में शुद्ध और पूर्ण प्रत्ययों का अनुचिन्तन करती है । कुछ रहस्यमय दोष ( पतन ) के कारण आत्माएं संसार में जन्म लेती हैं । शरीर में कैद हो जाती हैं और प्रत्ययों के चिंतन की बुलंदी तक पहुंचने से रोक दी जाती हैं । शुद्ध ज्ञान वह है जब मानव विस्मरण पर विजय प्राप्त कर लें और उन प्रत्ययों को अनुस्मृत कर लें, भले ही वे बहुत धुंधले हों जिनका उसने कभी अनु चिन्तन किया था ।
प्लेटो ने मानव के अवचेतन में द्वंद्व को स्पष्ट रूप से देखा और फैड्स में उन्होंने इसकी ( मानव-आत्म की ) तुलना उस सारथी से की जो उन घोड़ों की लगाम कसके नियंत्रित करने के लिए संघर्ष करता है, जो दो अलग-अलग दिशाओं में रथ को खींचना चाहते हैं । मनुष्य में चरित्र एक बौद्धिकतत्व है, जो मनुष्य के आध्यात्मिक और सांसारिक घटक रूपी में दो घोड़ों के विरोधी खिंचाव के बीच सामंजस्य रखने के लिए संघर्ष करता है । आध्यात्मिक, घटक वास्तव में अच्छा घोड़ा है, यह विनम्र और तर्क को मानने वाला है और भलाई की दिशा में बढ़ता है । लेकिन सांसारिक घटक उम्र और निरंकुश है और उसे सिर्फ चाबुक से ही काबू में किया जा सकता है ।
यदि शरीर आत्मा की कैद है तो मृत्यु उसकी हर्षपूर्ण मुक्ति का क्षण है । यह वह घड़ी है जब आत्मा अंततः शरीर से मुक्त हो जाती है । आत्मा की अमरता को इस तथ्य से उचित ठहराया जा सकता है कि शरीर के विपरीत यह अंगों में विभाजित नहीं होती है । रिपब्लिक के ‘मिथ ऑफ एर’ में प्लेटों ने अपने मर्णोपरान्त जीवन सम्बधी विज्ञान को प्रस्तुत किया है । वह आत्माओं के पारगमन में यकीन रखते थे । अंततः आत्मा एक चरम और अपरिवर्तनीय प्रतिफल में निवास करने लगती है और जहाँ अच्छाई ( अच्छी आत्मा ) एक प्रकार के स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है और बुराई ( बुरी आत्म ) पाताल यंत्रणा के लिए भेज दी जाती हैं ।
ईश्वर विचार
विश्व उत्पन्न हुआ है । अतः इसका अवश्य ही कोई कारण होगा । परिणाम स्वरूप प्लेटो ने विश्वकर्मा ( Demiurge ) का तर्क दिया । विश्वकर्मा शाश्वत् प्रत्ययों के प्रतिमान के अनुरूप वस्तुओं को बनाता है । प्लेटो उच्चतम प्रत्यय, शुभ और सौंदर्य के प्रत्यय की बात करते हैं । परन्तु उन्होंने इस प्रत्यय को स्पष्ट रूप से ईश्वर नहीं कहा है ।
आचरण और राजनीति का दर्शन
सुकरात से प्लेटो ने नीतिपरक जीवन के आधार का निर्धारण करने की विकट समस्या को विरासत में लिया । नैतिकता प्राकृतिक ( फिसिस ) है या फिर प्रथा ( nomos ) ? पुराने समय में इसे प्राकृतिक माना जाता था । इसकी उत्पत्ति ईश्वरीय मानी जाती थी, लेकिन फिर भी मानवीकृत देव इसे प्रदान नहीं कर सकते थे । सोफिस्टों के अनुसार नैतिक नियमों/कानूनों को मनुष्यों द्वारा बनाया गया था और संभवतः उन्हें उसी आसानी से बदला भी जा सकता था । धीरे-धीरे इन विचारों को गति मिल गई । इसके कारण सामाजिक विद्रोह की जो आंधी उठी उसने उन स्थिर नैतिक परंपराओं को क्षति पहुंचाई जिन पर नगर-राज्य का क्रमबद्ध विकास काफी हद तक निर्भर करता था । जब मानवीकृत देवों का प्रभाव कम हुआ तो नगर-राष्ट्र के पुनरुद्धार के लिए कुछ ऐसे नए अनुभवातीत सिद्धांतों की आवश्यकता महसूस हुई जो राजनीतिक ढाँचे की सुव्यवस्था तथा कानूनों की वैधता को आधार प्रदान कर सके ।
