Wednesday, May 18, 2022

सुकरात ( Socrates ) का दर्शन

 

सुकरात ( Socrates ) का दर्शन 

सुकरात ( Socrates ) का दर्शन 

सुकरात की समस्या

        यद्यपि परम्परा और सत्ता के अंधानुकरण का विरोध सुकरात को प्रोटागोरस, गार्जियस और प्रोडिकस जैसे सोफिस्टों के साथ जोड़ देता है, फिर भी सुकरात का मुख्य लक्ष्य मानव के आन्तरिक तत्व को समझना था, जो सोफिस्टों में उतना महत्वपूर्ण नहीं था । सोफिस्टों के विपरीत सुकरात का ध्येय नैतिक नियमों की सार्वभौमिक वैधता के सत्य और ज्ञान का निरूपण करना था । सुकरात के अनुसार यह खोज वस्तुतः मनुष्य के वास्तविक स्वरूप को जानने की मुख्य समस्या से जुड़ी हुई है । डेल्फी के मंदिर पर खुदा हुआ सूत्र "मानव अपने आप को जानों", सुकरात के मन पर सर्वदा छाया रहता था । "मैं अभी तक अपने आप को नहीं जानता, जैसे कि डेलफि सूत्र में कहा गया है, अतः जब तक मुझे इस प्रकार का ज्ञान नहीं हो जाता है, मुझे बाहरी तथ्यों का अनुसंधान नहीं करना चाहिए । अतः इनके विषय में चिन्तित न होते हुए मैं इनके सम्बन्ध में प्रचलित विश्वासों को स्वीकार कर लेता हूँ तथा अपने अनुसंधानों की दिशा को स्वः की ओर मोड़ता हूँ" । यद्यपि, जहाँ तक ज्ञान की प्राप्ति का प्रश्न है, सोफिस्टों का यह आदर्श था कि “मानव सभी वस्तुओं का मानदण्ड है” । प्रोटागोरस और गार्जियस ने यह सिद्ध किया कि नैतिक नियमों के सार्वभौमिक स्वरूप की सत्यता का शुद्ध ज्ञान सम्भव नहीं है । परन्तु सुकरात सोफिस्टों के इस विचार से सहमत नहीं थे । सुकरात के अनुसार आत्मज्ञान में ज्ञान का विस्तृत विश्लेषण अन्तनिहित होता है । इस विश्लेषण से तीन बातें निकल कर सामने आती हैं –

  1. नैतिक सिद्धान्त की सार्वभौम वैधता
  2. राज्य के नियम
  3. धार्मिक श्रद्धा का स्वरूप 

         इन तीनों बिंदुओं पर सुकरात ने अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों विशेषतः सोफिस्टों के विचारों को स्वीकार नहीं किया । उनका आरोप था कि सोफिस्ट बुद्धि की अपेक्षा प्रत्यक्ष पर अत्यधिक बल देते थे । वे बुद्धि और प्रत्यक्ष में तथा बुद्धि और संवेदना में भेद नहीं करते थे । अतः उनका प्रमाण मीमांसीय दर्शन संदेहवाद और शून्यवाद में पर्यवासित होता है तथा उनके नैतिक और राजनैतिक विचारों का अन्त यदृच्छावाद में होता है । अतः सुकरात का उद्देश्य ज्ञान, नैतिकता, और राजनैतिक नियमों को सार्वभौम सिद्धान्तों पर प्रतिष्ठित करना था । ज्ञान की सार्वभौमिकता की संभावना तथा नैतिक और राजनैतिक विचारों की सार्वभौमिकता की संभावना के अन्वेषण से सुकरात इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि सदगुण शुभ का प्रत्ययों के माध्यम से होने वाला ज्ञान है । अतः उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि “सद्गुण ही ज्ञान है” और ज्ञान ऐसे प्रत्ययों के द्वारा होता है जो तार्किक हैं, तब ज्ञान सार्वभौम हो जायेगा तथा नैतिक और राजनैतिक विचारों की भी सार्वभौमिकता संभव हो सकेगी ।

