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| जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन |
जॉर्जियास ( Gorgias ) का दर्शन
तत्वमीमांसा
शुरूआती दौर में गोर्जियास की एम्पीडोकल्स और
प्राकृतिक विज्ञानों के दर्शन में दिलचस्पी थी । सामान्यतः यह माना जाता है कि
उन्होंने ऑप्टिक्स ( प्रकाश विज्ञान ) पर एक पुस्तक लिखी थी । बाद में वह जीनो के
तर्कशास्त्र द्वारा संशयवाद की ओर आकर्षित हो गए और उन्होंने ऑन नॉट बीइंग ओर नेचर
( On
Not - being or Nature ) के शीर्षक से एक पुस्तक लिखी । उनकी पुस्तक
से पता चलता है कि गोर्जियास ने एलियाई तर्कशास्त्र पर प्रोटागोरस की अपेक्षा
भिन्न तरीके से प्रतिक्रिया व्यक्त की थी । जहां प्रोटागोरस का मानना था कि सब कुछ
सत्य है, वहीं गॉर्जियास ने पूर्ण शून्यवाद पर जोर दिया । इस
सिद्धान्त के तीन आधारभूत तर्कवाक्य इस प्रकार है –
- कुछ भी
अस्तित्वमान नहीं है
- यदि कुछ है, तो वह जाना नहीं जा सकता
- यदि किसी प्रकार का ज्ञान हो भी जाय, तो इस ज्ञान को अन्य लोगों को संज्ञापित नहीं किया जा सकता है ।
इसमें कोई दोराय नहीं कि ये विचार मूलतः बहुत
उत्तेजक है । लेकिन क्या गॉर्जियास ने इन्हें गंभीरता से अपनी तत्वमीमांसा के रूप
में प्रस्तुत किया था ? कुछ का विचार है कि उन्होंने
ऐसा किया था । अन्य ने इसे एक मजाक के रूप में और यह माना कि उनका उद्देश्य यह
दर्शाना मात्र था कि शब्दों के चार्तुयपूर्ण उपयोग द्वारा क्या किया जा सकता है ।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि गॉर्जियास एलिया के द्वंद्ववाद का उपयोग एलिया के
दर्शन को अर्थहीन सिद्ध करने के लिए करना चाहते थे । बाद में गॉर्जियास दर्शन को
त्याग कर व्याख्यान विद्या का अध्ययन करने लगे थे ।
व्याख्यान शास्त्र ( Rhetoric
)
गॉर्जियास ने देखा कि व्याख्यान शास्त्र में
विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को लोगों को सहमत करने की कला में पारंगत
होना चाहिए और इसके लिए व्यवहारिक मनोविज्ञान का बारीकी से अध्ययन करने की
आवश्यकता होती है । उन्होंने जानबूझकर परामर्श देने की कला का अभ्यास किया, जिसका उपयोग व्यवहारिक और कलात्मक कार्यों दोनों के लिए किया जा सकता था ।
कलात्मक उपयोग के संदर्भ में गॉर्जियास ने न्यायसंगत छल की अवधारणा प्रस्तुत की,
जिसका 'त्रासदी' स्पष्ट
उदाहरण था । दर्शक पर 'त्रासदी' की शक्ति
की तुलना भाव-विरेचन ( Purgative ) के प्रभाव से की जा सकती
है, जो किसी को भी अरस्तू के 'कथार्सिस'
के सिद्धान्त की याद दिलाता है ।
जॉर्जियास ( Gorgias ) के प्रमुख दार्शनिक विचार
- सत्य सापेक्ष ही है, निरपेक्ष सत्य असम्भव है ।
- प्रथम तो कोई सत्य नहीं है, द्वितीय यदि हो भी तो उसे हम नहीं जान सकते, तृतीय यदि जान भी ले तो उसे दूसरे को नहीं समझा सकते ।
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