प्रेम की प्रकृति
‘द सिम्पोजियम’ में प्लेटो ने प्रेम की प्रकृति को बताया है । उन्होंने प्रश्न किया प्रेमी कौन है ? प्रेमी वह है जो चिर अस्थाई प्रसन्नता प्रदान करने वाली वस्तुओं से वंचित है । प्रेम करने वाले को प्रसन्नता शाश्वत शुभ और सुन्दरता की प्राप्ति से होती है ( प्यार इन्हीं शाश्वत मूल्यों की अनुपलब्धता और इन्हें प्राप्त करने की योग्यता से उत्पन्न होता है ) । यह इन मूल्यों को प्राप्त करने की लालसा से संचालित योग्यता या साधन सम्पन्नता ही प्रेमी को प्यार की सीढ़ी पर ऊपर पहुंचाती है । प्रेम के प्रत्येक चरण में प्रेमी सिर्फ आंशिक रूप से संतुष्ट होता है और इसलिए वह सशक्त रूप से यह खोजने के लिए प्रेरित होता है कि क्या इससे अधिक संतुष्टीदायक भी कुछ है । जगत् में रहने के कारण वह उस सौंदर्य से आरंभ करता है जो उसे जगत में दिखाई देता है । सुंदर लड़की या लड़का प्रेम में पड़ते हैं, लेकिन वे पाते हैं कि यह सौंदर्य विशिष्ट नहीं है । धीरे-धीरे प्रेमी अधिक सुंदर आत्मा, गुण, नियमों और संस्थाओं के सौंदर्य की ओर बढ़ता है और अंत में वह शुभ के विचार की ओर प्रस्थान करता है । इस पूरी प्रक्रिया में प्रेम ही वह तत्व है जो सौंदर्य के अवलोकन तक पहुँचने के लिए आवश्यक गति और संवेग प्रदान करता है । इस बाद वाले विचार की स्थापना सिम्पोजियम में की गई है ।
न्याय
अपने दर्शन में प्लेटो न्याय के विचार को प्रमुख स्थान देते हैं । प्लेटो ऐथेन्स की मौजूदा विघटनकारी स्थिति से अत्यधिक असंतुष्ट थे । एथेन्स का प्रजातंत्र नष्ट होने की कगार पर था और अंततः सुकरात की मृत्यु के लिए जिम्मेदार था । आत्म-संतोष की नीति के संदर्भ में सोफिस्टों के शिक्षण के कारण अत्यधिक व्यक्तिवादी सोच विकसित हो गई थी । इस व्यक्तिवादी दृष्टि में नागरिकों को अपने स्वार्थी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्र की कार्यकारी ईकाइयों को अपने कब्जे में लेने के लिए प्रेरित किया । सोफिस्टों के अनुसार न्याय के नियम महज प्रथाऐं थी । उनके अनुसार आदर्श न्याय की कल्पना ऊँचे दर्जे की बेवकूफी थी । उचित एवं न्यायपूर्ण वही है जो स्वयं के लिए लाभदायक हो, अपने जीवन के लिए सबसे लाभदायक हो, अधिकांश व्यक्तियों का ऐसा ही मत प्रतीत होता था । यद्यपि, प्लेटो का यह मानना था कि न्याय का एक आदर्श है, जिसे हम सबको यथासंभव अपनाना चाहिए । उनके अनुसार सुकरात की भर्त्सना भले ही कानूनी तौर पर ठीक थी, लेकिन उचित नहीं थी । रिंग ऑफ गाइजीस ( Ring of Gyges ) के मिथक में, उस एक