%20%E0%A4%95%E0%A4%BE%20%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B6%E0%A4%A8.png) |
| डेमोक्रीटस ( Democritus ) का दर्शन |
डेमोक्रीटस ( Democritus ) का दर्शन
परमाणु सिद्धान्त
परमाणुवादियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह थी कि प्रकृति के भौतिक तत्वों, जिनसे प्रकृति की रचना हुई है, को अनिश्चित रूप से अपेक्षाकृत छोटे कणों में नहीं बांटा जा सकता है । यदि ऐसा संभव हो जाए तो प्रकृति के स्थायी गुणों को खतरा उत्पन्न हो जाएगा । तब प्रकृति में कोई स्थायित्व भी नहीं होगा । वे पार्मेनाइड्स की इस बात से सहमत थे कि "भाव से अभाव की उत्पत्ति नहीं होती” । अतः प्रकृति का भौतिक कण शाश्वत् एवं सत्य होना चाहिए । तब ही उसमें से प्रकृति की उत्पत्ति हो सकती है । ये शाश्वत् कण जो परमाणु है, दृढ़ और ठोस होते हैं, लेकिन ये एकसमान नहीं होते हैं । अन्यथा, प्रकृति की अनेकता और एकता असंभव हो जायेगी । जबकि हम पर्वतों, सागरों, आकाश, अमीबा, पक्षियों, मछली, फूलों, जंतु और मनुष्यों आदि विभिन्न जीवों एवं वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखते हैं । उन्होंने इसकी पुष्टि की कि ब्रहमांड विभिन्न प्रकार के असत्य असीमित परमाणुओं से निर्मित है । इनमें से कुछ गोल और चिकने, कुछ अनियमित और दांतेदार होते हैं । यथार्थरूप से अपनी अनंत बहुरूपता के कारण ये एक दूसरे से संयोजन करके असीमित पिंड बनाते हैं । जब पिंड ( शरीर ) विघटित होता या गल जाता है, तो परमाणु मुक्त हो जाते हैं और ये पिंडों के नए संयोजनों के लिए पुनः तैयार हो जाते हैं । परमाणु अंतरिक्ष में गति करते रहते हैं और अकस्मात रूप से एक दूसरे से उलझ जाते हैं तथा एक साथ मिलकर नई रचना करने के लिए स्वतंत्र होते हैं ।
परमाणुवादियों के अनुसार, सिर्फ परमाणु और शून्य ही विद्यमान है । ब्रहमांड की उनकी व्याख्या में 'आत्मा' और 'बल' की अधिक भूमिका नहीं है । 'आत्मा' मस्तिष्क से जुड़ी है । जब मस्तिष्क विघटित हो जाता है, तो चेतना भी गुम हो जाती है और तब विशेष प्रकार के चिकने गोल आकार के आत्मा के परमाणु सभी दिशाओं में फैल जाते हैं । उनका मानना था कि परमाणु के अतिरिक्त और कुछ भी ब्रहमांड को प्रभावित नहीं कर सकता है । इन्हें कुछ अन्य नए पिंडों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । इसका अर्थ है कि मनुष्यों में शाश्वत आत्मा जैसा कुछ नहीं होता है । इसी कारण से उन्हें भौतिकवादी कहा जाता था, क्योंकि वह भौतिक वस्तुओं को ही यर्थाथ मानते थे । प्रकृति में सभी वस्तुऐं काफी यांत्रिक रूप से होती हैं । इसका यह अर्थ नहीं है कि वस्तुऐं बेतरतीब रूप से होती हैं । उनके अनुसार आवश्यकता के अपरिहार्य नियम होते हैं । एक प्राकृतिक कारक जो सभी में नैसर्गिक रूप से है, प्रकृति में घटनाओं के घटित होने का मार्गदर्शन करता है । अतः ब्रहमांड में सभी प्रक्रियाएं यान्त्रिक होते हुए भी प्राकृतिक है ।
ज्ञान का सिद्धान्त
