Sunday, May 22, 2022

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन 

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन 

तर्क शास्त्र 

         अरस्तू तर्क शास्त्र के क्षेत्र के वास्तविक अन्वेषक थे । आज भी उनके तर्क शास्त्र का अनुसरण किया जाता है । अरस्तू के अनुसार तर्क शास्त्र सही चिंतन की कला है और इसलिए इससे सत्य की प्राप्ति होती है । तर्कशास्त्र की अन्य विषयों की भांति कोई विशेष विषयवस्तु नहीं होती है, लेकिन यह अन्य विषयों के लिए एक साधन तथा यंत्र की भांति कार्य करता है । 

व्यवस्थापन 

        अरस्तू ने तर्कशास्त्र के व्यवस्थापन पर काफी काम किया । वे इस तथ्य पर ध्यान देने वाले पहले व्यक्ति थे कि मस्तिष्क की एक निश्चित मूल संरचना और विधि होती है और उन्होंने वह ( मस्तिष्क ) क्या है और कैसे कार्य करता है, इसे बताने का प्रयास किया । उनके अनुसार मस्तिष्क के कार्य करने के तीन मूल घटक होते हैं अवधारणा, निर्णय और तर्क । 

        अरस्तू के अनुसार अवधारणा वह है, जिसमें आधार वाक्य यानि निर्धारक और वह जिसका यह निर्धारण करता है दोनों का संकल्प होता है । उन्होंने फिर अवधारणा को उसके 10 संवर्गों या भिन्न प्रकारों में व्यवस्थित किया । अतः अवधारणा विषय का विधेय ( निर्धारक ) होती है और उसका सार या मात्रा, गुण, संबंध, स्थान, समय, स्थिति, प्रकृति, कार्य या आवेग को बताती है । 

  • वस्तु - मनुष्य, घोड़ा, मेज आदि
  • मात्रा - दो फुट लंबा, तीन फुट लंबा 
  • गुण - सफेद, पढ़ालिखा 
  • संबंध - दोगुना, आधा या अधिक 
  • स्थान - लाइसियम में, बाजार में 
  • समय – बीता हुआ कल, पिछले वर्ष 
  • मुद्रा - मेज पर झुका हुआ, बैठी ( स्थिति ) 
  • अवस्था - जूते पहने हैं, कवच में है ( प्रकृति ) 
  • कुछ कर रहा है - कटाई, आग जलाना ( क्रिया ) 
  • किसी विशेष स्थिति से गुजर रहा है - काटे जाना, जलाया जाना ( भावना ) 

           उन्होंने सावधानी से परीक्षण किया कि जब हम निर्णय लेते हैं, तो क्या होता है और अनुभव किया कि अकेला यह ( निर्णय ) ही सत्यता या असत्यता का स्रोत है । फिर उन्होंने उनकी गुण ( सकारात्मक और नकारात्मक ) मात्रा ( सर्व विशेष और एकल ) तथा रूपात्मकता ( वास्तविक , आवश्यक सम्भावना ) की जाँच की । उन्होंने निर्णयों के विनिमय का भी अध्ययन किया । तर्क की भांति ही उन्होंने न्यायवाक्यों का उनके मूल प्रकारों में अपचयन करके सबसे सामान्य तर्कदोषों और तार्किकता का खुलासा किया । अंत में उन्होंने यह पता लगाने का प्रयास किया कि किस प्रकार सार्वभौमिक आधार वाक्य बनते हैं और किस प्रकार वैज्ञानिक ज्ञान का आगमनिक तर्क, संवाद, प्रदर्शन और समस्याओं के समाधान के द्वारा आगे विकास किया जा सकता है । 

परिभाषाएँ 

         पदों के अर्थ सम्बंधित उलझन एक प्रमुख कारक है जो असहमति आदि के लिए उत्तरदायी होते हैं । अरस्तू ने उचित परिभाषा के लिए नियम बनाए और इसके लिए कुछ बहुत अच्छे उदाहरण भी दिए । जैसे कि

  • गति - "संम्भावित ऊर्जा या उद्देश्यों की पूर्ती, जिस सीमा तक यह संभावना के रूप में विद्यमान है, गति कहलाती है”। 
  • समय - "पहले और बाद के क्रम में गति का मापन है" । 

विश्व-दर्शन 

          अरस्तू ने प्लेटो के प्रत्ययों के सिद्धांत के विरुद्ध अनेक तर्क प्रस्तुत किए । प्लेटो के सिद्धांत के अनुसार निषेधों और संबंधों के भी फोर्म होने चाहिए । परन्तु अरस्तू के अनुसार प्रत्ययों का सिद्धांत निर्थक है । यह एक असंभव सिद्धांत है कि तत्व ( पदार्थ ) और जिसका वह तत्व है, अलग-अलग पाए जाएं । पदार्थ (Substance) और गुण हम तत्वमीमांसा को गहराई से समझे बिना इन दोनों में अंतर करते हैं । पदार्थ वह है जो विषय का निर्धारक नहीं होता है, बल्कि जिससे हर वस्तु का निर्धारण किया जाता है । अथवा इसे दूसरे तरीके से कहे तो यह "वह है जो प्रथमतः विद्यमान है और जिससे होने की सभी श्रेणियाँ संदर्भित होती हैं ।" गुण वह है जो "किसी चीज से संबद्ध होते हैं और जिनका वास्तविक रूप से या तो आवश्यक रूप से या सामान्य रूप से निर्धारण किया जा सकता है ।" 

कार्य और संभाव्यता/सामर्थ्यता का सिद्धांत 

         यह सिद्धांत पारमेनाइड्स द्वारा गति और बहुगुणता के विरुद्ध उठाए गए प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अत्यधिक तात्विक आधार प्रदान करता है । पारमेनाइडस और अन्य दार्शनिक ऐसे सत् और असत् की बात करते थे, जिनकी कोई और श्रेणी नहीं थी और जिसका निहितार्थ यह था कि किसी वस्तु के अस्तित्व के लिए उसको सिर्फ शुद्ध और सहज रूप से सत् या असत् होना चाहिए । मूलरूप से यह सिद्धांत उस स्थिति पर आधारित था कि कोई वस्तु निश्चित रूप से दो ही प्रकार की हो सकती है वह या तो ऐसे प्रकार की ( सामर्थ्य ) या वह वैसे प्रकार की हो सकती है । प्रत्येक परिवर्तन से तात्पर्य यह है कि परिवर्तित होने वाली वस्तु में होने वाले परिवर्तन की सम्भाव्यता विद्यमान है । अंत में, किसी परिवर्तन का अर्थ उसमें मौजूद सामर्थ्य के वास्तविकीकरण से होता है । अतः उसकी सामर्थ्य वास्तविकीरण ( या कार्य ) के संदर्भ में उसकी क्षमता होती है, जबकि कार्य ( या वास्तविकीकरण ) किसी प्रकार की पूर्णता या गुणवत्ता होती है । सामर्थ्य निष्क्रिय हो सकती है, उदाहरण के लिए, ध्वनि को सुना जा सकता है अर्थात् सुने जाने की निष्क्रिय सामर्थ्य सक्रिय सामर्थ्य कार्य करने की शक्ति या क्षमता होती है । ( उदाहरण कान में सुनने की सक्रिय सामर्थ्य होती है ) । ये ध्यान दिया जाना चाहिए कि निष्क्रिय सामर्थ्य भी किसी न किसी रूप में संबंधित वस्तु की ओर से पूर्व निर्धारित होती है । उदाहरण के लिए, ध्वनि में सुने जाने की निष्क्रिय सामर्थ्य होती है, जबकि रंग में यह नहीं होती । कार्य और सामर्थ्य के इस सिद्धांत के अरस्तू के दर्शन शास्त्र में अनेक निहितार्थ हैं । 

          सत् शुद्ध कार्य है, इसमें कोई अपूर्ण संम्भाव्यता शेष नहीं है, जिसका की अनुभव करना बाकी हो । यह स्वयं में पूर्णता है । इसी प्रकार का सत् ईश्वर होना चाहिए । फलक के दूसरे सिरे पर महज सामर्थ्य/सम्भाव्यता प्रधान तत्व होता है । इनके बीच में मिश्रित कार्य और हमारे दैनिक अनुभव होते हैं । इनमें कुछ पूर्णता ऐसी होती है जिनका अनुभव वास्तव में हो चुका है, लेकिन इनमें अनेक सामर्थ्य पूर्णता को अर्जित करने या खोने की भी होती है । ये सब परमेनाइड्स और उनके मतानुयायीयों द्वारा गति और अनेकता पर उठाए गए प्रश्नों के समाधान हैं । 

चार कारण 

         अरस्तू का कारण सिद्धांत उसके एक दूसरे सिद्धांत कार्य और सामर्थ्य को समाहित किये हुए है । अरस्तू ने अनुभव किया कि मनुष्य तभी संतुष्ट हो सकते हैं, जब वे किसी वस्तु के बारे में जानकारी प्राप्त कर ले और जब वे वस्तु के पीछे के कारण को समझ ले । वस्तुतः हम जो कुछ भी देखते हैं उसके चार सिद्धांत या कारण होते हैं, जो उसे प्रभावित करते हैं । प्रथमतः दो आन्तरिक कारण होते हैं । ये आन्तरिक कारण इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि वे कार्य से अपर्याप्त रूप से विभेदित होते हैं । ये दो कारण हैं - उपादान कारण ( वह जिससे ये कोई वस्तु बनी है ), उदाहरण के लिए मेज की लकड़ी, और औपचारिक या आकारिक कारण ( जो किसी वस्तु को वैसा बनाते हैं जैसी वह है, उदाहरणार्थ लकड़ी का रूप लकड़ी को लकड़ी बनाता है ) । फिर दो बाह्य कारण होते हैं जो अपने कार्य से पूर्ण रूप से स्वतन्त्र होते हैं किन्तु ये आरंभ करने वाले होते हैं । ये है, निमित्त कारण, उदाहरणार्थ मेज के संदर्भ में बढ़ई, और प्रयोजन या अंतिम कारण ( वह कारण जिसके लिए कार्य उत्पन्न होता है जैसे बढ़ई के मेज बनाने के लिए धन । 

         अरस्तू ने दिखाया कि कैसे उपादान कारण आकारिक कारण के सन्दर्भ में ठीक ऐसे ही सामर्थ्य का प्रतिनिधित्व करता है जैसे कि 'मैटर’ ‘फौर्म’ के लिये करता है । 

प्रथम-दर्शन 

         प्रथम दर्शन तत्वमीमांसा भी कहलाता है। यह  सभी वस्तुओं के चरम सिद्धांत और कारणों का अध्ययन करता है, वे क्या है ? 

यह सत् प्लेटो के 'फोर्म' ( आकार ) नहीं है 

        'फोर्म' संभवतः एक ही प्रकार के अनेक जीवों में पाई जाने वाली समानता को प्रदर्शित करती है और अपने आप में स्वतन्त्र रूप से वैयक्तिक वास्तविकताएं होती हैं । लेकिन अरस्तू के अनुसार यह स्थिति विरोध उत्पन्न करती है । यदि फौर्म वास्तव में विशेषीकृत सत् ( पदार्थ ) है तो यह मानना निर्थक है कि ये अन्य दूसरे विशेषीकृत पदार्थों से कोई भागीदारी कर सकती है । अंत में, हम किसी भी प्रकार से यह ज्ञात नहीं कर सकते कि किस प्रकार 'फौर्म', जो शाश्वत् रूप से अपरिवर्तनीय हैं, परिवर्तित होती है । जबकि ये स्वयं विश्व में घटित सभी घटनाओं का मूल सिद्धांत और आदि कारण मानी जाती है । 

गणित के सम्बंध में स्थिति 

        'फौर्म' का सबसे उचित तर्क गणितीय प्रकृति का प्रतीत होता है । क्या गणित का प्रत्यय (फौर्म) अपने आप में वर्ग से तथा अपने आप मे त्रिकोण से संबंध रखता है ? अरस्तू मानते हैं कि गणित से लेकर प्लेटो की फौर्म तक प्राकृतिक जगत से स्वतंत्र और कोई तार्किक सत् नहीं है । गणित प्राकृतिक विज्ञान की भांति एक विज्ञान है । इसमें प्राकृतिक वस्तुओं के सिर्फ कुछ अमूर्त रूपों का अध्ययन बिना यह माने किया जाता कि ऐसे अमूर्तरूप स्वयं वस्तु होते हैं । गणित या रेखागणित में समझने के लिए संकल्पनात्मक रूप से गुणों का पृथककरण किया जाता है । 

पदार्थ ( मैटर ) और आकार ( फौर्म ) 

          पदार्थ वह है जो मूल आधार या प्राथमिक रूप से होता है । वह क्या है , जो किसी वस्तु को पदार्थ बनाता है ? प्राकृतिक वस्तुएं मैटर और फौर्म की बनी होती है । क्या यह मैटर है, जो किसी पदार्थ को वस्तु बनाता है । ऐसा नहीं है । मैटर आकार से पृथक होकर सिर्फ संभावय होकर रह जाता है । मूल तत्व से यह अपने आप में कोई वस्तु नहीं है । इसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हो सकता है । यह आकारिक रूप में ही पाया जाता है । अतः यह मैटर नहीं है, जो किसी वस्तु को वैसा बनाता है जैसी वह है । तब, क्या यह फौर्म हो सकता है ? अरस्तू के अनुसार यह फौर्म ही है । 

          पदार्थों के भौतिक रूप के लिए उत्तरदायी फौर्म को उन्होंने वस्तु का सार कहा है । सार की अभिव्यक्ति उन परिभाषाओं से होती है, जो हमें बताती हैं कि वस्तुएं क्या है ? अतः फौर्म वस्तुओं का सार है । लेकिन पदार्थ वह है, जो स्वतंत्र रूप से एक अलग इकाई के रूप में रह सकता है । इससे एक बहुत ही दिलचस्प संभावना पैदा होती है कि क्या ऐसा पदार्थ भी हो सकता है, जो मैटर और फौर्म के योग से न बना हो ? क्या ऐसे पदार्थ भी हो सकते हैं जो शुद्ध आकार हो ? उत्तर है, पूरी प्रकृति भौतिक पदार्थों की बनी है, जिसमें मैटर उसमें पाए जाने वाले फौर्म की उपस्थिति द्वारा किसी निश्चित आकार में निरूपित होता है । 

ईश्वर-विचार 

         प्रकृतिक जगत में सबसे अच्छी चीजें वे होती हैं जो आदर्शों के सबसे समीप होती है । अरस्तू का मानना था कि ये खगोलीय पिंड हैं, जो निरंतर वृहत वृत्तों में घूमते रहते हैं । लेकिन ऐसी अनवरत गति भी स्व-व्याख्यात्मक नहीं है । मेटाफिजिक्स में अरस्तू ने कहा है कि कोई ऐसी वस्तु है जो सदैव अविराम रूप से गति करती रहती है और यह गति वृत्तीय होती है और ... इसलिए प्रथम दैवीय सत् अवश्य ही अनंत होगा । तब कुछ ऐसा अवश्य होना चाहिए जो इसे गति उत्पन्न करता है । लेकिन चूँकि वह गति करता है तथा गतिशील वस्तुएं मध्यवर्ती होती हैं । अतः कुछ ऐसा अवश्य है जो स्वयं स्थिर रहते हुए विश्व को गति प्रदान करता हो, जो अनन्त हो । यही वास्तविक सत् होगा । 

         प्राकृतिक जगत, जिसमें खगोलीय पिंडों की अनंत गति है, क्या इसका कोई अनंत और चरम चालक है ? अरस्तू का कहना है कि ऐसा अवश्य ही होगा अन्यथा हम किसी भी वस्तु की गति के विषय में कुछ भी नहीं बता सकते हैं । सभी 'चालक' 'मध्यवर्ती' चालक नहीं हो सकते हैं । क्योंकि ऐसा होने पर यह श्रृंखला अनंत तक चलती जाऐगी, लेकिन अनंत रूप से अनेक वस्तुओं की वास्तव में गणना नहीं हो सकती है । अतः अवश्य ही कुछ ऐसा है, जो स्वयं बिना गति किए चीजों को गति प्रदान कराता हैं ।

