Thursday, May 19, 2022

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 428 ई० पू० से 347 ई० पू० तक 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "ज्ञान ही धर्म (सद्गुण) है और अज्ञान अधर्म"

प्रमुख उपाधि - पूर्ण ग्रीक ( The Complete Greek ) की उपाधि  

प्रमुख कथन

1- आदर्श (प्रत्यय) का अर्थ ऐसे समान्यों से है जो स्वतंत्र रूप से विशेषो (वस्तुओं) से अलग अपनी निजी दुनिया में पाए जाते है । 

2- सामान्य वह है जो विशेष (वस्तु) के समूह को निर्दिष्ट करता है । 


प्लेटो का जीवन

          पेलोपोनेसियन युद्ध ( 428/27 ई. पू. ) के चौथें या पांचवें वर्ष में प्लेटो का जन्म ऐथेन्स में हुआ था । वह जन्म से ही अभिजात्य थे । उन्हें पहले एरिस्टोकल्स कहा जाता था, लेकिन बाद में प्लेटो ( व्यापक ) नाम दे दिया गया था । यह ज्ञात नहीं है कि उन्हें यह नाम उनके चौड़े मस्तक, बलशाली शरीर या साहित्यिक अभिव्यक्ति के कारण दिया गया था या किसी अन्य कारण से । बीस वर्ष की आयु में में सुकरात के संपर्क में आए और यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ । सुकरात की मृत्यु के बाद वह मेगरा चले गए, जहाँ उन्होंने यूक्लीड के अंतर्गत ऐलियेटिक दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया । बाद में वह एथेन्स लौट आए जहाँ उन्होंने पहली पुस्तक लिखी । 390 ई. पू. से 388 ई. पू. के बीच, उन्होंने व्यापक रूप से यात्राएं करके विभिन्न प्रमुख विचारधाराओं के बारे में जाना और अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाया । सिरेक्यूस के डायनीसियास प्रथम के सभागार का दौरा करने के बाद उन्होंने उस तानाशाह की खुलकर भर्त्सना की और उसके लिए उन्हें दास के रूप में बेच दिया गया । सीरोन के एक अजनबी एनीसेरिस द्वारा ऐजिनियां के बाजार से छुड़ाए जाने के बाद वो एथेन्स लौट आए । लगभग 387 ई. पू. में उन्होंने एकेडेमस में एक प्रसिद्ध विद्यापीठ की स्थापना की ( तभी से एकेडमी नाम प्रचलित हुआ ) । जहाँ वह व्याख्यान और संवादों के जरिए विज्ञान और दर्शन पढ़ाते थे । 367 और 361 ई. पू. में प्लेटो 'आदर्श राज्य की अवधारणा’ को समझने के उद्देश्य से सिरेक्यूस चले गए, जिससे ऐकेडिमी के कार्य में बाधा आई । व्यवहारिक शासन कला जैसे आदर्श राज्य की स्थापना करने के असफल प्रयासों के बाद प्लेटो एथेन्स वापस आ गए और उन्होंने अपना सारा ध्यान एकेडमी में दर्शन शास्त्र के शिक्षण और लेखन पर केंद्रित कर दिया । उनकी मृत्यु 348 / 7 ई. पू. में 80/1 वर्ष की उम्र में हुई और उन्हें एकेडमी के मैदान में दफना दिया गया । लेकिन उनका दर्शन जीवित रहा । इसके आधार पर उनके अपने शिष्य अरस्तू ने ज्ञान की एक विद्या दर्शनशास्त्र की नीव रखी । वास्तव में ढीले शब्दों में कहे तो प्रत्येक वह व्यक्ति जो थोड़ा भी दर्शनशास्त्र के बारे में सोचता है वह या तो 'प्लेटोवादी' है या फिर 'अरस्तूवादी’ । एल्फ्रेड नोर्थ व्हाइटहैड ने ऐसे ही नहीं लिखा था कि "यूरोपीय दार्शनिक परंपरा का सबसे सुरक्षित सामान्य चरित्रीकरण यह है कि वह प्लेटो की टिप्पणियों की श्रृंखला मात्र है ।" 