सुकरात की विधि

        सुकरात का मानना था कि ज्ञान तथा नैतिक एवं राजनैतिक नियमों की सार्वभौमिकता से जुड़े प्रश्नों के उत्तर का उचित आधार केवल व्यक्तिगत खोज और तार्किक बहस ही हो सकती है । यह व्यक्तिगत खोज और तार्किक वाद-विवाद उनके दर्शन में एक संवाद का रूप ले लेता है । ये संवाद केवल नैतिक विषयों तक ही सीमित थे । इसलिए इनमें न्याय, सद्गुण, ज्ञान, आत्मसंयम इत्यादि शामिल थे । इन संवादों का प्रधान उद्देश्य था, स्वयं को जानना । उसने इसे इलेन्चस की विधि कहा । यह कसौटी पर कसने या निरस्तिकरण के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द था । इस संवाद में उन लोगों से कुशलतापूर्वक प्रश्न करना सम्मिलित था, जो स्वयं को बुद्धिमान कहते थे । परिणामस्वरूप सद्गुण, न्याय आदि के विषय में उनके विचारों को आगे लाया जाता था । इस संवाद का उद्देश्य इस तथ्य से पर्दा उठाना था कि जो अपने को कुछ जानने का दावा करते हैं, वे वास्तव में कुछ भी नहीं जानते तथा उनके विचार या दृष्टिकोण अपर्याप्त है । इस प्रकार सुकरात को यह विश्वास था कि वह इस विधि द्वारा यह दिखा सकता है कि वह दूसरों से अधिक बुद्धिमान है, क्योंकि वह जानता है कि वह नहीं जानता । सुकरात की इस विधि के दो विशिष्ट आयाम है । प्रथम, कार्य प्रणाली को लेकर यह द्वन्द्वात्मक है और दूसरे उद्देश्य को लेकर यह धाय विधि है।

द्वन्द्वात्मक विधि ( Dialectic Method )

         कुशलतापूर्वक प्रश्नोत्तर द्वारा वाद-विवाद की कला ही द्वन्द्वात्मक विधि है, जिसका उद्देश्य कम से कम सम्भव शब्दों में सारभिंत एवं सटीक उत्तर तक पहुंचाना होता है । इस विधि का प्रथम चरण प्रायः विषय सम्बंधि सर्वमान्य कथनों से प्रारम्भ होता है । यह सर्वमान्य कथन परिकल्पना पक्ष ( Thesis ) कहा जाता है । द्वितीय चरण में द्वन्द्वात्मक विधि परिकल्पना के विरूद्ध और इसके संभावित निरस्तिकरण की ओर अग्रसर होती है, जिसे प्रतिपक्ष कहते हैं । एक परिकल्पना के निराकरण से अपेक्षाकृत क्रम अर्न्तविरोधों वाली दूसरी परिकल्पना तक पहुंचा जा सकता है । अब इसे संपक्ष ( Synthesis ) कहा जाता है । इस प्रकार, द्वन्द्वात्मक पद्धति की सहायता से अन्वेषक कम से कम अर्न्तविरोधों वाली नई परिकल्पनाओं की ओर बढ़ता है । तथापि सुकरात स्वयं नीतिशास्त्र और जीवन के आचरण के विषय में उठाए गए प्रश्नों का पूरी तरह सही उत्तर नहीं पा सके, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं हुआ कि द्वन्द्वात्मक विधि एक विफल विधि थी । वास्तव में सुकरात के लिए उनकी विधि पूर्णज्ञान तक पहुँचने के लिए दार्शनिकों के प्रबल प्रेम के जैसी थी, क्योंकि सुकरात के अनुसार पूर्णज्ञान निरन्तर खोज में निहित है, उसे पकड़ने या वहाँ तक पहुँचने में नहीं । इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि द्वन्द्वात्मक विधि का उद्देश्य यह दिखाना था कि सुकरात के लिए दर्शन प्रज्ञा की खोज है, न कि पूर्ण ज्ञान तक पहुँचना ।

धाय विधि ( Midwifery Method )

         यद्यपि सुकरात ने द्वन्द्वात्मक विधि का अनुसरण और उसका समर्थन किया, फिर भी उन्होंने अपनी विधि को धाय-विधि के नाम से पुकारा । यद्यपि यह तथ्य उनकी माँ की ओर संकेत करता है, जो एक धाय का कार्य करती थी । इस धाय-विधि का अर्थ उनके लिए दूसरों के मस्तिष्क में शुद्ध विचार उत्पन्न करना था, जिससे कि वे सब सही कार्य कर सकें । वास्तव में, वे वैचारिक नहीं वरन व्यावहारिक उद्देश्य के लिए परिभाषा के स्पष्ट रूप में सच्चे विचारों को जन्म देना चाहते थे ।