         यही नहीं, हम उसके विषय में कुछ निश्चित तथ्य अवश्य जान सकते हैं । यह स्वयं में अनंत है, चूँकि यह स्वर्गीक पिंडों की अनंत गति के लिए उत्तरदायी है और इसलिए उनसे अधि क व्यापक है । यह अनिवार्य रूप से पदार्थ होगा, क्योंकि जिस पर अन्य पदार्थ निर्भर करते हों वह उन निर्भर पदार्थों से कम नहीं हो सकता है । निःसंदेह, यह पूर्णतः वास्तविक है, अन्यथा इसके जो अचल चालक होने का दावा किया जाता है, उसके लिए और आगे किसी अन्य चालक की आवश्यकता होगी । अरस्तू के लिए यह चालक ही अंतिम कारण है । यह निष्कर्ष एक साम्यानुमान से प्रेरित होता है । 

        अब, ईच्छा और चिन्तन के विषय ठीक इसी प्रकार से वस्तुओं को बिना स्वयं गति किए गति कराते हैं । अर्थात सभी वस्तुओं का परम कारक ही अंतिम कारक है । यह वह है जिससे अन्य सभी वस्तुएँ प्रेम करती हैं । इसके लिए उनका प्रेम इसे गतिशील रखता है । सभी वस्तुओं का परम कारक और सबकी 'इच्छा' की वस्तु होने के कारण इसे सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए । यह श्रेष्ठ होगा । यह ईश्वर होगा । अतः ईश्वर उच्चतम स्तर पर इस जीवन के आनंद को ग्रहण करता है । अतः ईश्वर शाश्वत रूप से विद्यमान तत्व है, जो पूर्ण सत्य विचार का जीवन जीता है । 

         अरस्तू ने अपने इस प्रथम चालक को ईश्वर कहा है । उनकी दृष्टि में कोई अलौकिक विधाता नहीं है । किसी ने ब्रह्मांड की रचना नहीं की है, क्योंकि यह शाश्वत है । यह सत्य है कि वह उसी प्रकार गति उत्पन्न करता है, जिस प्रकार की कोई सुन्दर चित्र मनुष्य को उसे खरीदने के लिए प्रेरित करता है । अरस्तू के लिए ईश्वर एक पूजा की वस्तु नहीं है, बल्कि वह एक तत्वमीमांसीय आवश्यकता है ।

मानव-दर्शन 

         अरस्तू मनुष्यों के संबंध में प्लेटो के विचार से शुरूआत करते प्रतीत होते हैं । अरस्तू डीऐनिमा में कहते हैं कि आत्मा तीन प्रकार की होती हैं – 

  1. पोषक आत्मा ( वनस्पति जगत ) 
  2. संवेदनशील आत्मा ( सभी जीवधारी- पशु ) 
  3. तर्कसंगत आत्मा ( मानव ) 

        अरस्तू के अनुसार ये तीनों प्रकार की आत्माऐं एक प्रकार का गुणात्मक एवं उद्देश्यपरक पदानुक्रम प्रदर्शित करती हैं । उच्चस्तरीय आत्म अपने आप में निम्न स्तरीय आत्म के सभी गुणों को समाहित किए रहती है । सभी निम्नस्तरीय जैविक वस्तुएं पोषण एवं प्रजनन करती हैं । जन्तु केवल पोषण एवं प्रजनन ही नहीं करते वरन् गति और एन्द्रिक सम्वेदन भी करते हैं । जबकि, मानव वनस्पति एवं जन्तुओं की सभी क्रियाओं के साथ-साथ बौद्धिकता को भो धारित करते हैं । 

        अरस्तू का विश्व-दर्शन उद्देश्य परक है । यद्यपि उनके अनुसार, सम्पूर्ण जगत चेतन-जगत नहीं है तथापि इसकी सभी वस्तुएं अपने-अपने स्वरूपगत लक्ष्यों से संचालित होती हैं । एक ओर जहाँ निम्नस्तरीय वस्तुएं पोषण, प्रजनन, गति, संवेदन आदि उद्देश्यपरक क्रियाओं से संचालित होती हैं वहीं दूसरी ओर, मानव बौद्धिकता के कारण अच्छे-बुरे, सुख-दुख, उचित-अनुचित आदि के भावों के आधार पर विकल्पों का चुनाव करते हैं और उसी अनुसार निर्णय करते हैं । अपनी बौद्धिक शक्ति के आधार पर वे नये संगत नियमों, सिद्धान्तों और मानकों की खोज करते हैं ताकि वे अपने स्वगत उद्देश्यों ( उचित बुद्धिमता पूर्ण क्रियाऐं - मध्यम मार्ग ) को प्राप्त कर सके । 

नीतिशास्त्र 

         नीतिशास्त्र तर्क के अनुरूप ( सही सोच के क्या मानक हैं ? ) आचरण का विज्ञान ( अच्छे जीवन के क्या मानक है ? ) है । यह सिर्फ जानने का नहीं बल्कि व्यवहार में लाने का भी विज्ञान है । इसका संबंध सिर्फ इससे नहीं है कि क्या अच्छा हैं ? बल्कि इससे भी है कि मैं कैसे अच्छा हो सकता हूँ ? नीतिशास्त्र मनोविज्ञान नहीं है यद्यपि यह उससे जुड़ा हुआ है । नीतिशास्त्र किसी दिए गए समय पर मनुष्य की आत्मा द्वारा विकल्पों के रूप में उपलब्ध व्यवहार के अनेक क्रमों में से सही चयन की आवश्यकता से विकसित हुआ है । अच्छा-बुरा मानव के सन्दर्भ में ही अर्थपूर्ण होता है, इसलिए इसका उल्लेख तभी किया जा सकता है, जब यह ज्ञात हो कि मनुष्य क्या है ? मनोविज्ञान का अध्ययन शिक्षाशास्त्र में और विशेषरूप से अच्छे व्यवहार और विचार को सीखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है । 

          अरस्तू के अनुसार मनुष्य का एक ही साध्य है, सुख सुख वह है जिसका चयन हर व्यक्ति अपने हिसाब से करता है । यह अन्य किसी और वस्तु के लिए साधन नहीं है । अतः सुख कोई ऐसी चीज है जो पूर्ण और स्वयं में पर्याप्त है । यह क्रिया का अंत है । सुख उस अधिक व्यापक, अधिक पूर्ण अधिक स्थायी संतुष्टि का नाम है जिसे मनुष्य की तर्क बुद्धि सम्भव बनाती है लेकिन साथ ही इसकी प्राप्ति मनुष्य के पास अन्य विकल्पों के होने के कारण अधिक कठिन हो जाती है । इस संभावना की कल्पना करना भी अपेक्षाकृत सरल संवेदनशील आत्मा ( निम्न श्रेणी के जीव ) द्वारा संभव नहीं है । अतः तार्किक आत्मा ( मानव ) को सुख प्राप्ति का प्रयास , बिना किसी असफलता की परवाह किए करते रहना चाहिए ।

चिंतन श्रेष्ठ सुख है 

        हम कह सकते हैं कि सुख वह है जिसका अनुभव हम तब करते हैं, जब हम अपनी श्रेष्ठता और पूर्णता में जीते हैं । जब हम अपनी प्रकृति के अनुरूप कार्य करते हैं । जब हम साध्य ( सुख ) को बिना किसी बाधा के प्राप्त करने से सफल होते हैं । जब हमें अपने वास्तविक स्वरूप की पूर्ण प्राप्ति होती है । चूँकि मनुष्य की गतिविधियाँ अनेक हैं, सबसे अच्छी और ऊँची गतिविधि अर्थात् वह गतिविधि जो सबसे अधिक पूर्णता से मानव स्वभाव को समझती और अभिव्यक्त करती है, वह चिंतन है । चिंतन में ब्रह्मांड के विषय में परम सत्य का बोध होने में सबसे बड़ी प्रसन्नता निहित है, जिसके लिए मनुष्य सक्षम है । 

नीतिशास्त्र से राजनीति में संक्रमण 

       कोई भी व्यक्ति स्वयं में पूर्ण नहीं है । मनुष्य समुदाय के बिना ठीक से नहीं रह सकता है । अतः मनुष्य समुदायों में नगर में रहता हैं । अरस्तु ने नीतिशास्त्र पर अपने कार्य में, व्यक्ति के बारे में चर्चा की है । उन्होंने अपनी पुस्तक पालिटिक्स में नगर के जीवन के बारे में उल्लेख किया है । अरस्तू की नगर की अवधारणा जैविक है और नगर की इस रूप में अनुभूति करने वाले वह पहले व्यक्ति माने जाते हैं । अरस्तू ने नगर को एक प्राकृतिक समुदाय माना है । यही नहीं, उन्होंने नगर को परिवार से पहले माना है जो कि व्यक्ति से भी पहले आता है अर्थात जो बनने के क्रम में अंतिम और होने के क्रम में पहले स्थान पर है । अरस्तु अपने कथन "मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक पशु है" के लिए भी प्रसिद्ध है । अरस्तू ने राजनीति को एक तत्व के रूप में मशीन की बजाय जीव के रूप में समझा है । उनके अनुसार यह ऐसे भागों का समूह है, जिनमें किसी का भी दूसरे के बिना अस्तित्व सम्भव नहीं है । 

सद्गुण 

        अरस्तू ने बौद्धिक और नैतिक गुणों की बात की है । बौद्धिक गुण वे हैं जो हमें सत्य की और तथा अन्ततः सभी सत्यों में सबसे श्रेष्ठ सत्य-ईश्वर की प्राप्ति में सहायता प्रदान करते हैं । इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें नैतिक मूल्यों को विकसित करना पड़ता है । ये बौद्धिक सद्गुण इसमें हमारी सहायता करते हैं और जब तक ये हैं तब तक हमारी कामनाओं पर नियंत्रण रखकर हमें सही कार्य करने में समर्थ बनाते हैं । इस संदर्भ में यह स्पष्ट है कि अरस्तू कैसे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सद्गुण दो बुराईयों के मध्य स्थित रहने वाला मूल्य ( गुण ) है । ये बुराईयाँ दो अंतियों को प्रदर्शित करती है और दोषों से उत्पन्न होती है । 

कला और साहित्य 

       अरस्तु पोइटिक्स में प्लेटो द्वारा त्रासदी की आलोचना करने और अपने राज्य से कवियों को निष्कासित कर देने की इच्छा की भ्रत्सना इस आधार पर करते हैं कि ऐसा विचार राजनेताओं और यौद्धाओं की भावनाओं को समाप्त करके उनकी इच्छाशक्ति और नैतिक शक्ति को कमजोर बना देता है । अरस्तू ने यह दिखाने के लिए भाव-विरेचन ( Catharsis ) के प्रसिद्ध सिद्धांत का उपयोग किया कि दया और डर की भावनाओं को प्रदर्शित करने से ( जो त्रासदी से उत्पन्न होती है ) आत्मा और उसके मनोभाव परिवर्तित और परिष्कृत हो जाते हैं । इससे कुछ हद तक आनंद और शांति की भावना का विकास होता है ।

दासत्व 

        अरस्तू के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र एक प्रकार का समुदाय है और प्रत्येक समुदाय की स्थापना अच्छाई के लिए की गई है । क्योंकि मनुष्य सदैव उसे प्राप्त करने के लिए कार्य करता है जिसे वह अच्छा समझता है । किंतु यदि सभी समुदायों का उद्देश्य अच्छाई करना है, तो राष्ट्र या राजनैतिक समुदाय, जिसका दर्जा सबसे ऊँचा है और जिसमें अन्य सभी शामिल हैं, का उद्देश्य किसी अन्य की तुलना में अधिक मात्रा में अच्छाई और सर्वश्रेष्ठ अच्छाई करना होना चाहिए । राष्ट्र परिवारों से मिलकर बनता है और परिवार मालिक और दास, पति और पत्नी, पिता और बच्चों से बनता हैं । कुछ विचारकों का मानना है कि दास पर उसके मालिक का शासन प्रकृति के विरुद्ध है । दास और स्वतंत्र व्यक्ति के बीच अंतर सिर्फ कानूनी रूप से ही है, प्राकृतिक रूप से नहीं, तथा प्रकृति से छेड़छाड़ अनुचित है । इस सम्बंध में अरस्तू का तर्क था कि संपत्ति परिवार की होती है और दास एक जीवित सम्पत्ति है । यह एक ऐसा साधन है, जो अन्य सभी साधनों से पहले आता है । मालिक सिर्फ दास का मालिक होता है वह स्वयं उससे सम्बंधित नहीं होता है, जबकि दास न सिर्फ अपने मालिक का दास होता है, बल्कि पूरी तरह से उसकी सम्पत्ति होता है । अतः स्वामित्व को कार्य के ऐसे साधन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो स्वामी से पृथक होता है । 

        प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है, जो स्वभाववश दास बनना चाहता हो और जिसके लिए ऐसी स्थिति उचित और सही हो या फिर सभी प्रकार की दासता प्रकृति का उल्लंघन है ? सजीव प्राणियों में आत्मा शरीर पर शासन करती है तथा भ्रष्ट लोगों में ही शरीर आत्मा पर शासन का प्रतीत होता है । पुनः पुरुष प्राकृतिक रूप में स्त्री से श्रेष्ठ होते हैं और स्त्री उससे निम्न होती है और सैद्धांतिक रूप में एक शासन करता है और दूसरा शासित होता है । ऐसा आवश्यक रूप से पूरी मानवजाति में वहाँ पाया जाता है जहा कही भी आत्मा और शरीर में या फिर मनुष्य और जन्तुओं में भेदभाव है । दास वे हैं जिनका काम अपने शरीर का उपयोग अर्थात् शारीरिक श्रम करना है, क्योंकि वे इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकते हैं । निम्नतम कोटि के जन स्वभाव से दास होते हैं और उनके लिए सभी निम्नतर जनों की भांति यह बेहतर है कि वे स्वामी के शासन में रहें । अतः जो ऐसे होते हैं, वे प्रकृति से दास स्वभाव के होते हैं तथा दूसरी ओर वे होते हैं, जो तर्कपूर्ण सिद्धान्तों को समझते हैं और उनके निर्माण में भाग लेते हैं, वे स्वभाव से मालिक होते हैं ।

अरस्तू ( Aristotle ) के प्रमुख दार्शनिक कथन

  • मनुष्य स्वभाव से राजनीतिक पशु है । 
  • सामान्य 'विशेषों में ही अनुस्यूत है । 
  • ईश्वर जगत को वैसे ही गतिशील बनाता है जैसे प्रेमिका प्रेमी को । 
  • ईश्वर एक शुद्ध आकार है । 
  • ईश्वर शुद्ध आकार, शुद्ध सत्ता, परमपूर्ण और सर्वज्ञ है और संसार का आदि प्रथा प्रयोजन कारण है । 
  • समान के साथ समान व्यवहार और असमान के साथ असमान व्यवहार करना चाहिए । 
  • आकार वस्तुओं से पृथक नहीं है बल्कि उनमें अंतर्निष्ठ है, वे इंद्रियातीत नहीं है बल्कि अनुस्यूत है । 
  • आगमन में अन्तःप्रज्ञा एक आवश्यक तत्त्व है, ऐसी प्रक्रिया जिसमें इंद्रिय प्रत्यक्ष से सार्वभौमिक ज्ञान प्राप्त होता है । आत्मा जीवित शरीर का रूप है । अलग-अलग तरह के जीवों में अलग-अलग तरह की आत्मा होती है । कुछ मनुष्यों में आत्मा का बौद्धिक अंश पूर्णतः विकसित नहीं होता । 