प्लेटो के लेखन 

           टेबेरियस सम्राट के एक समकालीन थैरेसिलस के नाटक चतुष्टयों ( टेट्रालोजीस ) में व्यवस्थित प्लेटो के पारंपरिक सिद्धांतों में पैंतीस संवाद और तेरह पत्र हैं, जो एक एकल समूह के रूप में 36 पुस्तकों में हैं । इनमें से कुछ लेखनों की प्रामाणिकता विवादास्पद है । 

प्लेटो के विचारों का कालानुक्रमिक विकास 

आरंभिक सुकरात काल ( 399-388 / 7 ई. पू. )

       ये संवाद सुकरात के नैतिक-राजनैतिक सदगुणों की पड़ताल और नैतिक अवधारणाओं के उनके विश्लेषण की भावना और उद्देश्य को पुनः जाग्रत करते हैं । सामुहिक रूप से ये रचनाएं मुख्यतः सोफिस्ट विरोधी है तथा एक प्रकार से सुकरात की अनभिज्ञता को प्रदर्शित करती है । इनमें से अधिकांश लेख बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे एवं आगे और अधिक बौद्धिक विचार विमर्श की आवश्यकता पर जोर देते हुऐ समाप्त हो जाते हैं । 

  1. एपोलोजी - सुकरात पर अभियोग और बचाव 
  2. क्रिटिओ - सुकरात का अभियोग के विरूद्ध बचाव के लिए मना करना और सिद्धांतों पर अडिग रहना ।
  3. यूथीफ्रो - ईश्वरभक्ति और ईशनिन्दा की प्रकृति पर, जिसके लिए सुकरात पर अभियोग चलाया गया । 
  4. लाखेस - साहस पर । 
  5. आयन - कवियों और चारण गीतकारों के विरुद्ध । 
  6. प्रोटागोरस - सोफिस्टों का यह सिद्धांत कि कला ( orte ) को सिखाया जा सकता है बनाम सुकरात का सिद्धांत या पेइडिया कि सभी सद्गुण ईश्वरप्रदत हैं और सिखाए नहीं जा सकते हैं । 
  7. खारमीदिस - संयम और नियंत्रण पर 
  8. लाइसिस - मैत्री पर । 

संक्रामी काल ( 387-380 ई.पू. )

     प्लेटो ने अपनी विकसित बौद्धिक और साहित्यिक क्षमता से न केवल सोफिस्टों के विरूद्ध अपनी तार्किक परिचर्या को तीव्र किया, बल्कि तत्वमीमांसीय प्रत्यय सिद्धान्त की सुकराती अवधारणा को भी स्थापित किया । जहाँ पहले के संवाद सद्गुण के एक पक्ष तक सीमित थे, वहीं इस सृजनात्मक अवस्था के संवादों ने ज्ञान और अच्छे जीवन के बारे में अधिक महत्वपूर्ण प्रश्नों सम्बंधित विचारों को व्यापक और गहन बनाया । यह उनके सुव्यवस्थित दर्शनशास्त्र की शुरुआत थी । 

  1. गोर्गीअस - न्याय पर और नगर-राज्य में सोफिस्टों के शब्दाडम्बर और सत्ता की राजनीति के विरुद्ध | 
  2. मीनो - ऐनामनेसिस या अनुस्मरण सम्बंधित "सद्गुण-ज्ञान” के प्रश्न पर 
  3. एथीडीमस - प्रज्ञा पर जो प्रसन्नता लाती है और उत्तर सोफिस्टों की तार्किक भ्रांतियों के विरूद्ध । 
  4. लेसर हिप्पिआस - जानबूझकर अथवा अनजाने में गलतियाँ करने वालों के बीच तुलना । 
  5. ग्रेटर हिप्पिआस - सौंदर्य पर और भाषा सिद्धांत पर । 
  6. क्रेटीलस - भाषा पर और अपरिवर्तनीय तथा अबोधगम्य सत्ताओं और परिवर्तनीय तथा बोधगम्य तथ्यों के बीच अंतर पर । 
  7. मेनीजीनस - अंत्येष्टि प्रार्थनाओं में शब्दाडंबर पर विद्रूप ( पैरोडी ) 