परमाणुवादी मत के अनुसार ज्ञान का सिद्धान्त इन्द्रियों के अनुभवों से प्राप्त ज्ञान से विकसित हुआ है । इन्द्रिय-ज्ञान निर्गम की क्रिया द्वारा अनुभूत पिंड के समान होता है । सभी पिंड वायु के द्वारा अपने बिंब को भेजते हैं । बिंब, जो शरीर द्वारा संचारित होता है, प्रभावित वस्तु को बहुत कुछ अपने समान रूपांतरित कर लेता है । अंत में, यह किसी मनुष्य या सजीव की इन्द्रियों तक पहुंच जाता है । यदि संचरण की प्रक्रिया में अन्य वस्तुओं से निकलने वाले बिंब, अन्य बिंबों के मार्ग में बाधा पहुंचाते हैं, तो भ्रम उत्पन्न होता है । यदि ये बिना किसी बाधा के आगे बढ़ते हैं, तो सत्यात्मक ज्ञान प्राप्त होता है । अर्थात यह सीधे संवेदन अंगों और अंततः आत्मा पर सीधा आघात करते हैं ।
संवेदन के गुण ( रंग, ध्वनि, स्वाद, गंध और स्पर्श ) स्वयं वस्तुओं में नहीं होते हैं । यह महज हमारी इन्द्रियों पर परमाणुओं के संयोजन का प्रभाव है । परमाणुओं में मूल रूप से आकार ओर विस्तार के अतिरिक्त अन्य कोई गुण नहीं होते हैं । अतः इन्द्रियों से प्राप्त वस्तुओं का वास्तविक ज्ञान प्रदान नहीं करता है । यह केवल यह दर्शाता है कि वस्तुएं किस प्रकार मनुष्यों को प्रभावित करती हैं । यूनानी परमाणुवादियों ने पहले ही प्राथमिक गुणों ( आकार, अभेद्यता, इत्यादि ) और द्वितीयक गुणों ( रंग, ध्वनि, गंध आदि ) के बीच अन्तर कर दिया था । यह भेद आज भी आधुनिक दर्शन में मुख्य चर्चा विषय है ।
हम परमाणु के बारे में सिर्फ सोच ही सकते हैं । हम उन्हें उनके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते हैं । इन्द्रिय-ज्ञान से हमें स्पष्ट ज्ञान प्राप्त नहीं होता है । विचार, जो हमारे इन्द्रिय प्रत्यक्षों और प्रतीतियों को बेधकर परमाणु तक पहुंचता है, ही सही ज्ञान है । डेमोक्रीटस एक बुद्धवादी दार्शनिक थे । बुद्धिपरक विचार की शुरूआत वहां से होती है , जहां इन्द्रिज्ञान समाप्त होता है । यह जानने का विशुद्ध तरीका है । तर्क आत्मा का उच्चतम कार्य है । डेमोक्रीटस के लिए आत्मा और तर्क एक समान है ।
नैतिक सिद्धान्त
डेमोक्रीटस आत्मा को मानव कल्याण का केन्द्रबिंदु मानते थे । उनके आत्मप्रसाद ( eudaimonia ) के सिद्धान्त में 'अच्छे अस्तित्व' ( eu-esto ) और 'अच्छी भावना' ( eu-thumise ) की धारणा दोनों सम्मिलित थी । पेस गोसलिंग और टेलर का मानना है कि डेमोक्रीटस व्यवस्थित रूप में नैतिक सिद्धान्त को प्रस्तुत करने वाले पहले यूनानी दार्शनिक थे । डेमोक्रीटस के नैतिक सिद्धान्त में क्रम-व्यवस्थापन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण चरण, इस व्यर्थ नैतिक सोच में बदलाव था कि प्रत्येक व्यक्ति खुश, प्रसन्न और समस्याओं से मुक्त रहना चाहता है ।
नीतिशास्त्र पर डेमोक्रीटस के लेखनों की सूची में एक निबन्ध पेरी यूथाइमियास ( Perieuthymias ) मिला है जिसके सिर्फ एक या दो वाक्य ही बचे हैं । बाद के डोक्सोग्राफर्स ( ईश्वर का महिमामंडन करने वाले ) ने सुखशांतिवादी सिद्धान्तों ( eudaimonistic theories ) की रूपरेखा की कल्पना करके हमें बताया है कि डेमोक्रीटस ने सुख-शान्ति ( eythymia ) को जीवन का लक्ष्य माना है ।