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Saturday, May 21, 2022

अरस्तू ( Aristotle ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

अरस्तू ( Aristotle ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

अरस्तू ( Aristotle ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 384 ई० पू० से 322 ई० पू० 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "समान के साथ समान व्यवहार और असमान के साथ असमान व्यवहार करना चाहिए" 

प्रमुख उपाधि - तर्कशास्त्र का जनक 

प्रमुख कथन - "आकार वस्तुओं से पृथक नहीं बल्कि उनमें अंतर्निष्ठ है, वे इंद्रियातीत नहीं बल्कि अनुस्यूत है"


        अरस्तू ( Aristotle ) का जन्म थ्रेस के स्टेगिरा नामक नगर में हुआ था । उनके पिता मेसीडोन-नरेश के राजवैद्य थे । 17 वर्ष की आयु में एरिस्टॉटल विद्या ध्ययन के लिये एथेन्स स्थित प्लेटो की 'एकेडमी' में भर्ती हुए और बीस वर्ष तक, प्लेटो का देहान्त होने तक, वे अपने गुरु प्लेटो के साक्षात् सम्पर्क में रहे । बाद में उन्होंने एकेडमी छोड़ दी और अपने स्वतंत्र विचारों के विकास में लग गये । एसोस नगर में जाकर वे हरमियस के सम्पर्क में आये और उनकी भतीजी पाइथियस से विवाह कर लिया । मेसीडोन-नरेश फिलिप के राजकुमार एलेक्जान्डर (सिकन्दर) के, जो बाद में 'महान्' कहलाये, वे तीन वर्ष तक अध्यापक रहे । एथेन्स लौटकर उन्होंने अपनी 'लाइसियम' ( Lyceum ) नामक शिक्षा संस्था की स्थापना की । एलेक्ज़ान्डर की मृत्यु के बाद उन पर अधार्मिकता का अभियोग लगाया गया और वे एथेन्स छोड़कर चालसिस चले गये, क्योंकि वे एथेन्सवासियों को "दर्शन के विरुद्ध दूसरा पाप करने का अवसर” देना नहीं चाहते थे ( एथेन्सवासियों का दर्शन के विरुद्ध पहला पाप सॉक्रेटीज़ ( सुकरात ) को मृत्यु दण्ड देना था ) । वहीं एक वर्ष बाद उनका देहान्त हो गया । जनश्रुति के अनुसार एरिस्टॉटल का सिर गंजा, पैर पतले और आखें छोटी थीं और वे हकलाते थे । उनको ग्रीक होने का अभिमान था और वे अन्य लोगों को 'बर्बर' या जंगली समझते थे । साधारण ग्रीक लोगों को भी वे तुच्छ समझते थे । वे बुद्धि और इन्द्रियानुभव दोनों का सामंजस्य करके 'मध्यम' मार्ग के समर्थक थे । 

प्लेटो के बाद दार्शनिक महत्ता में एरिस्टॉटल का ही नाम आता है । उन्होंने दर्शन, तर्कशास्त्र, मनोविज्ञान, भौतिक विज्ञान, प्राणि-विज्ञान, आचार-शास्त्र, राजनीति और साहित्य पर महत्वपूर्ण विचार प्रकट किये हैं । पाश्चात्य निगमन तर्क के तो वे जनक ही हैं और उसको उन्होंने जो रूप दिया वह शताब्दियों तक मान्य रहा और आज भी उसका महत्व है । मध्य युग के दार्शनिकों का मुख्य कार्य ईसाई धर्म के सिद्धान्तों का एरिस्टॉटल के विचारों के साथ समन्वय करना था । 

लेखन कार्य 

अरस्तू के लेखन कार्य के अपूर्व आयामों की अभिव्यक्ति दो सौ से अधिक ज्ञात शीर्षकों में हुई है । 

1) डायलॉग्स / संवाद 

  • संक्षिप्त कार्य - आन रीटोरिक, आन सेल्फ, ऐक्जोरसन टु फिलासफी 
  • निबन्धवत् - आन वेल्थ, आन प्रेयर, आन गुड बर्थ, आन प्लेजर, आन फ्रेन्डसिप, आन किनसिप, एलिक्जैंडर ( आन कालोनिस्टस ) 
  • एक से अधिक पुस्तकों के कार्य - पालिटिक्स, आन पोयटस, आन जस्टिस, आन द गुड़, आन आइडियास, आन फिलासॉफी 
  • अन्य दार्शनिकों पर - आन डेमोक्रटिस आन पाइथागोरियनस एण्ड आन फिलासाफी ऑफ आर्कीटस 
  • अन्य दार्शनिकों से - फ्रोम प्लेटोस लॉस, फ्रोम द रिपब्लिक 
  • ट्रीटाइस 

2 ) तर्कशास्त्र ( द ओर्गेनोन ) - केटेगरीज, आन इण्टरप्रेटेशन, प्रायर ऐनालिसिस, टोपिक्स, आन साफिस्टिकेटिड रिफ्यूटेशन 

3 ) प्रकृतिक दर्शन 

क ) द फिजिक्ल वर्ल्ड - फिजिक्स, आन द हेवन, आन जेनरेसन एण्ड क्रप्सन, मेट्रियोलोजी 

ख ) द लिविंग - आन द साल, द हिस्ट्री ऑफ ऐनिमलस, मोवमेन्ट ऑफ ऐनिमलस, प्रोगरेसन ऑफ ऐनिमलस एण्ड जेनरेसन ऑफ ऐनिमल । 

4 ) तत्वमीमांसा 

5 ) नीतिशास्त्र - यूडेमेन एथिक्स, निकोमेकन एथिक्स, पॉलिटिक्स एवं मैग्ना मोरेलिया 

6 ) काव्यशास्त्र - रीटोरिक एण्ड पॉइटिक्स 

7 ) तथ्यों का संग्रह 

लाइसियम में अपने प्रवास के काल में अरस्तू ने सामूहिक अनुसंधान की व्यापक परियोजनाओं का निर्देशन किया और अत्यधिक विविध क्षेत्रों से आंकड़े एकत्रित करके निम्न को लिखा -

  • द हिस्ट्री ऑफ एनीमल्स 
  • द हिस्ट्री ऑफ प्लांट्स 
  • द पॉलिटिक्स, पाइथियन 
  • हिस्ट्री ऑफ लिटरेचर 

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Friday, May 20, 2022

प्लेटो ( Plato ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

प्लेटो ( Plato ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

प्लेटो ( Plato ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- निम्नलिखित कथनों में से कौन प्लेटो के अनुसार सत्य नहीं है ? 

  1. विज्ञान द्रव्य है ।
  2. विज्ञान देश एवं काल से परे है । 
  3. विज्ञान स्वयंभू है 
  4. विज्ञान गोचर है

2- प्लेटो के अनुसार विज्ञान है । 

  1. मानसिक 
  2. भौतिक 
  3. मानसिक एवं भौतिक 
  4. न मानसिक, न भौतिक 

3- सामान्यों के सम्बन्ध में निम्नलिखित सिद्धान्तों में से कौन-सा प्लेटो के द्वारा स्वीकार किया जाता है ? 

  1. नामवाद 
  2. सम्प्रत्ययवाद
  3. यथार्थवाद 
  4. संवृत्तिवाद 

4- निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्लेटो के अनुसार है ? 

  1. प्रत्यय विशेष होता है 
  2. प्रत्यय गुण है 
  3. प्रत्यय सामान्य है 
  4. प्रत्यय देश में अवस्थित हैं 

5- प्लेटो के दर्शन में प्रत्ययों से सम्बन्धित निम्न कथनों में से कौन-सा एक असत्य है ? 

  1. सत्ता एवं मूल्य की दृष्टि से प्रत्यय पदार्थों से श्रेष्ठ हैं 
  2. प्रत्यय सत् है, पदार्थ मात्र इनके अनुभव हैं 
  3. प्रत्ययों का ज्ञान इन्द्रियों से होता है न कि तर्कबुद्धि से 
  4. प्रत्यय श्रृंखलाबद्ध है 

6- निम्नलिखित कथनों में से कौन प्लेटो के प्रथम सिद्धान्त को सही रूप में प्रस्तुत करता है ? 

  1. यह प्रत्ययो का वस्तुवाद है । 
  2. यह सत्ता का प्रत्ययवाद है । 
  3. यह निरपेक्ष वस्तुवाद है 
  4. यह निरपेक्ष प्रत्ययवाद है 

7- प्लेटो के प्रत्यय सबसे उच्च प्रत्यय के अन्तर्गत सम्मिलित हैं, जोकि 

  1. ईश्वर का प्रत्यय है 
  2. शुभ का प्रत्यय है 
  3. आत्मा का प्रत्यय है 
  4. जगत् का प्रत्यय है 

8- प्लेटो के अनुसार विज्ञान अथवा प्रत्यय है - 

  1. ज्ञानमीमांसीय प्रत्यय 
  2. तत्त्वमीमांसीय सत् 
  3. मानसिक 
  4. कल्पना 

9- निम्नलिखित में से कौन-सा कथन प्लेटो के सामान्य विषयक सिद्धान्त को स्पष्ट करता है ? 

  1. केवल सामान्य ही वास्तविक तत्त्व है 
  2. सामान्य और विशेष दोनों सामान्य रूप से वास्तविक तत्त्व हैं 
  3. सामान्य विशेषों की अनुकृति है 
  4. सामान्य कोई वास्तविक तत्त्व नहीं है, वह केवल प्रत्यय है 

10- प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है ? 

  1. सामान्य, शाश्वत और इन्द्रियातीत विचार जगत् में रहता है । 
  2. सामान्य, विशेषों से पूर्व है 
  3. सामान्य, मूर्त व्यष्टि हैं 
  4. सामान्य, देश-निरपेक्ष और समय-निरपेक्ष है 

11- निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक प्लेटो को स्वीकार नहीं है ? 

  1. सामान्य परिवर्तनशील और नित्य होते हैं  
  2. सामान्य विशेषों की अपेक्षा अधिक वास्तविक होते हैं
  3. सामान्यों का स्वतन्त्र अस्तित्व है, जबकि विशेषों का अस्तित्व केवल गृहीत है 
  4. सामान्य केवल विशेषों में रह सकते हैं 

12- निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्लेटो के अनुसार सही है ? 

  1. आकार किसी भी जानने वाले मन से स्वतन्त्र बने रहते हैं 
  2. आकार ईश्वर के मन में रहने वाले प्रत्यय हैं 
  3. आकार दोनों हैं, मानसिक और भौतिक 
  4. आकार किसी भी प्रकार गृहीत नहीं हो सकते 

13- प्लेटो के अनुसार - 

  1. प्रत्यय भौतिक पदार्थ है 
  2. प्रत्यय देश कालातीत है 
  3. प्रत्यय सतत् परिवर्तनशील है 
  4. प्रत्यय वस्तुओं की प्रतिमूर्तियाँ हैं 

14- प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा सही नहीं है ? 

  1. प्रत्ययों की विविधता नहीं होती है 
  2. प्रत्ययों की एकता होती है 
  3. प्रत्यय वास्तविक तत्त्व है 
  4. प्रत्यय पदार्थों से श्रेष्ठ होते हैं 

15- निम्नलिखित में से कौन-सा कथन प्लेटो के सामान्य के सिद्धान्त का निदर्शन करता है ? 

  1. केवल सामान्य ही वास्तविक है 
  2. सामान्य तथा विशेष दोनों समान रूप से वास्तविक हैं 
  3. सामान्य विशेषों की प्रकृति है 
  4. सामान्य वास्तविक तत्त्व नहीं है, वरन् मात्र अवधारणाएँ हैं 

16- 'तृतीय मानव युक्ति' यह प्रदर्शित करती है कि प्लेटो का विज्ञान सिद्धान्त (थ्योरी ऑफ आइडियाज) ग्रस्त है - 

  1. असंगत अभिकथन के दोष से 
  2. चक्रक तर्क दोष से 
  3. आत्माश्रय दोष से 
  4. अनास्था दोष से 

17- प्लेटो के दर्शन में 'प्रत्यय' है - 

  1. सत परन्तु अस्तित्ववान नहीं 
  2. अस्तित्ववान् परन्तु असत् 
  3. न अस्तित्ववान न सत् 
  4. अस्तित्वान एवं सत् दोनों 

18- "सामान्यों का विशेष वस्तुओं से पृथक् अस्तित्व है ।" कथन है - 

  1. प्लेटो का 
  2. ह्यूम का  
  3. अरस्तू का 
  4. बौद्ध दर्शन का

19- प्लेटो के सिद्धान्त के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन सही नहीं है ? 

  1. ईश्वर, शाश्वत है और बदलता नहीं है 
  2. ईश्वर अच्छा है, परन्तु सदाचारी नहीं है 
  3. ईश्वर सृष्टा नहीं है 
  4. ईश्वर निर्माता है 

20- समान्यों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-से प्लेटों के मत है ?

  1. सामान्य अनेक से परे तक होता है । 
  2. सामान्य अनेक में से एक होता है । 
  3. सामान्य शाश्वत होता है । 
कूट 
  1. 1 और 3 
  2. 1 और 2 
  3. 2 और 3 
  4. ये सभी 
21- प्लेटों के सिद्धान्त के सम्बन्ध में निम्नलिखित में कौन-से कथन उन्हें सामान्य के बारे में वस्तुवादी प्रदर्शित करते है ?
  1. जब कुछ वस्तुओं का एक सामान्य नाम हो, तो उनका आकार भी सामान्य होता है । 
  2. विशेष प्रत्यय, प्रत्यय की अपूर्ण प्रतिलिपियाँ होते है । 
  3. 'बिल्ली' शब्द का अर्थ आदर्श, विलक्षण एवं सनातन बिल्ली है । 
  4. विशेष पदार्थ ज्ञान के विषय नहीं है । 
कूट 
  1. 1 और 2 
  2. 1, 2 और 3 
  3. 2 और 3 
  4. 2, 3 और 4 

22- "प्लेटो के दर्शन में ईश्वर के अस्तित्व से सम्बन्धित प्रमाण दिए गए हैं ।" निम्नलिखित में से इनमें सम्मिलित नहीं है 

  1. विश्व कारणमूलक युक्ति 
  2. आकारिक कारणमूलक युक्ति 
  3. असम्भव्यतामूलक युक्ति 
  4. सत्तामूलक युक्ति 
कूट 
  1. 1 और 4 
  2. 2 और 3 
  3. 3 और 4 
  4. ये सभी 

23- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. सामान्य पूर्व एवं परम सत् है । 
  2. प्रत्येक सामान्य एक इकाई है । 
  3. सामान्य अपरिवर्तनशील एवं अविनाशी है । 
  4. सामान्य विशिष्टों के बिना अस्तित्व में नहीं रह सकते । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 2 और 4 
  2. 2, 3 और 4 
  3. 1, 3 और 4 
  4. 1, 3 और 2 

24- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. मानवीय बुद्धि सक्रिय व निष्क्रिय दोनों होती है । 
  2. निष्क्रिय बुद्धि नाशवान है । 
  3. सक्रिय बुद्धि आत्मा के विकास की प्रक्रिया के आविर्भूत होती है । 
  4. सक्रिय बुद्धि अनश्वर है । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 2, 3 और 4 
  2. 1, 2 और 3 
  3. 1, 3 और 4 
  4. 1, 2 और 4 

25- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. लाल वस्तुओं के अलावा, लालपन है जिसका लाल वस्तुओं से स्वतन्त्र अस्तित्व है । 
  2. लालपन, अन्य सामान्यों की भाँति सार के रूप में विचारित होना चाहिए और इस प्रकार यह स्वयं में वास्तविक है । 
उपरोक्त कथनों में कौन-सा / से कथन द्वारा प्रस्तुत विचार के अनुरूप है / हैं ? 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 2 
  4. न तो 1 और न ही 2 

26- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. प्रत्यय सोपान क्रमिक होते हैं । 
  2. प्रत्यय देश-काल से परे होते हैं । 
  3. प्रत्यय स्वभावतः विशिष्ट होते हैं । 
  4. प्रत्यय सार्वभौमिक होते हैं । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 2 और 3 
  2. 1 , 3 और 4 
  3. 2, 3 और 4 
  4. 1, 2 और 4 

27- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए । 

  1. सामान्य नित्य एवं प्रत्ययों के अतीन्द्रिय जगत् में रहते हैं । 
  2. सामान्य विशेषों से पहले होते हैं । 
  3. सामान्य मूर्त विशेष हैं । 
  4. सामान्य देश एवं काल दोनों से परे हैं । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 1, 3 और 2 
  2. 1, 2 और 4 
  3. 2 और 3 
  4. 3 और 4 

28- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए सामान्यों के विषय में प्लेटो का मुख्य सरोकार निम्न सन्दर्भ में है । 

  1. व्यक्तियों की भौतिक एवं रासायनिक विशेषताएँ 
  2. नैतिक विशेषताएँ एवं गणित सम्बन्धी सत्ताएँ 
  3. कला एवं विज्ञान 
  4. राजनीति एवं कानून 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन सही हैं ? 
  1. 3 और 4 
  2. 1 और 4 
  3. केवल 3
  4. केवल 2  

29- सामान्य के विषय में प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में कौन-सा / से सही है / हैं ? 