ज्ञानमीमांसा

         सुकरात पूर्ववर्ती दर्शन की सभी शाखाओं के साथ-साथ उनकी ज्ञान मीमांसीय शाखा से विशेष रूप से असन्तुष्ट थे । उनके अनुसार ज्ञान की पूर्ववर्ती धारणाएं रूढीवादी, सापेक्षिक एवं पूर्व मान्यताओं पर आधारित थी । सुकरात ने इसका विरोध करते हुए पूर्ववर्ती ज्ञान योजनाओं के खोखलेपन को उजागर किया । सुकरात की समस्या सार्वभौम वैध ज्ञान प्राप्त करने से सम्बन्धित थी । साथ ही उनकी दार्शनिक खोज मूलतः नैतिक प्रकृति की थी । जिसका लक्ष्य स्वयं की खोज था । इसलिए काई भी इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुँच सकता है कि सुकरात का ज्ञान से तात्पर्य न्याय, सद्गुण, और चिरन्तन या धार्मिक विचारों के ज्ञान से था । सुकरात का विश्वास था कि न्याय, सदगुण व चिरन्तन विचारक का वास्तविक ज्ञान पहले से ही मनुष्य में निहित रहता है । यह ज्ञान प्रसुप्त होता है, जिसे कौशलपूर्ण प्रश्नों से पुनः स्मृत किया जा सकता है । यह ज्ञान किस प्रकार मनुष्य में उपस्थित रहता है ? इस प्रश्न ने सुकरात को आत्मा के अमरत्व में विश्वास के लिए प्रेरित किया, क्योंकि उसे प्रतीत हुआ कि आत्मा की अमरता से ही मानव न्याय, सद्गुण एवं चिरन्तन विचारों के बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकत है । चूंकि आत्मा अमर है, इसलिए इहलोक और परलोक की सभी वस्तुओं को इसने देखा है और सब कुछ इसके द्वारा जाना हुआ है । इसलिए हमें सदगुण या किसी अन्य वस्तु की पुनर्रस्मृति के बारे में आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह ज्ञान हम अपने में पहले से उपस्थित देखते हैं । लेकिन कैसे हम अपने में पहले से उपस्थित ज्ञान के प्रति जागरूक बनें ? यहां हमें सुकरात की ज्ञानमीमांसा के सूत्र मिलते हैं । अरस्तू ने मेटाफिजिक्स में स्पष्ट कहा है कि दो चीजें हमें सुकरात से मिली हुई है - "आमनात्मक तर्क और सार्वभौम परिभाषा" । अतः सुकरात के अनुसार आगमनात्मक तर्क और सार्वभौम परिभाषा के द्वारा ज्ञान की प्राप्ति होती है । इस प्रकार सुकरात के अनुसार सार्वभौमिक परिभाषा और आगमनात्मक तर्कणा दोनों ही ज्ञान के पुनर्बांध के साधन हैं, जबकि यह ज्ञान सभी मनुष्यों में प्रसुप्त अवस्था में पाया जाता है ।

परिभाषा

         सुकरात की विधि संवाद की विधि हैं, जिसमें सही उत्तर पाने के लिए प्रश्नों को पूछा जाता है । जब सुकरात कोई प्रश्न पूछते हैं, तो वह केवल यह नहीं पुछते कि कोई चीज क्या है ? जैसे कि न्याय क्या है, बल्कि वह यहां पर न्याय की परिभाषा पूछ रहे होते हैं । किसी चीज को परिभाषित करना उसके सार-तत्व को बताना होता है । इस प्रकार परिभाषा का ज्ञान तत्व के ज्ञान की ओर ले जाता है । इस प्रकार ज्ञान के प्रति यह एक नया दृष्टिकोण था । इस प्रकार का प्रयास पूर्ववर्ती विचारकों जैसे सोफिस्टों में नहीं दिखाई पड़ता यद्यपि इलियाई दर्शन का यह मुख्य विषय था । इस तथ्य से सुकरात की चिन्तन प्रक्रिया की उर्वरता प्रकट होती है, जिसके कारण वह सत्य के अन्वेषण की ओर मुड सकें । सुकरात ने उस सत् को अपना लक्ष्य बनाया, जिसे सोफिस्टों ने महत्व नहीं दिया था । अतः यह कहा जाता है कि सुकरात के दर्शन में तत्व को यथार्थ रूप में जानने का प्रयास दिखाई पड़ता है ।