डेमोक्रीटस नैतिक जीवन में तर्क की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं । मानव के समस्त आचरण का अंत समाज का और अंततः मनुष्य का कल्याण है । कल्याण का अर्थ सिर्फ बौद्धिक सन्तुष्टि नहीं, बल्कि इंद्रियों का सुख भी हैं । हम डेमोक्रीटस की शिक्षाओं में सुखवाद के बाजों को देख सकते हैं । वास्तविक प्रसन्नता मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य है । यह संतुष्टि या सुख की भीतरी अवस्था है, जो आत्मा की शांति, मेल और निर्भयता पर निर्भर करती है । यह प्रसन्नता, संपत्ति या भौतिक वस्तुओं से नहीं आती है और न ही शरीर के सुखों से मिलती है । इसके लिए थोड़ा कष्ट उठाना पड़ता है और इसके लिए आनंद की पुनरावृत्ति और संयम की आवश्यकता होती है । अपकी इच्छाएं जितनी कम होगी आपको उतनी ही कम निराशा होगी । सभी सद्गुण तभी मूल्यवान है, यदि ये प्रसन्नता पैदा करने में सहायक हैं । शत्रुता, ईर्ष्या और मन की कड़वाहट वैमनस्य पैदा करते हैं और ये सभी को नष्ट कर देते हैं । सही काम करने के लिए कर्तव्य का बोध होना चाहिए । किसी भी नैतिक आचरण को सजा के डर से नहीं करना चाहिए । हमें राष्ट्र की भी सेवा करनी चाहिए क्योंकि यदि राष्ट्र में शांति होगी तो राष्ट्र के सभी क्षेत्रों में वृद्धि होगी । यदि राष्ट्र के शासन में भ्रष्टाचार हो तो वहां कोई कानून या व्यवस्था नहीं होगी बल्कि सिर्फ अव्यवस्था ही होगी ।
डेमोक्रीटस का ईश्वर सिद्धान्त
डेमोक्रीटस के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व है । ईश्वर परमाणुओं से बना है । ईश्वर भी मनुष्य की भांति मरते हैं, लेकिन उनका जीवन काल मनुष्यों की अपेक्षा अधिक होता है । वे मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली होते हैं और उनमें उच्चस्तर की तर्कबुद्धि पाई जाती है । ईश्वर के बारे में मनुष्यों को सपनों में पता चलता है । वे मनुष्यों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, इसलिए मनुष्य को उनसे डरना नहीं चाहिए । अन्य सभी चीजों की तरह ही ईश्वर भी परमाणुओं की गति से संचालित होते हैं । मनुष्यों को अच्छे कार्यों को करने और उन पर चिंतन के लिए मानसिक शक्ति प्राप्त करनी चाहिए ।
डेमोक्रीटस ( Democritus ) के प्रमुख दार्शनिक कथन
- परमाणु मौलिक, अविभाज्य, अतीन्द्रिय, नित्य, उत्पत्ति-विनाश-रहित जड़ तत्व हैं ।
- गति परमाणुओं का धर्म है ।
- परमाणुओं में केवल संख्या, परिमाण और आकार का भेद है; अन्य गुणों का भेद उनमें नहीं है ।
- परमाणु आकाश में स्थित हैं और एक दूसरे से अलग हैं ।
- सृष्टि की उत्पत्ति का अर्थ है - परमाणुओं का परस्पर संयोग और विनाश का अर्थ है - परमाणुओं का परस्पर वियोग ।
- आत्मा या विज्ञान जैसा कोई अलग तत्व नहीं है, वह भी परमाणुओं के विशिष्ट संयोग से उत्पन्न होता है ।
----------------------