  1. क्योंकि मेजों की तरह वस्तुएँ होती हैं, इसलिए इस प्रकार के सामान्य हैं; जैसे- मेजपन । 
  2. सभी मेजें, मेजें हैं, क्योंकि इसमें प्रत्येक में इसका अपना सामान्य होता है । 
  3. सभी मेजें 'मेजपन' के सामान्य का दृष्टान्त हैं । 
  4. सभी मेजें वास्तविक हैं, क्योंकि इस सभी में 'मेजपन' है । 
कूट 
  1. 1 और 2 
  2. 2 और 3 
  3. 3 और 4 
  4. केवल 3 

30- आकारों के विषय में निम्नलिखित कथनों में से कौन-से प्लेटो के दर्शन के अनुसार संगत हैं ? 

  1. आकार वास्तविक सत्ताएँ हैं 
  2. आकारों की विविधता है 
  3. आकार विशेषों से उत्कृष्ट है 
कूट 
  1. 1, 2 और 3 
  2. 1 और 2 
  3. 2 और 3
  4. 1 और 3

31- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए 

  1. सामान्य सत् तथा मूल्य के दृष्टिकोण विशेषों से श्रेष्ठतर होते हैं । 
  2. सामान्य सत् एवं विशेष मात्र आभास होते हैं ।
  3. विशेष उसी सीमा तक सत् होते हैं, जिस सीमा तक वे सामान्य में सहभागी होते हैं । 
  4. सामान्य तर्कतः परस्पर सम्बन्धित होते हैं तथा एक तारतम्य का निर्माण करते हैं । 
उपरोक्त कथनों में कौन-से कथन प्लेटो के अनुसार सही हैं ? 
  1. 1, 2 और 4 
  2. 2, 3 और 4 
  3. 1, 3 और 4 
  4. ये सभी 

32- नीचे दिए गए कथन एवं कारणों को ध्यानपूर्वक पढ़कर कूट की सहायता से सही उत्तर का चयन कीजिए 
कथन ( A ) प्लेटो के अनुसार परम शुभ का प्रत्यय निरपेक्ष सत् है । 
कारण ( R ) परम शुभ का प्रत्यय भौतिक जगत् की रचना करता है । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

33- कथन ( A ) प्लेटो के अनुसार सामान्य मानसिक है । 
कारण ( R ) सामान्य ईश्वर के मन में रहता है । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

34- प्लेटो के अनुसार विचार कीजिए -
कथन ( A ) प्रत्यय सामान्य और नित्य होते हैं । 
कारण ( R ) भौतिक पदार्थ के प्रत्ययों की अनुभूतियाँ हैं । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

35- कथन ( A ) प्लेटो के अनुसार सामान्य विशेषों के अस्तित्व के आधार हैं । 
कारण ( R ) विशेष सामान्य के ही अन्तर्गत प्राप्त विशेषताओं से युक्त होते हैं । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R सही है 

36- नीचे कथन ( A ) और कारण ( R ) दिए गए हैं । उन पर प्लेटो के आकार सिद्धान्त के आलोक में विचार करें और सही कूट का चयन करें -
कथन ( A ) चक्रीयता भौतिक जगत् में विद्यमान नहीं होती है । 
कारण ( R ) चक्रीयता आकार का एक उदाहरण नहीं होती है । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R यही है 

37- प्लेटो की तत्त्वमीमांसा के प्रकाश में निम्नलिखित कथनों पर विचार करें और सही कूट का चयन करें 

  1. सचमुच वास्तविक वे वस्तुएँ होती हैं, जिनका हम संवेदी अनुभव में सामना करते हैं । 
  2. सचमुच वास्तविक वे आकार होते हैं, जिन्हें केवल बौद्धिक रूप से ग्रहण किया जा सकता है । \
  3. आकार शाश्वत और परिवर्तनशील होते हैं । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. 1 और 3 
  3. केवल 2
  4. 2 और 3

38- प्लेटो के लिए कोई व्यक्ति हो सकता है 

  1. इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके सम्बन्ध में प्रत्यक्षण द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है 
  2. बिम्ब जिसके बारे में प्रत्यक्षण द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है 
  3. इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके बारे में तर्क द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है 
  4. इन्द्रियगोचर वस्तु जिसके बारे में कल्पना द्वारा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है

39- प्लेटो के अनुसार निम्नलिखित में से किसे 'सम्मति' के अन्तर्गत रखा जा सकता है ? 

  1. कुर्सी का विश्वास 
  2. कुर्सीपन 
  3. कुर्सी का कालापन 
  4. कुर्सी का सफेदीपन 

40- "यदि कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ नहीं है, तो ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं होगा, जिसके स्वरूप को चक्रीय कहा जाए ।" किसे मान्य है ? 

  1. सुकरात 
  2. प्लेटो 
  3. अरस्तू 
  4. सन्त ऑगस्टाइन 

41- प्लेटो की तत्त्वमीमांसा के आलोक में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट को चिह्नित कीजिए 

  1. जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते हैं, वे सत्यात्मक तथ्य नहीं हैं । 
  2. आकार को केवल बौद्धिक रूप से समझा जा सकता है । 
  3. आकार किसी के मन का प्रत्यय या सम्प्रत्यय है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. 1 और 2 
  3. 1 और 3 
  4. 1, 2 और 3 

42- नीचे दिए गए दो कथनों में से एक को कथन ( A ) और दूसरे को कारण ( R ) की संज्ञा दी गई है । कथन ( A ) और कारण ( R ) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए 
कथन ( A ) प्लेटो ने अपनी पुस्तक 'थीसिटस' में इस विचार को अस्वीकार किया कि ज्ञान विचार है । 
कारण ( R ) ज्ञान आस्था पर आधारित होना चाहिए, न कि बुद्धि पर 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है । 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R यही है 

43- नीचे दो कथन दिए गए हैं, इनमें से एक को कथन ( A ) और दूसरे को कारण ( R ) की संज्ञा दी गई है । प्लेटो की ज्ञानमीमांसा के परिप्रेक्ष्य में ( A ) और ( R ) पर विचार करते हुए सही कूट का चयन कीजिए -
कथन ( A ) संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है । 
कारण ( R ) संकल्पनात्मक ज्ञान अनुकूल आदर्श अथवा अमूर्त वस्तुओं की यथार्थता के लिए आवश्यक नहीं होता । 

कूट 
  1. A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है । 
  2. A और R दोनों सही हैं, परन्तु R, A की सही व्याख्या नहीं है । 
  3. A सही है, किन्तु R गलत है 
  4. A गलत है, किन्तु R यहीं हैं 

44- प्लेटो के ज्ञान के सिद्धान्त के सन्दर्भ में न्यूनतम से अधिकतम के सही क्रम का चयन करें 

  1. ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, काल्पनिक ज्ञान, विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि 
  2. काल्पनिक ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि 
  3. ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, काल्पनिक ज्ञान, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि, विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि 
  4. विमर्शात्मक प्रज्ञा बुद्धि, काल्पनिक ज्ञान, ज्ञानेन्द्रियों से उत्पन्न ज्ञान, तर्कबुद्धिपरक अन्तर्दृष्टि 

45- निम्नलिखित में से कौन-सी पुस्तकें प्लेटो द्वारा लिखी गई हैं ? 

  1. रिपब्लिक 
  2. लॉज 
  3. पॉलिटिक्स
  4. क्रीटो
कूट 
  1. 1 और 4 
  2. 2, 3 और 4 
  3. 2 और 4
  4. 1, 2 और 4 

46- प्लेटो के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा / से अभिकथन सही है / हैं ? 

  1. न्याय आत्मा का गुण है । 
  2. सामूहिकता की आत्मा को व्यक्ति को व्याप्त करना चाहिए । 
  3. नैतिकता शाश्वत परम्परा मात्र नहीं है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 3 
  4. ये सभी 

47- निम्नलिखित में से किस एक विचारक ने 'न्याय' को 'मुख्य सद्गुण' के रूप में स्वीकार किया है ? 

  1. साफिस्ट 
  2. अरिस्टिपस 
  3. बेन्थम 
  4. प्लेटो 

48- प्लेटो के अनुसार, विज्ञानों के अधिक्रम का सही क्रम बताइए -

  1. गणित, ज्यामिति, खगोल विज्ञान, संनाद-विश्लेषण और तर्कशास्त्र 
  2. तर्कशास्त्र, गणित, खगोल विज्ञान, संनाद-विश्लेषण और ज्यामिति 
  3. तर्कशास्त्र, खगोल विज्ञान, गणित, ज्यामिति और संनाद-विश्लेषण 
  4. गणित, खगोल विज्ञान, तर्कशास्त्र, ज्यामिति और संनाद-विश्लेषण
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Thursday, May 19, 2022

प्लेटो ( Plato ) का दर्शन

प्लेटो ( Plato ) का दर्शन 

प्लेटो ( Plato ) का दर्शन  

ज्ञान का सिद्धांत

        सर्वप्रथम, प्लेटो नकारात्मक रूप से तर्क करते हुए कहते हैं कि कुत्ते के लिए भी ज्ञान महज संवेदन नहीं हो सकता है । उनका मानना था कि जिसमें संवेदन होगा, उसमें ज्ञान भी होगा । उनके ज्ञान के सकारात्मक सिद्धांत को प्रसिद्ध दृष्टांत "एलीगरी ऑफ द केव" द रिपब्लिक बुक में दिया गया है । 

गुफा का दृष्टांत ( The Allegory of the Cave )

        प्लेटो अपनी प्रस्तुति ऐसे वृतान्त से शुरू करते हैं, जिसमें जिसे लोग वास्तविक समझते है, वह वास्तव में भ्रम होता है । उन्होंने ग्लॉकोन से कहा कि वह एक ऐसी गुफा की कल्पना करें जिसमें वे कैदी हो जिन्हें बचपन से ही बेड़ियों में जकड़कर स्थिर रखा गया हो । न सिर्फ उनके हाथों और पैरों को बांध कर रखा गया हो, बल्कि उनके सिर भी स्थिर हो और वे अपने सामने की दीवार को टकटकी बांधकर देखने के लिए विवश हो । कैदियों के पीछे आग हो और कैदियों और आग के बीच में एक ऊँचा गलियारा जिसमें अनेक जानवरों, पौधों और अन्य वस्तुओं के पुतले गतिशील हो । पुतलों की परछाई दीवार पर पड़े और कैदी इन परछाइयों को देखें । वे गलियारे में होने वाले शोर की गूंज को दीवारों से सुनें । ऐसे में यह सोचना उचित ही होगा कि कैदियों को वे परछाइयाँ वास्तविक वस्तुएँ और गूंज वास्तविक ध्वनियां लगेंगी । मान लीजिए कि उनमें से एक कैदी मुक्त हो जाता है और उन वस्तुओं को देखता है, जिनकी परछाई दीवार पर पड़ रही थी । तब वह उन्हें नहीं पहचान पाएगा और वह मानेगा कि दीवार पर पड़ने वाली परछाइयाँ अधिक वास्तविक हैं, जिन्हें उसने पहले देखा है । मान लीजिए अगर उन लोगों को अग्नि को देखने के लिए बाध्य किया जाए, तो वो कुछ देख नहीं पाएंगे और पुनः परछाइयों को देखने लगेंगे, क्योंकि उन्हें वो स्पष्ट रूप से देख सकते हैं और सत्य मानते हैं । मान लीजिए, कोई व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को बलात् खींचकर बाहर धूप में ले जाए तो वह व्यथित हो जाएगा और किसी भी वस्तु को नहीं देख पाएगा । धीरे-धीरे वह तारों आदि के प्रतिबिम्ब को अपने सामने रखे जल के कुंड में देख पाएगा । यद्यपि कुछ समय तक सतह पर रहने के बाद मुक्त कैदी अनुकूलित हो जाएगा । वह अपने आसपास की अधिक से अधिक चीजों को देख पाएगा । उसके बाद वह ऊपर सूर्य को देखेगा । वह समझ जाएगा कि सूर्य ही ऋतुओं और वर्षों के होने का स्रोत है और दृश्य जगत की सभी चीजों का संचालक है और किसी न किसी रूप में उन सभी चीजों का कारण है जो वह और उसके साथी देखते रहे हैं ।

दृष्टांत का अर्थ 

        गुफा का दृष्टांत ज्ञान के चार स्तरों का प्रतीक है, जिनके द्वारा मन प्रत्ययों को जानता है । प्रत्येक स्तर गुफा के अंदर और बाहर मनुष्य की विशेष अवस्था को प्रदर्शित करता है । 

  • बेड़ियों में मनुष्य : कल्पना की अवस्था 

         यह ज्ञान का पहला स्तर है । परछाइयाँ और प्रतिध्वनियाँ सिर्फ अन्य वस्तुओं का प्रतिबिंब है । इस स्थिति में व्यक्ति पूर्वाग्रहों, मनोभावों और कृत्रिमता की स्थिति में रहते हैं तथा परछाइयों के कारवां को ठीक से नहीं समझ पाते हैं । बेड़ियों में जकड़े और मुक्त होने की इच्छा न रखते हुए वे अपनी विरूपित दृष्टि को ही सही मानते हैं । 

  • गुफा में बेड़ियों से मुक्त व्यक्ति : विश्वास की अवस्था 

          बेड़ियों से मुक्त लेकिन गुफा में ही रहने वाला व्यक्ति ज्ञान के दूसरे स्तर विश्वास/मान्यता का प्रतीक है । जब कैदियों को अग्नि की ओर मोड़ा जाता है, जो सूर्य का दृश्य चित्र है और वे राह में आने वाली भौतिक वस्तुओं को देखते हैं, तो वे यह जान पाते हैं कि छायाएं महज स्वपनवत् हैं । 

  • गुफा से बाहर व्यक्ति : तर्क की अवस्था 

          जब कोई व्यक्ति गुफा से बाहर आता है तो उसका सामना ज्ञान के तीसरे स्तर तर्क से होता है । तर्क की वस्तुएं, जिनका प्रतीकन जल में सूर्य और तारों के प्रतिबिंब से होता है, प्राथमिक रूप से रेखागणित और अंक गणित की इकाइयाँ है । 

  • पूर्णतः मुक्त मानव : संज्ञान की अवस्था 

         जो व्यक्ति अपने मस्तिष्क को पूरी तरह से बदलती संवेदनाओं के बंधनों से मुक्त कर लेता है, वह विशेष बौद्धिक स्तर से ज्ञान के उच्चतम स्तर संज्ञान ( Noesis ) या समझ पर पहुँच जाता है । 