आगमन

        सुकरात के लिए आगमन का वह अर्थ नहीं था जैसा कि बाद में आने वाले तर्कशास्त्रियों जैसे- फ्रांसिस बेकन और जॉन स्टुअर्ट मिल समझते थे । सोफिस्टों के विपरीत सुकरात ज्ञान के स्रोत के रूप में केवल प्रत्यक्ष पर निर्भर नहीं करते, क्योंकि प्रत्यक्ष ज्ञान सापेक्षता को जन्म दे सकता है । सुकरात के अन्वेषण का लक्ष्य निरपेक्ष ज्ञान है न कि कोई सापेक्ष ज्ञान । चूंकि सुकरात के लिए ज्ञान संप्रत्ययों पर आधारित है । उसने प्रत्यक्ष और संप्रत्यक्ष में तीक्षण अंतर बताया है । संप्रत्यय से तात्पर्य किसी वर्ग के सामान्य प्रत्यय से है । उदाहरण के लिए, गाय के वर्ग के लिए गायपन । लेकिन विशेष तौर से केवल विशिष्ट वस्तुओं ( गायों ) की संख्या का निरीक्षण गायपन के संप्रत्यय को उत्पन्न नहीं कर सकता । तब हम संप्रत्यय का निर्माण कैसे करते हैं ? संप्रत्यय का निर्माण सामान्य के पुनःस्मरण या अन्तःप्रज्ञा द्वारा होता है । यह अन्तः प्रज्ञा अचानक घटित होती है । प्लेटो के फीडो में सुकरात यह सुझाव देते हुए प्रतीत होते हैं कि यह पुनर्स्करण किसी रहस्यवादी के अन्तर्ज्ञान जैसा है । सुकरात वास्तव में एक रहस्यवादी थे और उनके अनुसार ज्ञान सामान्यों के रहस्यात्मक अन्तर्ज्ञान में पाया जाता है । यद्यपि इसमें प्रत्यक्ष उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है । लेकिन सुकरात ने सामान्य प्रत्ययों के ज्ञान में इन्द्रियों को बाधास्वरूप ही बताया । सुकरांत कहते हैं कि "स्पष्टतः तत्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आत्मा तभी निश्चय पूर्वक समर्थ हो सकती है, जब वह दृष्टि और श्रवण के व्यवधान से मुक्त हो, यह किसी प्रकार के सुख-दुःख से विचलित न हो, जब यह शरीर की उपेक्षा कर दे तथा सारे संपर्कों और सहचयों से स्वयं को मुक्त कर ले” । सुकरात ने यहाँ तक माना कि शरीर से मुक्त होने के बाद ही सत्यान्वेषी को सत्य का पूर्ण और भ्रमरहित साक्षात्कार होता है । इस जीवन में भी यदि कोई शारीरिक तप पूर्वक जीवन बिताता है तो उसे सत्यज्ञान की प्राप्ति हो सकती है । अतः इस प्रकार सुकरात ने सत्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए सन्यासयुक्त आचरण पर बल दिया । जिससे व्यक्ति नैतिक, धार्मिक और राजनैतिक नियमों के अनुकूल जीवन व्यतीत करने के लिए सक्षम हो जाता है ।