गड़रिया का वर्णन है, जो अधोलोक में पहुंच गया और उसे वहाँ शव पर एक अंगूठी मिली जिसका मुख उसकी तरफ होने पर वह अदृश्य हो जाता था और बाहर की ओर होने पर दृश्य हो जाता है । इस अंगूठी की सहायता से उसने राजा की पत्नी के साथ व्यभिचार किया । राजा को मार दिया और बाद में उसका राज्य हड़प लिया । गड़रिया उचित नहीं था, क्योंकि उसका अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं था । प्लेटो के अनुसार आदर्श समाज वह है जिसमें 'न्याय' का सर्वोच्च स्थान हो । प्लेटो के अनुसार न्याय की प्रकृति सुव्यवस्थित समाज का मौलिक सिद्धांत है । प्लेटो के अनुसार न्याय वह मानवीय गुण है, जो व्यक्ति को स्व-संयमित और अच्छा बनाता है । सामाजिक रूप से न्याय एक सामाजिक चेतना है, जो समाज को आंतरिक रूप से सौहार्दपूर्ण और अच्छा बनाती है ।
राष्ट्र
प्लेटो के दार्शनिक मतों, विशेषरूप से आदर्श राष्ट्र या सरकार के संदर्भ में अनेक सामाजिक निहितार्थ थे । कुछ सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत रिपब्लिक के साथ-साथ लॉज और स्टेट्समेन में हैं । इनमें प्लेटो ने कहा है कि समाजों की त्रिभाजी वर्ग संरचना है, जो वैयक्तिक आत्मा की त्रिसंरचना यानि क्षुधा या लालसा, भावना, तर्क के संगत है । व्यक्ति अपने कौशलों और क्षमताओं में भिन्न होते हैं । उन्हें तीन वर्गों में समूहित किया जा सकता है –
- कुछ श्रमिक, बढ़ई, किसान आदि होने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होते हैं । इनमें क्षुधा प्रभावी होती है ।
- अन्य जो रोमांच प्रिय, बलवान, साहसी और खतरों को पसंद करने वाले होते हैं, वे राष्ट्र का सुरक्षात्मक भाग बनाते हैं । इनमें भावना का भाग प्रभावी होता है ।
- कुछ जो बुद्धिमान, तर्कसंगत, स्व-नियंत्रित, बुद्धि से प्रेम करने वाले होते हैं, उनमें आत्मा का तार्किक भाग नियंत्रणकारी भाग होता है ।
विभाजन का यह मॉडल ऐथेन्स के वर्तमान प्रजातंत्र के सिद्धांतों ( जैसे कि वे आज विद्यमान हैं ) के विपरीत है । क्योंकि इस विभाजन के अनुसार नगर-राज्य के सिर्फ कुछ ही नागरिक शासन करने के लिए अनुकूल सिद्ध होते हैं । प्लेटो का कहना था कि व्याख्यानशास्त्र और अनुनय की बजाय तर्क और बुद्धि का शासन होना चाहिए । प्लेटो के शब्दों में, "जब तक दार्शनिक राजा के रूप में शासन नहीं करेंगे अथवा वे लोग, जो आज राजा या प्रभावशाली व्यक्ति कहलाते हैं, ईमानदारी और निष्ठा से दार्शनिक सोच नहीं रखेंगे अर्थात जब तक राजनैतिक शक्ति और दर्शन पूरी तरह से एकरूप नहीं होंगे और अनेक राजा, जो वर्तमान में या तो शासक की दृष्टि से या फिर दार्शनिक की दृष्टि से शासन करते हैं, शासन करते रहेंगे और यदि किसी भी शासक को इन दोनों दृष्टियों के एकीकरण से बलात् रोका जाता रहेगा, तब तक नगरों को बुराइयों से छुटकारा नहीं मिलेगा और न ही मैं समझता हूँ कि मानव जातियों को छुटकारा मिलेगा।"