इस आधार पर प्लेटो ने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि ज्ञान और कुछ नहीं बल्कि जन्म से पूर्व उपस्थित ज्ञान को अनुस्मृत करना है । 

अनुस्मरण की प्रक्रिया

         इसमें हम चार मूल चरणों से गुजरते हैं और अंततः पूर्ण ज्ञान, पूर्ण अनुस्मरण पर पहुंचते हैं, जिसका स्पष्टीकरण प्लेटो ने रेखा की उपमा से विकसित किया था तथा जो स्पष्टीकरण रिपब्लिक में भी पाया जाता है । पहले वस्तुओं के बारे में हमारा ज्ञान अस्पष्ट, आभासी और धुंधला होता है । फिर हम धीरे-धीरे निम्नीकृत ज्ञान से अपनी कल्पना के द्वारा अधिक स्पष्ट, अधिक प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं का अनुभव करते हैं । यह विश्वास की दृढ़ मान्यता का स्तर है । अगला चरण वह है जिसमें हमारा तर्क का संकाय भाग लेता है और हम तर्क और तुलना करने लगते हैं । अंत में ज्ञान के उच्चतम स्तर, विशुद्ध बौद्धिक कार्यकलाप, का क्षेत्र आ जाता है, जहाँ हम विचारों और उनके अंतर संबंधों का चिंतन करने लगते हैं । 

प्रत्ययों का सिद्धांत

         इस प्रसिद्ध सिद्धांत की मूल प्रेरणा के पीछे प्लेटो का यह प्रेक्षण था कि अनेकों 'विशेष' ( वस्तुएं ) होते हैं, जो मूल प्रकृति में प्रत्ययों में समान रूप से भागीदारी करते हैं । इनमें विभिन्न जीव, मनुष्य, घोड़ें, पौधें, खनिज आदि सम्मिलित हैं । उन्हें काम कर रहे कारीगरों से भी इस मॉडल या प्रकार को अपनाने का विचार मिला कि प्रत्येक जीव की रचना एक आदर्श प्रकार या प्रारूप या मॉडल के अनुसार हुई है ( जिसे प्लेटो प्रत्यय कहते हैं ), जिसका उपयोग किसी विश्वकर्मा या सक्रिय आत्मा ने हमारे आसपास के जगत की रचना करने के लिए किया है । जहाँ बाद के चिंतकों ने इन 'प्रत्ययों' को महज अस्तित्व बताया, वहीं प्लेटो ने उन्हें वास्तव में किसी दूसरी ‘चमकते प्रकाश की रहस्यमयी दुनिया’ में तात्विक रूप में विद्यमान माना । उनका कहना था कि प्रत्येक आदर्श प्रत्यय प्रत्येक संदर्भ में आदर्श है अर्थात् वह पूर्ण है और हम अपने आसपास के जगत में जो देखते हैं, वो और कुछ नहीं बल्कि इनकी निर्बल नकल या छायाएं है । कुछ समय तक प्लेटो यह कहने में हिचकिचाते रहे कि धूल और कीचड़ जैसी जगत की प्रत्येक वस्तु का भी एक 'आदर्श प्रत्यय' मौजूद है । अंत में उन्होंने इस सिद्धांत की तार्किक माँगों को स्वीकार किया और यह माना कि इनका भी प्रत्यय के आदर्श जगत में स्थान है । 

प्रत्ययों की भागीदारी

          जब प्लेटो इस सिद्धांत की गहराई में गए तो उन्होंने स्वीकार किया कि प्रत्यय स्वयं में पूरी तरह से असंबद्ध और बिना किसी वस्तु से जुड़े नहीं रह सकते हैं । परिणाम स्वरूप उन्होंने माना कि प्रत्यय आपस में भागीदारी करते हैं ।  उदाहरण के लिए, कुत्ते का प्रत्यय स्तनधारी जीव के प्रत्यय में और गोरैया का प्रत्यय पक्षी के प्रत्यय में भागीदारी करेगा और अन्ततः ये दोनों फिर जंतु के प्रत्यय मे भी भागीदारी करेंगे । अंततः सभी प्रत्यय सर्वोच्च प्रत्यय यानि शुभ के प्रत्यय में भागीदारी करते हैं । अब चूंकि कलाकार प्रतियों की नकल करते हैं । अतः प्लेटो के आदर्श राज्य में उनका कोई तार्किक स्थान नहीं हो सकता ।

मानव-दर्शन

  • आत्माओं का पूर्व अस्तित्व 

          जन्म से पहले मनुष्यों की आत्मा आदर्श जगत में शुद्ध और पूर्ण प्रत्ययों का अनुचिन्तन करती है । कुछ रहस्यमय दोष ( पतन ) के कारण आत्माएं संसार में जन्म लेती हैं । शरीर में कैद हो जाती हैं और प्रत्ययों के चिंतन की बुलंदी तक पहुंचने से रोक दी जाती हैं । शुद्ध ज्ञान वह है जब मानव विस्मरण पर विजय प्राप्त कर लें और उन प्रत्ययों को अनुस्मृत कर लें, भले ही वे बहुत धुंधले हों जिनका उसने कभी अनु चिन्तन किया था । 

  • दो घोड़ें 

         प्लेटो ने मानव के अवचेतन में द्वंद्व को स्पष्ट रूप से देखा और फैड्स में उन्होंने इसकी ( मानव-आत्म की ) तुलना उस सारथी से की जो उन घोड़ों की लगाम कसके नियंत्रित करने के लिए संघर्ष करता है, जो दो अलग-अलग दिशाओं में रथ को खींचना चाहते हैं । मनुष्य में चरित्र एक बौद्धिकतत्व है, जो मनुष्य के आध्यात्मिक और सांसारिक घटक रूपी में दो घोड़ों के विरोधी खिंचाव के बीच सामंजस्य रखने के लिए संघर्ष करता है । आध्यात्मिक, घटक वास्तव में अच्छा घोड़ा है, यह विनम्र और तर्क को मानने वाला है और भलाई की दिशा में बढ़ता है । लेकिन सांसारिक घटक उम्र और निरंकुश है और उसे सिर्फ चाबुक से ही काबू में किया जा सकता है । 

  • मरणोपरांत जीवन 

          यदि शरीर आत्मा की कैद है तो मृत्यु उसकी हर्षपूर्ण मुक्ति का क्षण है । यह वह घड़ी है जब आत्मा अंततः शरीर से मुक्त हो जाती है । आत्मा की अमरता को इस तथ्य से उचित ठहराया जा सकता है कि शरीर के विपरीत यह अंगों में विभाजित नहीं होती है । रिपब्लिक के ‘मिथ ऑफ एर’ में प्लेटों ने अपने मर्णोपरान्त जीवन सम्बधी विज्ञान को प्रस्तुत किया है । वह आत्माओं के पारगमन में यकीन रखते थे । अंततः आत्मा एक चरम और अपरिवर्तनीय प्रतिफल में निवास करने लगती है और जहाँ अच्छाई ( अच्छी आत्मा ) एक प्रकार के स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है और बुराई ( बुरी आत्म ) पाताल यंत्रणा के लिए भेज दी जाती हैं । 

ईश्वर विचार

         विश्व उत्पन्न हुआ है । अतः इसका अवश्य ही कोई कारण होगा । परिणाम स्वरूप प्लेटो ने विश्वकर्मा ( Demiurge ) का तर्क दिया । विश्वकर्मा शाश्वत् प्रत्ययों के प्रतिमान के अनुरूप वस्तुओं को बनाता है । प्लेटो उच्चतम प्रत्यय, शुभ और सौंदर्य के प्रत्यय की बात करते हैं । परन्तु उन्होंने इस प्रत्यय को स्पष्ट रूप से ईश्वर नहीं कहा है । 

आचरण और राजनीति का दर्शन

         सुकरात से प्लेटो ने नीतिपरक जीवन के आधार का निर्धारण करने की विकट समस्या को विरासत में लिया । नैतिकता प्राकृतिक ( फिसिस ) है या फिर प्रथा ( nomos ) ? पुराने समय में इसे प्राकृतिक माना जाता था । इसकी उत्पत्ति ईश्वरीय मानी जाती थी, लेकिन फिर भी मानवीकृत देव इसे प्रदान नहीं कर सकते थे । सोफिस्टों के अनुसार नैतिक नियमों/कानूनों को मनुष्यों द्वारा बनाया गया था और संभवतः उन्हें उसी आसानी से बदला भी जा सकता था । धीरे-धीरे इन विचारों को गति मिल गई । इसके कारण सामाजिक विद्रोह की जो आंधी उठी उसने उन स्थिर नैतिक परंपराओं को क्षति पहुंचाई जिन पर नगर-राज्य का क्रमबद्ध विकास काफी हद तक निर्भर करता था । जब मानवीकृत देवों का प्रभाव कम हुआ तो नगर-राष्ट्र के पुनरुद्धार के लिए कुछ ऐसे नए अनुभवातीत सिद्धांतों की आवश्यकता महसूस हुई जो राजनीतिक ढाँचे की सुव्यवस्था तथा कानूनों की वैधता को आधार प्रदान कर सके ।

प्रेम की प्रकृति

         ‘द सिम्पोजियम’ में प्लेटो ने प्रेम की प्रकृति को बताया है । उन्होंने प्रश्न किया प्रेमी कौन है ? प्रेमी वह है जो चिर अस्थाई प्रसन्नता प्रदान करने वाली वस्तुओं से वंचित है । प्रेम करने वाले को प्रसन्नता शाश्वत शुभ और सुन्दरता की प्राप्ति से होती है ( प्यार इन्हीं शाश्वत मूल्यों की अनुपलब्धता और इन्हें प्राप्त करने की योग्यता से उत्पन्न होता है ) । यह इन मूल्यों को प्राप्त करने की लालसा से संचालित योग्यता या साधन सम्पन्नता ही प्रेमी को प्यार की सीढ़ी पर ऊपर पहुंचाती है । प्रेम के प्रत्येक चरण में प्रेमी सिर्फ आंशिक रूप से संतुष्ट होता है और इसलिए वह सशक्त रूप से यह खोजने के लिए प्रेरित होता है कि क्या इससे अधिक संतुष्टीदायक भी कुछ है । जगत् में रहने के कारण वह उस सौंदर्य से आरंभ करता है जो उसे जगत में दिखाई देता है । सुंदर लड़की या लड़का प्रेम में पड़ते हैं, लेकिन वे पाते हैं कि यह सौंदर्य विशिष्ट नहीं है । धीरे-धीरे प्रेमी अधिक सुंदर आत्मा, गुण, नियमों और संस्थाओं के सौंदर्य की ओर बढ़ता है और अंत में वह शुभ के विचार की ओर प्रस्थान करता है । इस पूरी प्रक्रिया में प्रेम ही वह तत्व है जो सौंदर्य के अवलोकन तक पहुँचने के लिए आवश्यक गति और संवेग प्रदान करता है । इस बाद वाले विचार की स्थापना सिम्पोजियम में की गई है । 

न्याय

         अपने दर्शन में प्लेटो न्याय के विचार को प्रमुख स्थान देते हैं । प्लेटो ऐथेन्स की मौजूदा विघटनकारी स्थिति से अत्यधिक असंतुष्ट थे । एथेन्स का प्रजातंत्र नष्ट होने की कगार पर था और अंततः सुकरात की मृत्यु के लिए जिम्मेदार था । आत्म-संतोष की नीति के संदर्भ में सोफिस्टों के शिक्षण के कारण अत्यधिक व्यक्तिवादी सोच विकसित हो गई थी । इस व्यक्तिवादी दृष्टि में नागरिकों को अपने स्वार्थी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए राष्ट्र की कार्यकारी ईकाइयों को अपने कब्जे में लेने के लिए प्रेरित किया । सोफिस्टों के अनुसार न्याय के नियम महज प्रथाऐं थी । उनके अनुसार आदर्श न्याय की कल्पना ऊँचे दर्जे की बेवकूफी थी । उचित एवं न्यायपूर्ण वही है जो स्वयं के लिए लाभदायक हो, अपने जीवन के लिए सबसे लाभदायक हो, अधिकांश व्यक्तियों का ऐसा ही मत प्रतीत होता था । यद्यपि, प्लेटो का यह मानना था कि न्याय का एक आदर्श है, जिसे हम सबको यथासंभव अपनाना चाहिए । उनके अनुसार सुकरात की भर्त्सना भले ही कानूनी तौर पर ठीक थी, लेकिन उचित नहीं थी । रिंग ऑफ गाइजीस ( Ring of Gyges ) के मिथक में, उस एक गड़रिया का वर्णन है, जो अधोलोक में पहुंच गया और उसे वहाँ शव पर एक अंगूठी मिली जिसका मुख उसकी तरफ होने पर वह अदृश्य हो जाता था और बाहर की ओर होने पर दृश्य हो जाता है । इस अंगूठी की सहायता से उसने राजा की पत्नी के साथ व्यभिचार किया । राजा को मार दिया और बाद में उसका राज्य हड़प लिया । गड़रिया उचित नहीं था, क्योंकि उसका अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं था । प्लेटो के अनुसार आदर्श समाज वह है जिसमें 'न्याय' का सर्वोच्च स्थान हो । प्लेटो के अनुसार न्याय की प्रकृति सुव्यवस्थित समाज का मौलिक सिद्धांत है । प्लेटो के अनुसार न्याय वह मानवीय गुण है, जो व्यक्ति को स्व-संयमित और अच्छा बनाता है । सामाजिक रूप से न्याय एक सामाजिक चेतना है, जो समाज को आंतरिक रूप से सौहार्दपूर्ण और अच्छा बनाती है । 

राष्ट्र

         प्लेटो के दार्शनिक मतों, विशेषरूप से आदर्श राष्ट्र या सरकार के संदर्भ में अनेक सामाजिक निहितार्थ थे । कुछ सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत रिपब्लिक के साथ-साथ लॉज और स्टेट्समेन में हैं । इनमें प्लेटो ने कहा है कि समाजों की त्रिभाजी वर्ग संरचना है, जो वैयक्तिक आत्मा की त्रिसंरचना यानि क्षुधा या लालसा, भावना, तर्क के संगत है । व्यक्ति अपने कौशलों और क्षमताओं में भिन्न होते हैं । उन्हें तीन वर्गों में समूहित किया जा सकता है – 

  1. कुछ श्रमिक, बढ़ई, किसान आदि होने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होते हैं । इनमें क्षुधा प्रभावी होती है । 
  2. अन्य जो रोमांच प्रिय, बलवान, साहसी और खतरों को पसंद करने वाले होते हैं, वे राष्ट्र का सुरक्षात्मक भाग बनाते हैं । इनमें भावना का भाग प्रभावी होता है । 
  3. कुछ जो बुद्धिमान, तर्कसंगत, स्व-नियंत्रित, बुद्धि से प्रेम करने वाले होते हैं, उनमें आत्मा का तार्किक भाग नियंत्रणकारी भाग होता है । 

          विभाजन का यह मॉडल ऐथेन्स के वर्तमान प्रजातंत्र के सिद्धांतों ( जैसे कि वे आज विद्यमान हैं ) के विपरीत है । क्योंकि इस विभाजन के अनुसार नगर-राज्य के सिर्फ कुछ ही नागरिक शासन करने के लिए अनुकूल सिद्ध होते हैं । प्लेटो का कहना था कि व्याख्यानशास्त्र और अनुनय की बजाय तर्क और बुद्धि का शासन होना चाहिए । प्लेटो के शब्दों में, "जब तक दार्शनिक राजा के रूप में शासन नहीं करेंगे अथवा वे लोग, जो आज राजा या प्रभावशाली व्यक्ति कहलाते हैं, ईमानदारी और निष्ठा से दार्शनिक सोच नहीं रखेंगे अर्थात जब तक राजनैतिक शक्ति और दर्शन पूरी तरह से एकरूप नहीं होंगे और अनेक राजा, जो वर्तमान में या तो शासक की दृष्टि से या फिर दार्शनिक की दृष्टि से शासन करते हैं, शासन करते रहेंगे और यदि किसी भी शासक को इन दोनों दृष्टियों के एकीकरण से बलात् रोका जाता रहेगा, तब तक नगरों को बुराइयों से छुटकारा नहीं मिलेगा और न ही मैं समझता हूँ कि मानव जातियों को छुटकारा मिलेगा।" 