सुकरातीय नीतिशास्त्र

         सुकरात का नीतिशास्त्र प्रधानतः मानव केन्द्रित है । यद्यपि यह दृष्टि ग्रीक दार्शनिक परम्परा में नई नहीं थी, फिर भी सुकरात ने मनुष्य पर एक भिन्न दृष्टिकोण से विचार किया है । उनके नीतिशास्त्र का केन्द्र सदगुण की अवधारणा है । सद्गुण सुकरात के अनुसार एक गहनतम एवं सर्वाधिक मूलभूत प्रवृत्ति है । यह सद्गुण ज्ञान है । "... यदि कोई भी शुभ वस्तु ज्ञान से असंबंधित और भिन्न है, तब सद्गुण अनिवार्यतः ज्ञान का प्रकार नहीं हो सकता । दूसरी दृष्टि से, यदि ज्ञान शुभ को पूर्णतः धारण करता है, तब हम पूरी तरह से कह सकते हैं कि सद्गुण ज्ञान है ।" यदि सद्गुण ज्ञान हैं तो इसे जाना जा सकता है और इसकी हम शिक्षा दे सकते हैं । यही "अपने आप को जानों” - इस प्रबोध वाक्य का अर्थ है । अपने आप को जानों का अर्थ है कि ( हम ) आन्तरिक आत्मा को प्रकाशित करें । ज्ञान के द्वारा मानव आत्म-नियन्त्रण कर स्वयं का स्वामी बन जाता है ।

सद्गुण ही ज्ञान है

        सुकरात के अनुसार सदगुण मानव जीवन में प्राप्त किया जाने वाला सर्वोत्तम शुभ और सर्वोच्च लक्ष्य है । उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि यह परम लक्ष्य है और परम शुभ है, तो इसमें सार्वभौम संगति होगी तथा यह सभी के लिए एक जैसा होगा सुकरात का यह मानना है कि स्वास्थ्य, धन, सुन्दरता, साहस और संयम, जो शुभ के विभिन्न रूप माने जाते हैं, वस्तुतः शुभ तभी हैं जब ये विवेकसम्मत होते हैं । मूढ़ता के साथ जुड़कर ये अशुभ के रूप हो जाते हैं । संप्रत्यय बुद्धि के द्वारा प्रदत्त होते हैं न कि किसी विशेष तथ्य के प्रत्यक्ष से अब चूंकि संप्रत्यय मानव मन में पहले से ही विद्यमान है, इसलिए उन्हें जाग्रत करने के लिए प्रश्न - विधि उपयोगी है । यदि नैतिकता शुभ के प्रत्यय का संप्रत्ययों के द्वारा ज्ञान है, तब इसे कौन प्राप्त कर सकता है ? सुकरात यह मानते थे कि सोफिस्टों को इसकी प्राप्ति इसलिए नहीं हुई, क्योंकि वे बुद्धि की अपेक्षा प्रत्यक्ष पर आश्रित थे । सुकरात का विश्वास था कि सत्य एवं शुभ को वही प्राप्त कर सकता है, जो बुद्धि से संचालित होता है, प्रत्यक्ष से नहीं । जो बुद्धि से संचालित होता है अपने मन में पहले से ही उपस्थित वह शुभ के प्रत्यय का पुर्नस्मरण करता है । अपनी ज्ञानमीमांसा के अनुरूप ही वे यह भी मानते हैं कि शुभ का यथार्थ संप्रत्यय शुभ के प्रत्यय पर चिन्तनशील पुर्नस्मरण द्वारा प्राप्त होता है ।