प्लेटो की प्रजातंत्र की आलोचना
प्रजातंत्र में शासकों को उनके गुणों के कारण नहीं, बल्कि उनके तरीके, आवाज, रंगरूप की सुंदरता आदि के लिए चुना जाता है । वे ऐसे रसोइयों की तरह होते हैं, जो दावा करते हैं कि रोगी के लिए श्रेष्ठ भोजन क्या है, जबकि इस प्रकार के किसी भी निर्धारण के लिए चिकित्सक का होना आवश्यक है, न की रसोइये का । यद्यपि विशेष रूप से प्रशिक्षित संभ्रांत वर्ग के हाथों में सर्वोच्च सत्ता केवल तभी सौंपनी चाहिए जब –
- मनुष्यों की बौद्धिक क्षमताओं में अपरिवर्तनीय अंतर हो
- यदि इन अंतरों का पता जीवन के आरंभिक वर्षों में ही चल जाए
- यदि उन्हें निश्चित एवं असंदिग्ध राजनैतिक सिद्धांतों को पूर्ण ज्ञान कराना सम्भव हो और
- संभ्रांत जन, ये जानते हों कि सबके लिए क्या अच्छा है और उसी के अनुसार कार्य करें ।
चूँकि हम जानते हैं कि इसकी संभावना कम ही है, इसलिए प्लेटो की आदर्श राष्ट्र की अवधारणा सदैव एक आदर्शलोक की अवधारणा रहेगी, जिसके आदर्श सदैव संदिग्ध रहेंगे ।
कला का दर्शन
कला के सिद्धांत का निर्धारण भी प्रत्यय-सिद्धांत ( Theory of Idea ) द्वारा होता है । कोई वस्तु उसी हद तक सुंदर होती है, जहाँ तक वह सौंदर्य के प्रत्यय में भागीदारी करती है । प्लेटो के अनुसार विश्व में सर्वत्र व्याप्त व्यवस्था सौंदर्य को प्रस्तुत करती है । जो कलाकार कृत्रिम जगत् ( प्रतिलिपि ) को महिमामंडित करता है वह उस रसोइए और व्याख्यान शास्त्री की तरह है जो मात्र अनभिज्ञ मनुष्यों की कल्पनाशक्ति को गुदगुदा कर अपर्याप्त कला प्रदान करता है । जिन कलाकृतियों को हम कलात्मक कार्य कहते हैं वे और कुछ नहीं बल्कि परछाइयों ( कृत्रिम भौतिक जगत् ) की परछाइयाँ मात्र हैं ।
प्लेटों के प्रमुख दार्शनिक विचार
- सामान्य आदर्श ( प्रत्यय ) का अर्थ ऐसे सामान्यों से है जो स्वतंत्र रूप से विशेषों ( वस्तुओं ) से अलग अपनी निजी दुनिया में पाएं जाते ।
- सामान्य वह है, जो ' विशेष ' ( वस्तु ) के समूह को निर्दिष्ट करता है ।
- केवल सामान्य ही वास्तविक तत्त्व है ।
- सामान्य मूर्त व्यष्टि है ।
- यदि कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ नहीं है, तो कोई भी पदार्थ नहीं होगा, जिसके स्वरूप को चक्रीय कहा जाए ।
- चक्रियता भौतिक जगत् में विद्यमान नहीं होती है ।
- सचनुच वास्तविक वे आकार होते है जिन्हें केवल बौद्धिक रूप से ग्रहण किया जा सकता है ।
- जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते है, वे सत्यात्मक तथ्य नहीं है ।
- आकार किसी के मन का प्रत्यय या संप्रत्यय है ।
- संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है ।
- न्याय आत्मा का गुण है ।
- नैतिकता शाश्वत परम्परा मात्र नहीं है ।
- सामूहिकता की आत्मा को व्यक्ति को व्यक्त करना चाहिए ।
- न्याय मुख्य सद्गुण है ।
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