प्लेटो की प्रजातंत्र की आलोचना

          प्रजातंत्र में शासकों को उनके गुणों के कारण नहीं, बल्कि उनके तरीके, आवाज, रंगरूप की सुंदरता आदि के लिए चुना जाता है । वे ऐसे रसोइयों की तरह होते हैं, जो दावा करते हैं कि रोगी के लिए श्रेष्ठ भोजन क्या है, जबकि इस प्रकार के किसी भी निर्धारण के लिए चिकित्सक का होना आवश्यक है, न की रसोइये का । यद्यपि विशेष रूप से प्रशिक्षित संभ्रांत वर्ग के हाथों में सर्वोच्च सत्ता केवल तभी सौंपनी चाहिए जब –

  1. मनुष्यों की बौद्धिक क्षमताओं में अपरिवर्तनीय अंतर हो 
  2. यदि इन अंतरों का पता जीवन के आरंभिक वर्षों में ही चल जाए 
  3. यदि उन्हें निश्चित एवं असंदिग्ध राजनैतिक सिद्धांतों को पूर्ण ज्ञान कराना सम्भव हो और 
  4. संभ्रांत जन, ये जानते हों कि सबके लिए क्या अच्छा है और उसी के अनुसार कार्य करें । 

चूँकि हम जानते हैं कि इसकी संभावना कम ही है, इसलिए प्लेटो की आदर्श राष्ट्र की अवधारणा सदैव एक आदर्शलोक की अवधारणा रहेगी, जिसके आदर्श सदैव संदिग्ध रहेंगे । 

कला का दर्शन

        कला के सिद्धांत का निर्धारण भी प्रत्यय-सिद्धांत ( Theory of Idea ) द्वारा होता है । कोई वस्तु उसी हद तक सुंदर होती है, जहाँ तक वह सौंदर्य के प्रत्यय में भागीदारी करती है । प्लेटो के अनुसार विश्व में सर्वत्र व्याप्त व्यवस्था सौंदर्य को प्रस्तुत करती है । जो कलाकार कृत्रिम जगत् ( प्रतिलिपि ) को महिमामंडित करता है वह उस रसोइए और व्याख्यान शास्त्री की तरह है जो मात्र अनभिज्ञ मनुष्यों की कल्पनाशक्ति को गुदगुदा कर अपर्याप्त कला प्रदान करता है । जिन कलाकृतियों को हम कलात्मक कार्य कहते हैं वे और कुछ नहीं बल्कि परछाइयों ( कृत्रिम भौतिक जगत् ) की परछाइयाँ मात्र हैं ।

प्लेटों के प्रमुख दार्शनिक विचार

  • सामान्य आदर्श ( प्रत्यय ) का अर्थ ऐसे सामान्यों से है जो स्वतंत्र रूप से विशेषों ( वस्तुओं ) से अलग अपनी निजी दुनिया में पाएं जाते । 
  • सामान्य वह है, जो ' विशेष ' ( वस्तु ) के समूह को निर्दिष्ट करता है ।
  • केवल सामान्य ही वास्तविक तत्त्व है । 
  • सामान्य मूर्त व्यष्टि है । 
  • यदि कोई वैयक्तिक चक्रक पदार्थ नहीं है, तो कोई भी पदार्थ नहीं होगा, जिसके स्वरूप को चक्रीय कहा जाए । 
  • चक्रियता भौतिक जगत् में विद्यमान नहीं होती है । 
  • सचनुच वास्तविक वे आकार होते है जिन्हें केवल बौद्धिक रूप से ग्रहण किया जा सकता है । 
  • जिन वस्तुओं का हम संवेदी अनुभव में सामना करते है, वे सत्यात्मक तथ्य नहीं है । 
  • आकार किसी के मन का प्रत्यय या संप्रत्यय है । 
  • संकल्पनात्मक ज्ञान ही विशुद्ध ज्ञान है । 
  • न्याय आत्मा का गुण है । 
  • नैतिकता शाश्वत परम्परा मात्र नहीं है । 
  • सामूहिकता की आत्मा को व्यक्ति को व्यक्त करना चाहिए । 
  • न्याय मुख्य सद्गुण है । 

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प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

प्लेटो ( Plato ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 428 ई० पू० से 347 ई० पू० तक 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "ज्ञान ही धर्म (सद्गुण) है और अज्ञान अधर्म"

प्रमुख उपाधि - पूर्ण ग्रीक ( The Complete Greek ) की उपाधि  

प्रमुख कथन

1- आदर्श (प्रत्यय) का अर्थ ऐसे समान्यों से है जो स्वतंत्र रूप से विशेषो (वस्तुओं) से अलग अपनी निजी दुनिया में पाए जाते है । 

2- सामान्य वह है जो विशेष (वस्तु) के समूह को निर्दिष्ट करता है । 


प्लेटो का जीवन

          पेलोपोनेसियन युद्ध ( 428/27 ई. पू. ) के चौथें या पांचवें वर्ष में प्लेटो का जन्म ऐथेन्स में हुआ था । वह जन्म से ही अभिजात्य थे । उन्हें पहले एरिस्टोकल्स कहा जाता था, लेकिन बाद में प्लेटो ( व्यापक ) नाम दे दिया गया था । यह ज्ञात नहीं है कि उन्हें यह नाम उनके चौड़े मस्तक, बलशाली शरीर या साहित्यिक अभिव्यक्ति के कारण दिया गया था या किसी अन्य कारण से । बीस वर्ष की आयु में में सुकरात के संपर्क में आए और यह उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ । सुकरात की मृत्यु के बाद वह मेगरा चले गए, जहाँ उन्होंने यूक्लीड के अंतर्गत ऐलियेटिक दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया । बाद में वह एथेन्स लौट आए जहाँ उन्होंने पहली पुस्तक लिखी । 390 ई. पू. से 388 ई. पू. के बीच, उन्होंने व्यापक रूप से यात्राएं करके विभिन्न प्रमुख विचारधाराओं के बारे में जाना और अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाया । सिरेक्यूस के डायनीसियास प्रथम के सभागार का दौरा करने के बाद उन्होंने उस तानाशाह की खुलकर भर्त्सना की और उसके लिए उन्हें दास के रूप में बेच दिया गया । सीरोन के एक अजनबी एनीसेरिस द्वारा ऐजिनियां के बाजार से छुड़ाए जाने के बाद वो एथेन्स लौट आए । लगभग 387 ई. पू. में उन्होंने एकेडेमस में एक प्रसिद्ध विद्यापीठ की स्थापना की ( तभी से एकेडमी नाम प्रचलित हुआ ) । जहाँ वह व्याख्यान और संवादों के जरिए विज्ञान और दर्शन पढ़ाते थे । 367 और 361 ई. पू. में प्लेटो 'आदर्श राज्य की अवधारणा’ को समझने के उद्देश्य से सिरेक्यूस चले गए, जिससे ऐकेडिमी के कार्य में बाधा आई । व्यवहारिक शासन कला जैसे आदर्श राज्य की स्थापना करने के असफल प्रयासों के बाद प्लेटो एथेन्स वापस आ गए और उन्होंने अपना सारा ध्यान एकेडमी में दर्शन शास्त्र के शिक्षण और लेखन पर केंद्रित कर दिया । उनकी मृत्यु 348 / 7 ई. पू. में 80/1 वर्ष की उम्र में हुई और उन्हें एकेडमी के मैदान में दफना दिया गया । लेकिन उनका दर्शन जीवित रहा । इसके आधार पर उनके अपने शिष्य अरस्तू ने ज्ञान की एक विद्या दर्शनशास्त्र की नीव रखी । वास्तव में ढीले शब्दों में कहे तो प्रत्येक वह व्यक्ति जो थोड़ा भी दर्शनशास्त्र के बारे में सोचता है वह या तो 'प्लेटोवादी' है या फिर 'अरस्तूवादी’ । एल्फ्रेड नोर्थ व्हाइटहैड ने ऐसे ही नहीं लिखा था कि "यूरोपीय दार्शनिक परंपरा का सबसे सुरक्षित सामान्य चरित्रीकरण यह है कि वह प्लेटो की टिप्पणियों की श्रृंखला मात्र है ।" 

प्लेटो के लेखन 

           टेबेरियस सम्राट के एक समकालीन थैरेसिलस के नाटक चतुष्टयों ( टेट्रालोजीस ) में व्यवस्थित प्लेटो के पारंपरिक सिद्धांतों में पैंतीस संवाद और तेरह पत्र हैं, जो एक एकल समूह के रूप में 36 पुस्तकों में हैं । इनमें से कुछ लेखनों की प्रामाणिकता विवादास्पद है । 

प्लेटो के विचारों का कालानुक्रमिक विकास 

आरंभिक सुकरात काल ( 399-388 / 7 ई. पू. )

       ये संवाद सुकरात के नैतिक-राजनैतिक सदगुणों की पड़ताल और नैतिक अवधारणाओं के उनके विश्लेषण की भावना और उद्देश्य को पुनः जाग्रत करते हैं । सामुहिक रूप से ये रचनाएं मुख्यतः सोफिस्ट विरोधी है तथा एक प्रकार से सुकरात की अनभिज्ञता को प्रदर्शित करती है । इनमें से अधिकांश लेख बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे एवं आगे और अधिक बौद्धिक विचार विमर्श की आवश्यकता पर जोर देते हुऐ समाप्त हो जाते हैं । 

  1. एपोलोजी - सुकरात पर अभियोग और बचाव 
  2. क्रिटिओ - सुकरात का अभियोग के विरूद्ध बचाव के लिए मना करना और सिद्धांतों पर अडिग रहना ।
  3. यूथीफ्रो - ईश्वरभक्ति और ईशनिन्दा की प्रकृति पर, जिसके लिए सुकरात पर अभियोग चलाया गया । 
  4. लाखेस - साहस पर । 
  5. आयन - कवियों और चारण गीतकारों के विरुद्ध । 
  6. प्रोटागोरस - सोफिस्टों का यह सिद्धांत कि कला ( orte ) को सिखाया जा सकता है बनाम सुकरात का सिद्धांत या पेइडिया कि सभी सद्गुण ईश्वरप्रदत हैं और सिखाए नहीं जा सकते हैं । 
  7. खारमीदिस - संयम और नियंत्रण पर 
  8. लाइसिस - मैत्री पर । 

संक्रामी काल ( 387-380 ई.पू. )

     प्लेटो ने अपनी विकसित बौद्धिक और साहित्यिक क्षमता से न केवल सोफिस्टों के विरूद्ध अपनी तार्किक परिचर्या को तीव्र किया, बल्कि तत्वमीमांसीय प्रत्यय सिद्धान्त की सुकराती अवधारणा को भी स्थापित किया । जहाँ पहले के संवाद सद्गुण के एक पक्ष तक सीमित थे, वहीं इस सृजनात्मक अवस्था के संवादों ने ज्ञान और अच्छे जीवन के बारे में अधिक महत्वपूर्ण प्रश्नों सम्बंधित विचारों को व्यापक और गहन बनाया । यह उनके सुव्यवस्थित दर्शनशास्त्र की शुरुआत थी । 

  1. गोर्गीअस - न्याय पर और नगर-राज्य में सोफिस्टों के शब्दाडम्बर और सत्ता की राजनीति के विरुद्ध | 
  2. मीनो - ऐनामनेसिस या अनुस्मरण सम्बंधित "सद्गुण-ज्ञान” के प्रश्न पर 
  3. एथीडीमस - प्रज्ञा पर जो प्रसन्नता लाती है और उत्तर सोफिस्टों की तार्किक भ्रांतियों के विरूद्ध । 
  4. लेसर हिप्पिआस - जानबूझकर अथवा अनजाने में गलतियाँ करने वालों के बीच तुलना । 
  5. ग्रेटर हिप्पिआस - सौंदर्य पर और भाषा सिद्धांत पर । 
  6. क्रेटीलस - भाषा पर और अपरिवर्तनीय तथा अबोधगम्य सत्ताओं और परिवर्तनीय तथा बोधगम्य तथ्यों के बीच अंतर पर । 
  7. मेनीजीनस - अंत्येष्टि प्रार्थनाओं में शब्दाडंबर पर विद्रूप ( पैरोडी ) 

परिपक्वता का काल ( 380-361 ई.पू. )

      अपने बौद्धिक विकास के चरम पर प्लेटो ने पूरी तरह से अपना निजी प्रत्ययों का सत्तामूलक सिद्धांत विकसित कर लिया और इस सिद्धांत की शाखाओं को ज्ञानमीमांसा, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, राजनीति और सौन्द्रयशास्त्र में अभिव्यक्त किया । अतः संवादों के तीसरे समूह में वे संवाद है जो या तो नए क्षेत्रों में चिंतनशील अंतर्दृष्टि डालते हैं । अथवा दूसरों के दृष्टिकोण से उत्पन्न तथ्यों और कठिनाइयों को बताते हैं । 

  1. सिम्पोज़ियम ( या बैंकेट ) - आत्मा की इरोस ( प्रेम ) जनित प्रेरणा पर उसका ( इरोस को ) आभासी से वास्तविक सौंदर्य तक का उत्थान 
  2. फीडो - प्रत्यय के सिद्धांत का अधिक स्पष्ट प्रकटन, अमरता और आत्मा की नियति सुकरात के अंतिम दिनों के सिद्धांतों के विरुद्ध परिचर्चाएं ।
  3. रिपब्लिक - आदर्श राज्य, शुभ की प्रधानता संज्ञान की चार श्रेणियाँ और आत्मा के त्रिभाजन पर । 
  4. फेड्स - दार्शनिक शब्दाडंबर, आत्मा, उसका पुनर्जन्म, पूर्व-अस्तित्व में प्रत्ययों की समझ, अनुस्मरण और प्रत्ययों के जगत की संरचना । 
  5. थिएटेट्स - ज्ञान का अपरिवर्तनीय विषयों से और अन्य बोधगम्य अनुभवों जैसे संवेदी-प्रत्यक्ष और सही मत से सम्बंध । 
  6. परमेनाइड्स - प्रत्यय के सिद्धांत का बचाव और गणितीय तथा मूल्याश्रित अवधारणाओं की प्रस्तुति एक और अनेक की समस्या । 
  7. सोफिस्ट - प्रत्ययों और परिवर्तन, जीवन, आत्मा, बौद्धिकता पर आलोचनात्मक दृष्टि और सोफिस्ट को परिभाषित करने की विश्लेषणात्मक खोज | 

वृद्धावस्था काल

      दार्शनिक परिपक्वता के बाद के काल में जब उनकी शारीरिक क्षमताएं कम हो गई और आलोचनात्मक बुद्धि कौशल बढ़ गया, तो प्लेटो अपने दर्शनशास्त्र को परिष्कृत करने के लिए नई समस्याओं और सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तनों पर विचार करने लगे । उत्कृष्ट बौद्धिक समझ के साथ उन्होंने आलोचनात्मक ढंग से अपने तर्क शास्त्र को विस्तारित किया और ब्रह्मांड के प्रश्नों में नई दिलचस्पी पैदा की । 