सद्गुण एक है

        सुकरात के अनुसार नीतिशास्त्र का एक अन्य आयाम और भी है । यहाँ हम केवल शुभ के प्रत्यय के ज्ञानमात्र से ही संतुष्ट नहीं होते । वास्तव में शुभ के प्रत्यय का ज्ञान अन्य प्रत्ययों को नियन्त्रित करने का कार्य करता है तथा इच्छा और भावना सहित संपूर्ण मानव का पथ-प्रदर्शन करता है तथा शुभ कार्यों के लिए उसे प्रेरित करता है । अतः नैतिक ज्ञान आत्मा को सुसंस्कृत और सुशिक्षित करता है तथा उसको अपनी विशुद्ध महिमा में स्थापित कर देता है । इसलिए सुकरात उद्घोषित करते हैं कि "कोई भी ज्ञानपूर्वक दुष्कृत्य नहीं कर सकता" तथा "ज्ञान ही सद्गुण है ।" सुकरात कहते हैं कि सद्गुण या शुभत्व एक है, यद्यपि हम उसे विभिन्न प्रकार से आचरण में लाते हैं । प्लेटो की कृति प्रोटागोरस में सुकरात कहते हैं कि सद्गुण के प्रज्ञा, संयम, साहस, न्याय तथा पवित्रता आदि अनेक मुख्य प्रकार हैं, लेकिन उन सब में एक ही तत्व व्याप्त है । इसी प्रकार प्लेटो की कृति मेनो में सुकरात एक ऐसे सद्गुण का अन्वेषण करना चाहते हैं, जो सब सद्गुणों में व्याप्त रहता है । सुकरात इसे एक स्वस्थ शरीर के उदाहरण से समझाते हैं । उनके अनुसार एक स्वस्थ शरीर जिस प्रकार तमाम शारीरिक कौशलों के लिए उत्तरदायी होता है, उसी प्रकार आत्मा की स्वस्थता से सभी प्रकार के सद्गुणों का संकेत मिलता है । आत्मा के स्वास्थ्य का क्या अर्थ है ? आत्मा की अनेक क्रियायें हैं । इन क्रियाओं का सुव्यवस्थित संयोजन ही आत्मा की स्वस्थता है । प्लेटो की कृति गार्जियस में हम सुकरात को यह कहते हुए पाते हैं कि आत्मा की मुख्य क्रियायें, तार्किकता, संयम और इच्छा हैं । तार्किकता प्रज्ञा की ओर अग्रसर करती है, संयम साहस ओर तरफ तथा इच्छा सौम्यता की ओर । आत्मा का स्वास्थ्य इन सभी क्रियाओं के संगतिपूर्ण संयोजन पर निर्भर रहता है । इन क्रियाओं का संयोजन इस प्रकार है, प्रज्ञा आदेश देती है तथा संयम इसके अनुपालन में सहायक होता है, जबकि इच्छा इन आदेशों के क्रियान्वयन के लिए भौतिक आधार का काम करती है । सद्गुण की एकता का लक्ष्य व्यक्ति को आत्याधिक प्रसन्नता प्रदान करता है । "विवेक के नियन्त्रण में सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों का सफल क्रियान्वयन प्रसन्नता को जन्म देता है ।" इस प्रकार सद्गुण की एकता की सुकरातीय अवधारणा का अर्थ है कि "एक अच्छे मनुष्य की आत्मा उसकी समस्त क्रियाओं की सावयविक एकता को प्रदर्शित करती है ।" सुकरात के इस विचार से कि 'सद्गुण एक है” यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य के सभी स्वाभाविक नैतिक कर्मों में शुभत्व का एक अकेला प्रत्यय व्याप्त है । प्लेटो की कृति रिपब्लिक में सुकरात इसे इस प्रकार कहते हैं, “ज्ञान के क्षेत्र में कठिनाई से जानी जाने वाली अन्तिम जानने योग्य वस्तु शुभ का प्रत्यय है और जब यह जान ली जाती है, तब निशचिन्त रूप से यह निकर्ष निकलता है कि यही सर्वसुन्दर और सदा उचित वस्तुओं का कारण है” । शुभ ही दृश्य जगत में प्रकाश को जन्म देता है । प्रकाश का जनक होने के कारण यह बौद्धिक में सत्य और बुद्धि का प्रामाणिक स्रोत है तथा प्रत्येक वह व्यक्ति जो वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में बुद्धिमत्ता पूर्ण आचरण करना चाहता है उसे इससे अवश्य ही परिचित होना चाहिए ।

 सुकरात ( Socrates ) के प्रमुख दार्शनिक विचार 

  • स्वयं को जानो 
  • ज्ञान सद्गुण है । 
  • ज्ञान संप्रत्यात्मक होता है । 
  • अज्ञान सबसे बड़ा पाप है ।
  • शरीर आत्मा का बंधन है । 
  • मैं केवल एक बात जानता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता । 
  • भले आदमी के लिए परलोक में कोई भय नहीं । 
  • परलोक मैं भी आनन्द है । 
  • आत्मा अमर और दिव्यलोक की निवासी है ।  
  • विवेक के नियन्त्रण में सामंजस्यपूर्ण गतिविधियों का सफल क्रियान्वयन प्रसन्नता को जन्म देता है ।
  • एक अच्छे मनुष्य की आत्मा उसकी समस्त क्रियाओं की सावयविक एकता को प्रदर्शित करती है ।
  • वह वक्त आ गया है कि मैं मरने वाला हूँ और आप जीवित रहेंगे, मगर किसकी नियति में ज्यादा खुशी लिखी है, वह ईश्वर को छोड़ कोई नहीं जानता । 

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