परिपक्वता का काल ( 380-361 ई.पू. )

      अपने बौद्धिक विकास के चरम पर प्लेटो ने पूरी तरह से अपना निजी प्रत्ययों का सत्तामूलक सिद्धांत विकसित कर लिया और इस सिद्धांत की शाखाओं को ज्ञानमीमांसा, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, राजनीति और सौन्द्रयशास्त्र में अभिव्यक्त किया । अतः संवादों के तीसरे समूह में वे संवाद है जो या तो नए क्षेत्रों में चिंतनशील अंतर्दृष्टि डालते हैं । अथवा दूसरों के दृष्टिकोण से उत्पन्न तथ्यों और कठिनाइयों को बताते हैं । 

  1. सिम्पोज़ियम ( या बैंकेट ) - आत्मा की इरोस ( प्रेम ) जनित प्रेरणा पर उसका ( इरोस को ) आभासी से वास्तविक सौंदर्य तक का उत्थान 
  2. फीडो - प्रत्यय के सिद्धांत का अधिक स्पष्ट प्रकटन, अमरता और आत्मा की नियति सुकरात के अंतिम दिनों के सिद्धांतों के विरुद्ध परिचर्चाएं ।
  3. रिपब्लिक - आदर्श राज्य, शुभ की प्रधानता संज्ञान की चार श्रेणियाँ और आत्मा के त्रिभाजन पर । 
  4. फेड्स - दार्शनिक शब्दाडंबर, आत्मा, उसका पुनर्जन्म, पूर्व-अस्तित्व में प्रत्ययों की समझ, अनुस्मरण और प्रत्ययों के जगत की संरचना । 
  5. थिएटेट्स - ज्ञान का अपरिवर्तनीय विषयों से और अन्य बोधगम्य अनुभवों जैसे संवेदी-प्रत्यक्ष और सही मत से सम्बंध । 
  6. परमेनाइड्स - प्रत्यय के सिद्धांत का बचाव और गणितीय तथा मूल्याश्रित अवधारणाओं की प्रस्तुति एक और अनेक की समस्या । 
  7. सोफिस्ट - प्रत्ययों और परिवर्तन, जीवन, आत्मा, बौद्धिकता पर आलोचनात्मक दृष्टि और सोफिस्ट को परिभाषित करने की विश्लेषणात्मक खोज | 

वृद्धावस्था काल

      दार्शनिक परिपक्वता के बाद के काल में जब उनकी शारीरिक क्षमताएं कम हो गई और आलोचनात्मक बुद्धि कौशल बढ़ गया, तो प्लेटो अपने दर्शनशास्त्र को परिष्कृत करने के लिए नई समस्याओं और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों पर विचार करने लगे । उत्कृष्ट बौद्धिक समझ के साथ उन्होंने आलोचनात्मक ढंग से अपने तर्क शास्त्र को विस्तारित किया और ब्रह्मांड के प्रश्नों में नई दिलचस्पी पैदा की । 

  1. स्टेट्समेन ( या पोलिटिकस ) - विभाजन की विधि से स्टेटसमेन की परिभाषा, वास्तविक शासक में ज्ञान का महत्व । 
  2. फिलेबस - अच्छाई के सुख की ठोस स्थितियों पर ध्यानाकर्षित करके प्लेटो के नीतिशास्त्र का विकास, एकता और अनेकता के और अधिक अध्ययन द्वारा विचारों के सिद्धांत का वर्धन । 
  3. टिमेअस - भौतिक जगत की उत्पत्ति और डेमोअर्स की भूमिका पर ब्रहमांडीय निबंध । 
  4. क्रिटिआस - आदर्श अवस्था से एटलांटिस तक साम्राज्यवादी समुद्र शक्ति सहित विरोधाभास । 
  5. लॉज - जीवन की मूर्त स्थितियों के अनुसार रिपब्लिक की आदर्श अवस्था में रूपान्तरण । 
  6. एपीनोमिस - कानूनों की सतत्ता, शासक के बुद्धिकौशल और ईश्वरीय-भक्ति पर । 
  7. लैटर्स VII और VIII - राजनीति और प्रत्ययों की प्रासंगिकता पर 