  1. स्टेट्समेन ( या पोलिटिकस ) - विभाजन की विधि से स्टेटसमेन की परिभाषा, वास्तविक शासक में ज्ञान का महत्व । 
  2. फिलेबस - अच्छाई के सुख की ठोस स्थितियों पर ध्यानाकर्षित करके प्लेटो के नीतिशास्त्र का विकास, एकता और अनेकता के और अधिक अध्ययन द्वारा विचारों के सिद्धांत का वर्धन । 
  3. टिमेअस - भौतिक जगत की उत्पत्ति और डेमोअर्स की भूमिका पर ब्रहमांडीय निबंध । 
  4. क्रिटिआस - आदर्श अवस्था से एटलांटिस तक साम्राज्यवादी समुद्र शक्ति सहित विरोधाभास । 
  5. लॉज - जीवन की मूर्त स्थितियों के अनुसार रिपब्लिक की आदर्श अवस्था में रूपान्तरण । 
  6. एपीनोमिस - कानूनों की सतत्ता, शासक के बुद्धिकौशल और ईश्वरीय-भक्ति पर । 
  7. लैटर्स VII और VIII - राजनीति और प्रत्ययों की प्रासंगिकता पर 

प्लेटो के समक्ष आई दार्शनिक समस्याएं 

       थेलस द्वारा उठाये गये प्रश्नों से लेकर प्लेटो के काल तक दार्शनिक चिंतन में अनेक समस्याएं आई, जैसे कि – 
  • एक और अनेक की समस्या 
  • अभास और सत् की समस्या 
  • स्थायित्व और परिवर्तन की समस्या 
  • पाइथागोरस के अनुयाइयों का रहस्यवाद और गणित
  • फिसिस और नोमोस 
  • सोफिस्टों का संशयवाद 
राजनैतिक रूप से भी निम्न परिवर्तन हुए, जैसे कि 
  • एथेन्स का पतन 
  • भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद 
  • प्रजातंत्र का आविर्भाव 
  • सुकरात की भर्त्सना 
       प्लेटो ने माना कि उनके पूर्ववर्तियों द्वारा अपनाऐ गये दार्शनिक मतों में कुछ सच्चाई हैं तथा उन सभी को सत् की प्रकृति का प्रमाणिक अंतर्ज्ञान ज्ञान था । 

स्थिति 

         प्लेटो को मनुष्य जगत और देवत्व की समस्याओं का सामना ग्रीक के नगर-राज्यों के नैतिक-राजनैतिक संदर्भ में करना पड़ा । प्लेटो ने अपनी उम्र के सत्तर के दशक के मध्य में मित्रों और डिओन के सहयोगियों को लिखे गये मेनीफेस्टो व्हेन आई वॉस यंग में लिखा है कि ' मेरे अनुभव अनेकों अन्य लोगों के अनुभवों के समान ही थे । मैंने सोचा था कि जैसे ही मैं स्वयं अपनी मर्जी का मालिक हो जाऊँगा, मैं सामाजिक जीवन में प्रवेश कर लूँगा । लेकिन हुआ यह कि राजनैतिक स्थिति में दुर्भाग्यपूर्ण परिवर्तन हो गये । प्लेटो और आगे अग्रलिखित वस्तु स्थितियों का वर्णन करना चाहते थे, टाइरेंट ऑफ थर्टी, प्रजातंत्रियों द्वारा सुकरात की अन्यायपूर्ण भर्त्सना, हमारे पूर्वजों के सिद्धांतों का परित्याग, कानून और रीतिरिवाजों में भ्रष्टाचार का बढ़ना, संक्षेप में मेरे ( उसके ) आसपास की विघटित हो रही प्रत्येक वस्तु एवं घटना । ऐथेन्स और अन्य नगरों के इस पूर्ण समेकित पतन से अचंभित "मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि वे सभी बुरे शासन की चपेट में हैं" । 

नीतिशास्त्र से तत्वमीमांसीय और गूढ़विज्ञानी समस्याओं की ओर संक्रमण 

             प्लेटो ने देखा कि राजनीति के मौलिक सिद्धांतों में कोई वास्तविक सुधार व्यक्ति की प्रकृति और स्वयं वास्तविकता के बारे में उसकी संकल्पनाओं में संगत सुधार के बिना नहीं हो सकता है । प्लेटों प्रायः सोचते रहते थे कि क्या वास्तव में, पूर्ण न्याय अथवा साहस का तात्विक अस्तित्व होता है अथवा सिर्फ व्यक्ति के न्यायपूर्ण और साहसी कार्यों का ही अस्तित्व होता है ? वास्तव में, अच्छा, सुंदर आदि क्या है ? सत् क्या है ? वह विश्व में गणितीय अनुपात और वास्तविक सामंजस्य द्वारा अत्यधिक प्रभावित थे ।

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Wednesday, May 18, 2022

सुकरात ( Socrates ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

सुकरात ( Socrates ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

सुकरात ( Socrates ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- सुकरात की दार्शनिक पद्धति का स्वरूप है ?

  1. प्रयोजनात्मक 
  2. निगमनात्मक 
  3. संदेहात्मक 
  4. ये सभी 

2- सुकरात ने अपनी दार्शनिक पद्धति के अन्तर्गत सन्देह का प्रयोग किया है ?

  1. केवल साधन के रूप में 
  2. केवल साध्य के रूप में 
  3. साध्य और साधन दोनों के रूप में 
  4. इनमें से कोई नहीं 

3- सुकरात ने अपने दार्शनिक विचारों की अभिव्यक्ति के लिए किस शैली का प्रयोग किया है ?

  1. विवरणात्मक 
  2. संवदात्मक 
  3. आलोचनात्मक 
  4. इनमें से कोई नहीं 

4- सुकरात ने संप्रत्ययों की रचना के लिए स्वीकार किया है ?

  1. वस्तुओं के सर्वगत लक्षणों को 
  2. वस्तुओं के विशिष्ठ लक्षणों को 
  3. 1 और 2 दोनों को 
  4. इनमें से कोई नहीं 

5- सुकरात ने अपनी दार्शनिक पद्धति में प्रयोग किया है ?

  1. निगमन को 
  2. आगमन को 
  3. 1 और 2 दोनों को 
  4. इनमें से कोई नहीं 

6- "ज्ञान सद्गुण है" यह प्रसिद्ध दार्शनिक उक्ति किसके द्वारा कही गई है ?

  1. प्लेटों के द्वारा 
  2. अरस्तू के द्वारा 
  3. हीगल के द्वारा 
  4. सुकरात के द्वारा 

7- सुकरात द्वारा स्वीकार्य नैतिक स्वरूप है ?

  1. सापेक्ष 
  2. निरपेक्ष 
  3. सार्वभौम 
  4. इनमें से कोई नहीं 

8- नीचे दिए गए कथनों को पढ़कर सही कूट का चयन कीजिए - 
कथन ( A ) सुकरात के अनुसार समस्त ज्ञान सम्प्रत्यात्मक होता है । 
कारण ( R ) ज्ञान बौद्धिक संप्रत्ययों से उत्पन्न होता है । 

कूट 

  1. A और R दोनों सही है तथा R,  A की सही व्याख्या है 
  2. A और R दोनों सही है तथा R,  A की सही व्याख्या नहीं है 
  3. A सही है और R गलत है
  4. A गलत है और R सही है 
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सुकरात ( Socrates ) का दर्शन

 

सुकरात ( Socrates ) का दर्शन 

सुकरात ( Socrates ) का दर्शन 

सुकरात की समस्या

        यद्यपि परम्परा और सत्ता के अंधानुकरण का विरोध सुकरात को प्रोटागोरस, गार्जियस और प्रोडिकस जैसे सोफिस्टों के साथ जोड़ देता है, फिर भी सुकरात का मुख्य लक्ष्य मानव के आन्तरिक तत्व को समझना था, जो सोफिस्टों में उतना महत्वपूर्ण नहीं था । सोफिस्टों के विपरीत सुकरात का ध्येय नैतिक नियमों की सार्वभौमिक वैधता के सत्य और ज्ञान का निरूपण करना था । सुकरात के अनुसार यह खोज वस्तुतः मनुष्य के वास्तविक स्वरूप को जानने की मुख्य समस्या से जुड़ी हुई है । डेल्फी के मंदिर पर खुदा हुआ सूत्र "मानव अपने आप को जानों", सुकरात के मन पर सर्वदा छाया रहता था । "मैं अभी तक अपने आप को नहीं जानता, जैसे कि डेलफि सूत्र में कहा गया है, अतः जब तक मुझे इस प्रकार का ज्ञान नहीं हो जाता है, मुझे बाहरी तथ्यों का अनुसंधान नहीं करना चाहिए । अतः इनके विषय में चिन्तित न होते हुए मैं इनके सम्बन्ध में प्रचलित विश्वासों को स्वीकार कर लेता हूँ तथा अपने अनुसंधानों की दिशा को स्वः की ओर मोड़ता हूँ" । यद्यपि, जहाँ तक ज्ञान की प्राप्ति का प्रश्न है, सोफिस्टों का यह आदर्श था कि “मानव सभी वस्तुओं का मानदण्ड है” । प्रोटागोरस और गार्जियस ने यह सिद्ध किया कि नैतिक नियमों के सार्वभौमिक स्वरूप की सत्यता का शुद्ध ज्ञान सम्भव नहीं है । परन्तु सुकरात सोफिस्टों के इस विचार से सहमत नहीं थे । सुकरात के अनुसार आत्मज्ञान में ज्ञान का विस्तृत विश्लेषण अन्तनिहित होता है । इस विश्लेषण से तीन बातें निकल कर सामने आती हैं –

  1. नैतिक सिद्धान्त की सार्वभौम वैधता
  2. राज्य के नियम
  3. धार्मिक श्रद्धा का स्वरूप 

         इन तीनों बिंदुओं पर सुकरात ने अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों विशेषतः सोफिस्टों के विचारों को स्वीकार नहीं किया । उनका आरोप था कि सोफिस्ट बुद्धि की अपेक्षा प्रत्यक्ष पर अत्यधिक बल देते थे । वे बुद्धि और प्रत्यक्ष में तथा बुद्धि और संवेदना में भेद नहीं करते थे । अतः उनका प्रमाण मीमांसीय दर्शन संदेहवाद और शून्यवाद में पर्यवासित होता है तथा उनके नैतिक और राजनैतिक विचारों का अन्त यदृच्छावाद में होता है । अतः सुकरात का उद्देश्य ज्ञान, नैतिकता, और राजनैतिक नियमों को सार्वभौम सिद्धान्तों पर प्रतिष्ठित करना था । ज्ञान की सार्वभौमिकता की संभावना तथा नैतिक और राजनैतिक विचारों की सार्वभौमिकता की संभावना के अन्वेषण से सुकरात इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सदगुण शुभ का प्रत्ययों के माध्यम से होने वाला ज्ञान है । अतः उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि “सद्गुण ही ज्ञान है” और ज्ञान ऐसे प्रत्ययों के द्वारा होता है जो तार्किक हैं, तब ज्ञान सार्वभौम हो जायेगा तथा नैतिक और राजनैतिक विचारों की भी सार्वभौमिकता संभव हो सकेगी ।

सुकरात की विधि

        सुकरात का मानना था कि ज्ञान तथा नैतिक एवं राजनैतिक नियमों की सार्वभौमिकता से जुड़े प्रश्नों के उत्तर का उचित आधार केवल व्यक्तिगत खोज और तार्किक बहस ही हो सकती है । यह व्यक्तिगत खोज और तार्किक वाद-विवाद उनके दर्शन में एक संवाद का रूप ले लेता है । ये संवाद केवल नैतिक विषयों तक ही सीमित थे । इसलिए इनमें न्याय, सद्गुण, ज्ञान, आत्मसंयम इत्यादि शामिल थे । इन संवादों का प्रधान उद्देश्य था, स्वयं को जानना । उसने इसे इलेन्चस की विधि कहा । यह कसौटी पर कसने या निरस्तिकरण के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द था । इस संवाद में उन लोगों से कुशलतापूर्वक प्रश्न करना सम्मिलित था, जो स्वयं को बुद्धिमान कहते थे । परिणामस्वरूप सद्गुण, न्याय आदि के विषय में उनके विचारों को आगे लाया जाता था । इस संवाद का उद्देश्य इस तथ्य से पर्दा उठाना था कि जो अपने को कुछ जानने का दावा करते हैं, वे वास्तव में कुछ भी नहीं जानते तथा उनके विचार या दृष्टिकोण अपर्याप्त है । इस प्रकार सुकरात को यह विश्वास था कि वह इस विधि द्वारा यह दिखा सकता है कि वह दूसरों से अधिक बुद्धिमान है, क्योंकि वह जानता है कि वह नहीं जानता । सुकरात की इस विधि के दो विशिष्ट आयाम है । प्रथम, कार्य प्रणाली को लेकर यह द्वन्द्वात्मक है और दूसरे उद्देश्य को लेकर यह धाय विधि है।

द्वन्द्वात्मक विधि ( Dialectic Method )

         कुशलतापूर्वक प्रश्नोत्तर द्वारा वाद-विवाद की कला ही द्वन्द्वात्मक विधि है, जिसका उद्देश्य कम से कम सम्भव शब्दों में सारभिंत एवं सटीक उत्तर तक पहुंचाना होता है । इस विधि का प्रथम चरण प्रायः विषय सम्बंधि सर्वमान्य कथनों से प्रारम्भ होता है । यह सर्वमान्य कथन परिकल्पना पक्ष ( Thesis ) कहा जाता है । द्वितीय चरण में द्वन्द्वात्मक विधि परिकल्पना के विरूद्ध और इसके संभावित निरस्तिकरण की ओर अग्रसर होती है, जिसे प्रतिपक्ष कहते हैं । एक परिकल्पना के निराकरण से अपेक्षाकृत क्रम अर्न्तविरोधों वाली दूसरी परिकल्पना तक पहुंचा जा सकता है । अब इसे संपक्ष ( Synthesis ) कहा जाता है । इस प्रकार, द्वन्द्वात्मक पद्धति की सहायता से अन्वेषक कम से कम अर्न्तविरोधों वाली नई परिकल्पनाओं की ओर बढ़ता है । तथापि सुकरात स्वयं नीतिशास्त्र और जीवन के आचरण के विषय में उठाए गए प्रश्नों का पूरी तरह सही उत्तर नहीं पा सके, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि द्वन्द्वात्मक विधि एक विफल विधि थी । वास्तव में सुकरात के लिए उनकी विधि पूर्णज्ञान तक पहुँचने के लिए दार्शनिकों के प्रबल प्रेम के जैसी थी, क्योंकि सुकरात के अनुसार पूर्णज्ञान निरन्तर खोज में निहित है, उसे पकड़ने या वहाँ तक पहुँचने में नहीं । इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि द्वन्द्वात्मक विधि का उद्देश्य यह दिखाना था कि सुकरात के लिए दर्शन प्रज्ञा की खोज है, न कि पूर्ण ज्ञान तक पहुँचना ।

धाय विधि ( Midwifery Method )

         यद्यपि सुकरात ने द्वन्द्वात्मक विधि का अनुसरण और उसका समर्थन किया, फिर भी उन्होंने अपनी विधि को धाय-विधि के नाम से पुकारा । यद्यपि यह तथ्य उनकी माँ की ओर संकेत करता है, जो एक धाय का कार्य करती थी । इस धाय-विधि का अर्थ उनके लिए दूसरों के मस्तिष्क में शुद्ध विचार उत्पन्न करना था, जिससे कि वे सब सही कार्य कर सकें । वास्तव में, वे वैचारिक नहीं वरन व्यावहारिक उद्देश्य के लिए परिभाषा के स्पष्ट रूप में सच्चे विचारों को जन्म देना चाहते थे ।