प्लेटो के समक्ष आई दार्शनिक समस्याएं 

       थेलस द्वारा उठाये गये प्रश्नों से लेकर प्लेटो के काल तक दार्शनिक चिंतन में अनेक समस्याएं आई, जैसे कि – 
  • एक और अनेक की समस्या 
  • अभास और सत् की समस्या 
  • स्थायित्व और परिवर्तन की समस्या 
  • पाइथागोरस के अनुयाइयों का रहस्यवाद और गणित
  • फिसिस और नोमोस 
  • सोफिस्टों का संशयवाद 
राजनैतिक रूप से भी निम्न परिवर्तन हुए, जैसे कि 
  • एथेन्स का पतन 
  • भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद 
  • प्रजातंत्र का आविर्भाव 
  • सुकरात की भर्त्सना 
       प्लेटो ने माना कि उनके पूर्ववर्तियों द्वारा अपनाऐ गये दार्शनिक मतों में कुछ सच्चाई हैं तथा उन सभी को सत् की प्रकृति का प्रमाणिक अंतर्ज्ञान ज्ञान था । 

स्थिति 

         प्लेटो को मनुष्य जगत और देवत्व की समस्याओं का सामना ग्रीक के नगर-राज्यों के नैतिक-राजनैतिक संदर्भ में करना पड़ा । प्लेटो ने अपनी उम्र के सत्तर के दशक के मध्य में मित्रों और डिओन के सहयोगियों को लिखे गये मेनीफेस्टो व्हेन आई वॉस यंग में लिखा है कि ' मेरे अनुभव अनेकों अन्य लोगों के अनुभवों के समान ही थे । मैंने सोचा था कि जैसे ही मैं स्वयं अपनी मर्जी का मालिक हो जाऊँगा, मैं सामाजिक जीवन में प्रवेश कर लूँगा । लेकिन हुआ यह कि राजनैतिक स्थिति में दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तन हो गये । प्लेटो और आगे अग्रलिखित वस्तु स्थितियों का वर्णन करना चाहते थे, टाइरेंट ऑफ थर्टी, प्रजातंत्रियों द्वारा सुकरात की अन्यायपूर्ण भर्त्सना, हमारे पूर्वजों के सिद्धांतों का परित्याग, कानून और रीतिरिवाजों में भ्रष्टाचार का बढ़ना, संक्षेप में मेरे ( उसके ) आसपास की विघटित हो रही प्रत्येक वस्तु एवं घटना । ऐथेन्स और अन्य नगरों के इस पूर्ण समेकित पतन से अचंभित "मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि वे सभी बुरे शासन की चपेट में हैं" । 

नीतिशास्त्र से तत्वमीमांसीय और गूढ़विज्ञानी समस्याओं की ओर संक्रमण 

             प्लेटो ने देखा कि राजनीति के मौलिक सिद्धांतों में कोई वास्तविक सुधार व्यक्ति की प्रकृति और स्वयं वास्तविकता के बारे में उसकी संकल्पनाओं में संगत सुधार के बिना नहीं हो सकता है । प्लेटों प्रायः सोचते रहते थे कि क्या वास्तव में, पूर्ण न्याय अथवा साहस का तात्विक अस्तित्व होता है अथवा सिर्फ व्यक्ति के न्यायपूर्ण और साहसी कार्यों का ही अस्तित्व होता है ? वास्तव में, अच्छा, सुंदर आदि क्या है ? सत् क्या है ? वह विश्व में गणितीय अनुपात और वास्तविक सामंजस्य द्वारा अत्यधिक प्रभावित थे ।

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