ज्ञानमीमांसा

         सुकरात पूर्ववर्ती दर्शन की सभी शाखाओं के साथ-साथ उनकी ज्ञान मीमांसीय शाखा से विशेष रूप से असन्तुष्ट थे । उनके अनुसार ज्ञान की पूर्ववर्ती धारणाएं रूढीवादी, सापेक्षिक एवं पूर्व मान्यताओं पर आधारित थी । सुकरात ने इसका विरोध करते हुए पूर्ववर्ती ज्ञान योजनाओं के खोखलेपन को उजागर किया । सुकरात की समस्या सार्वभौम वैध ज्ञान प्राप्त करने से सम्बन्धित थी । साथ ही उनकी दार्शनिक खोज मूलतः नैतिक प्रकृति की थी । जिसका लक्ष्य स्वयं की खोज था । इसलिए काई भी इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुँच सकता है कि सुकरात का ज्ञान से तात्पर्य न्याय, सद्गुण, और चिरन्तन या धार्मिक विचारों के ज्ञान से था । सुकरात का विश्वास था कि न्याय, सदगुण व चिरन्तन विचारक का वास्तविक ज्ञान पहले से ही मनुष्य में निहित रहता है । यह ज्ञान प्रसुप्त होता है, जिसे कौशलपूर्ण प्रश्नों से पुनः स्मृत किया जा सकता है । यह ज्ञान किस प्रकार मनुष्य में उपस्थित रहता है ? इस प्रश्न ने सुकरात को आत्मा के अमरत्व में विश्वास के लिए प्रेरित किया, क्योंकि उसे प्रतीत हुआ कि आत्मा की अमरता से ही मानव न्याय, सद्गुण एवं चिरन्तन विचारों के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकत है । चूंकि आत्मा अमर है, इसलिए इहलोक और परलोक की सभी वस्तुओं को इसने देखा है और सब कुछ इसके द्वारा जाना हुआ है । इसलिए हमें सदगुण या किसी अन्य वस्तु की पुनर्रस्मृति के बारे में आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ज्ञान हम अपने में पहले से उपस्थित देखते हैं । लेकिन कैसे हम अपने में पहले से उपस्थित ज्ञान के प्रति जागरूक बनें ? यहां हमें सुकरात की ज्ञानमीमांसा के सूत्र मिलते हैं । अरस्तू ने मेटाफिजिक्स में स्पष्ट कहा है कि दो चीजें हमें सुकरात से मिली हुई है - "आमनात्मक तर्क और सार्वभौम परिभाषा" । अतः सुकरात के अनुसार आगमनात्मक तर्क और सार्वभौम परिभाषा के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती है । इस प्रकार सुकरात के अनुसार सार्वभौमिक परिभाषा और आगमनात्मक तर्कणा दोनों ही ज्ञान के पुनर्बांध के साधन हैं, जबकि यह ज्ञान सभी मनुष्यों में प्रसुप्त अवस्था में पाया जाता है ।

परिभाषा

         सुकरात की विधि संवाद की विधि हैं, जिसमें सही उत्तर पाने के लिए प्रश्नों को पूछा जाता है । जब सुकरात कोई प्रश्न पूछते हैं, तो वह केवल यह नहीं पुछते कि कोई चीज क्या है ? जैसे कि न्याय क्या है, बल्कि वह यहां पर न्याय की परिभाषा पूछ रहे होते हैं । किसी चीज को परिभाषित करना उसके सार-तत्व को बताना होता है । इस प्रकार परिभाषा का ज्ञान तत्व के ज्ञान की ओर ले जाता है । इस प्रकार ज्ञान के प्रति यह एक नया दृष्टिकोण था । इस प्रकार का प्रयास पूर्ववर्ती विचारकों जैसे सोफिस्टों में नहीं दिखाई पड़ता यद्यपि इलियाई दर्शन का यह मुख्य विषय था । इस तथ्य से सुकरात की चिन्तन प्रक्रिया की उर्वरता प्रकट होती है, जिसके कारण वह सत्य के अन्वेषण की ओर मुड सकें । सुकरात ने उस सत् को अपना लक्ष्य बनाया, जिसे सोफिस्टों ने महत्व नहीं दिया था । अतः यह कहा जाता है कि सुकरात के दर्शन में तत्व को यथार्थ रूप में जानने का प्रयास दिखाई पड़ता है ।

आगमन

        सुकरात के लिए आगमन का वह अर्थ नहीं था जैसा कि बाद में आने वाले तर्कशास्त्रियों जैसे- फ्रांसिस बेकन और जॉन स्टुअर्ट मिल समझते थे । सोफिस्टों के विपरीत सुकरात ज्ञान के स्रोत के रूप में केवल प्रत्यक्ष पर निर्भर नहीं करते, क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान सापेक्षता को जन्म दे सकता है । सुकरात के अन्वेषण का लक्ष्य निरपेक्ष ज्ञान है न कि कोई सापेक्ष ज्ञान । चूंकि सुकरात के लिए ज्ञान संप्रत्ययों पर आधारित है । उसने प्रत्यक्ष और संप्रत्यक्ष में तीक्षण अंतर बताया है । संप्रत्यय से तात्पर्य किसी वर्ग के सामान्य प्रत्यय से है । उदाहरण के लिए, गाय के वर्ग के लिए गायपन । लेकिन विशेष तौर से केवल विशिष्ट वस्तुओं ( गायों ) की संख्या का निरीक्षण गायपन के संप्रत्यय को उत्पन्न नहीं कर सकता । तब हम संप्रत्यय का निर्माण कैसे करते हैं ? संप्रत्यय का निर्माण सामान्य के पुनःस्मरण या अन्तःप्रज्ञा द्वारा होता है । यह अन्तः प्रज्ञा अचानक घटित होती है । प्लेटो के फीडो में सुकरात यह सुझाव देते हुए प्रतीत होते हैं कि यह पुनर्स्करण किसी रहस्यवादी के अन्तर्ज्ञान जैसा है । सुकरात वास्तव में एक रहस्यवादी थे और उनके अनुसार ज्ञान सामान्यों के रहस्यात्मक अन्तर्ज्ञान में पाया जाता है । यद्यपि इसमें प्रत्यक्ष उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है । लेकिन सुकरात ने सामान्य प्रत्ययों के ज्ञान में इन्द्रियों को बाधास्वरूप ही बताया । सुकरांत कहते हैं कि "स्पष्टतः तत्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आत्मा तभी निश्चय पूर्वक समर्थ हो सकती है, जब वह दृष्टि और श्रवण के व्यवधान से मुक्त हो, यह किसी प्रकार के सुख-दुःख से विचलित न हो, जब यह शरीर की उपेक्षा कर दे तथा सारे संपर्कों और सहचयों से स्वयं को मुक्त कर ले” । सुकरात ने यहाँ तक माना कि शरीर से मुक्त होने के बाद ही सत्यान्वेषी को सत्य का पूर्ण और भ्रमरहित साक्षात्कार होता है । इस जीवन में भी यदि कोई शारीरिक तप पूर्वक जीवन बिताता है तो उसे सत्यज्ञान की प्राप्ति हो सकती है । अतः इस प्रकार सुकरात ने सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए सन्यासयुक्त आचरण पर बल दिया । जिससे व्यक्ति नैतिक, धार्मिक और राजनैतिक नियमों के अनुकूल जीवन व्यतीत करने के लिए सक्षम हो जाता है ।

सुकरातीय नीतिशास्त्र

         सुकरात का नीतिशास्त्र प्रधानतः मानव केन्द्रित है । यद्यपि यह दृष्टि ग्रीक दार्शनिक परम्परा में नई नहीं थी, फिर भी सुकरात ने मनुष्य पर एक भिन्न दृष्टिकोण से विचार किया है । उनके नीतिशास्त्र का केन्द्र सदगुण की अवधारणा है । सद्गुण सुकरात के अनुसार एक गहनतम एवं सर्वाधिक मूलभूत प्रवृत्ति है । यह सद्गुण ज्ञान है । "... यदि कोई भी शुभ वस्तु ज्ञान से असंबंधित और भिन्न है, तब सद्गुण अनिवार्यतः ज्ञान का प्रकार नहीं हो सकता । दूसरी दृष्टि से, यदि ज्ञान शुभ को पूर्णतः धारण करता है, तब हम पूरी तरह से कह सकते हैं कि सद्गुण ज्ञान है ।" यदि सद्गुण ज्ञान हैं तो इसे जाना जा सकता है और इसकी हम शिक्षा दे सकते हैं । यही "अपने आप को जानों” - इस प्रबोध वाक्य का अर्थ है । अपने आप को जानों का अर्थ है कि ( हम ) आन्तरिक आत्मा को प्रकाशित करें । ज्ञान के द्वारा मानव आत्म-नियन्त्रण कर स्वयं का स्वामी बन जाता है ।

सद्गुण ही ज्ञान है

        सुकरात के अनुसार सदगुण मानव जीवन में प्राप्त किया जाने वाला सर्वोत्तम शुभ और सर्वोच्च लक्ष्य है । उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि यह परम लक्ष्य है और परम शुभ है, तो इसमें सार्वभौम संगति होगी तथा यह सभी के लिए एक जैसा होगा सुकरात का यह मानना है कि स्वास्थ्य, धन, सुन्दरता, साहस और संयम, जो शुभ के विभिन्न रूप माने जाते हैं, वस्तुतः शुभ तभी हैं जब ये विवेकसम्मत होते हैं । मूढ़ता के साथ जुड़कर ये अशुभ के रूप हो जाते हैं । संप्रत्यय बुद्धि के द्वारा प्रदत्त होते हैं न कि किसी विशेष तथ्य के प्रत्यक्ष से अब चूंकि संप्रत्यय मानव मन में पहले से ही विद्यमान है, इसलिए उन्हें जाग्रत करने के लिए प्रश्न - विधि उपयोगी है । यदि नैतिकता शुभ के प्रत्यय का संप्रत्ययों के द्वारा ज्ञान है, तब इसे कौन प्राप्त कर सकता है ? सुकरात यह मानते थे कि सोफिस्टों को इसकी प्राप्ति इसलिए नहीं हुई, क्योंकि वे बुद्धि की अपेक्षा प्रत्यक्ष पर आश्रित थे । सुकरात का विश्वास था कि सत्य एवं शुभ को वही प्राप्त कर सकता है, जो बुद्धि से संचालित होता है, प्रत्यक्ष से नहीं । जो बुद्धि से संचालित होता है अपने मन में पहले से ही उपस्थित वह शुभ के प्रत्यय का पुर्नस्मरण करता है । अपनी ज्ञानमीमांसा के अनुरूप ही वे यह भी मानते हैं कि शुभ का यथार्थ संप्रत्यय शुभ के प्रत्यय पर चिन्तनशील पुर्नस्मरण द्वारा प्राप्त होता है ।

सद्गुण एक है

        सुकरात के अनुसार नीतिशास्त्र का एक अन्य आयाम और भी है । यहाँ हम केवल शुभ के प्रत्यय के ज्ञानमात्र से ही संतुष्ट नहीं होते । वास्तव में शुभ के प्रत्यय का ज्ञान अन्य प्रत्ययों को नियन्त्रित करने का कार्य करता है तथा इच्छा और भावना सहित संपूर्ण मानव का पथ-प्रदर्शन करता है तथा शुभ कार्यों के लिए उसे प्रेरित करता है । अतः नैतिक ज्ञान आत्मा को सुसंस्कृत और सुशिक्षित करता है तथा उसको अपनी विशुद्ध महिमा में स्थापित कर देता है । इसलिए सुकरात उद्घोषित करते हैं कि "कोई भी ज्ञानपूर्वक दुष्कृत्य नहीं कर सकता" तथा "ज्ञान ही सद्गुण है ।" सुकरात कहते हैं कि सद्गुण या शुभत्व एक है, यद्यपि हम उसे विभिन्न प्रकार से आचरण में लाते हैं । प्लेटो की कृति प्रोटागोरस में सुकरात कहते हैं कि सद्गुण के प्रज्ञा, संयम, साहस, न्याय तथा पवित्रता आदि अनेक मुख्य प्रकार हैं, लेकिन उन सब में एक ही तत्व व्याप्त है । इसी प्रकार प्लेटो की कृति मेनो में सुकरात एक ऐसे सद्गुण का अन्वेषण करना चाहते हैं, जो सब सद्गुणों में व्याप्त रहता है । सुकरात इसे एक स्वस्थ शरीर के उदाहरण से समझाते हैं । उनके अनुसार एक स्वस्थ शरीर जिस प्रकार तमाम शारीरिक कौशलों के लिए उत्तरदायी होता है, उसी प्रकार आत्मा की स्वस्थता से सभी प्रकार के सद्गुणों का संकेत मिलता है । आत्मा के स्वास्थ्य का क्या अर्थ है ? आत्मा की अनेक क्रियायें हैं । इन क्रियाओं का सुव्यवस्थित संयोजन ही आत्मा की स्वस्थता है । प्लेटो की कृति गार्जियस में हम सुकरात को यह कहते हुए पाते हैं कि आत्मा की मुख्य क्रियायें, तार्किकता, संयम और इच्छा हैं । तार्किकता प्रज्ञा की ओर अग्रसर करती है, संयम साहस ओर तरफ तथा इच्छा सौम्यता की ओर । आत्मा का स्वास्थ्य इन सभी क्रियाओं के संगतिपूर्ण संयोजन पर निर्भर रहता है । इन क्रियाओं का संयोजन इस प्रकार है, प्रज्ञा आदेश देती है तथा संयम इसके अनुपालन में सहायक होता है, जबकि इच्छा इन आदेशों के क्रियान्वयन के लिए भौतिक आधार का काम करती है । सद्गुण की एकता का लक्ष्य व्यक्ति को आत्याधिक प्रसन्नता प्रदान करता है । "विवेक के नियन्त्रण में सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों का सफल क्रियान्वयन प्रसन्नता को जन्म देता है ।" इस प्रकार सद्गुण की एकता की सुकरातीय अवधारणा का अर्थ है कि "एक अच्छे मनुष्य की आत्मा उसकी समस्त क्रियाओं की सावयविक एकता को प्रदर्शित करती है ।" सुकरात के इस विचार से कि 'सद्गुण एक है” यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य के सभी स्वाभाविक नैतिक कर्मों में शुभत्व का एक अकेला प्रत्यय व्याप्त है । प्लेटो की कृति रिपब्लिक में सुकरात इसे इस प्रकार कहते हैं, “ज्ञान के क्षेत्र में कठिनाई से जानी जाने वाली अन्तिम जानने योग्य वस्तु शुभ का प्रत्यय है और जब यह जान ली जाती है, तब निशचिन्त रूप से यह निकर्ष निकलता है कि यही सर्वसुन्दर और सदा उचित वस्तुओं का कारण है” । शुभ ही दृश्य जगत में प्रकाश को जन्म देता है । प्रकाश का जनक होने के कारण यह बौद्धिक में सत्य और बुद्धि का प्रामाणिक स्रोत है तथा प्रत्येक वह व्यक्ति जो वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में बुद्धिमत्ता पूर्ण आचरण करना चाहता है उसे इससे अवश्य ही परिचित होना चाहिए ।

 सुकरात ( Socrates ) के प्रमुख दार्शनिक विचार 

  • स्वयं को जानो 
  • ज्ञान सद्गुण है । 
  • ज्ञान संप्रत्यात्मक होता है । 
  • अज्ञान सबसे बड़ा पाप है ।
  • शरीर आत्मा का बंधन है । 
  • मैं केवल एक बात जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता । 
  • भले आदमी के लिए परलोक में कोई भय नहीं । 
  • परलोक मैं भी आनन्द है । 
  • आत्मा अमर और दिव्यलोक की निवासी है ।  
  • विवेक के नियन्त्रण में सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों का सफल क्रियान्वयन प्रसन्नता को जन्म देता है ।
  • एक अच्छे मनुष्य की आत्मा उसकी समस्त क्रियाओं की सावयविक एकता को प्रदर्शित करती है ।
  • वह वक्त आ गया है कि मैं मरने वाला हूँ और आप जीवित रहेंगे, मगर किसकी नियति में ज्यादा खुशी लिखी है, वह ईश्वर को छोड़ कोई नहीं जानता । 

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अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  तर्क शास्त्र           अरस्तू तर्क शास्त्र के क्षेत्र के वास्तविक अन्वेषक थे ।...