प्रोटागोरस की ज्ञानमीमांसा
प्रोटागोरस को सबसे अधिक अपने इस कथन के लिए
जाना जाता है कि "मानव सभी बातों का मापदंड है, जो
है वह वास्तविक है और जो नहीं है वह वास्तविक नहीं है ।" यहाँ पर 'मनुष्य' और 'वस्तु' शब्द के अर्थ अत्यन्त विवाद के विषय है । प्लेटो की थिएटेटस में
प्रोटागोरस के उपर्युक्त कथन की बोध की अनुभूति के संदर्भ में वैयक्तिक बोध के रूप
में व्याख्या की गई है । जब कहीं पवन बहती है तो उससे किसी को ठंडा लग सकती है और
किसी को नहीं । सुकरात के अनुसार क्या हमें प्रोटागोरस से सहमत होना चाहिए कि पवन
उसके लिए ठंडी है जिसे सर्दी लग रही है और उसके लिए नहीं है, जिसे सर्दी नहीं लग
रही है । इससे यह स्पष्ट होता है कि प्रोटागोरस के कथन को व्यक्तिगत मनुष्य के
अर्थ में लेना चाहिए, विशिष्ट मनुष्य के रूप में नहीं । यही नहीं,
ध्यान इस बात पर भी दिया जाना चाहिए कि सोफिस्टों का अर्थ यह नहीं
था कि पवन ठंडी प्रतीत होती है, बल्कि यह था कि वह एक
व्यक्ति के बोध की अनुभूति के लिए ठंडी हो सकती है, जबकि
दूसरे के लिए नहीं भी हो सकती है ।
प्रोटागोरस का नीतिशास्त्र
प्लेटों के अनुसार, प्रोटागोरस परंपरा और
सामाजिक रीतिरिवाजों को समृद्ध करने वाले प्रतीत होते हैं । उन्होंने शिक्षा के
महत्व तथा राष्ट्र की नैतिक परंपराओं को आत्मसात् करने के महत्व पर अत्यधिक बल
दिया और साथ ही इस बात को भी माना कि ज्ञानी लोग राष्ट्र के लिए बेहतर कानून बना
सकते हैं । जहां तक व्यक्तिगत नागरिकों की बात है, तो
उचित आचरण परंपरा के प्रति निष्ठावान और समुदायिक नियमावली की स्वीकृति में निहित
होता है । ऐसा इसलिए है क्योंकि कोई एक मार्ग दूसरे से अधिक सत्य नहीं होता है । प्रोटागोरस
के शब्दों में कहे तो, “राष्ट्र के कानून के विरूद्ध अपना निजी निर्णय न स्थापित
करें, क्योंकि कोई भी संहिता दूसरे से अधिक सत्य नहीं होती
है” । इस प्रकार, प्रोटागोरस परंपरा ओर रीतिरिवाजों के
संदर्भ में अपने सापेक्षवाद का मेल कराने में सक्षम हैं, ऐसा
सापेक्षतावाद जिसे अनेक व्यक्तियों द्वारा सोद्देश्य रूप से क्रांतिकारी माना गया
है ।
प्रोटागोरस का धर्म विचार
प्रोटागोरस की पुस्तक ‘ऑन द गॉड्स’ के सिर्फ
कुछ अंश ही हमारे पास उपलब्ध है । इन अंशों में उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व और
प्रकृति के संदर्भ में विशिष्ट संशयवाद को अभिव्यक्त किया है । इस प्रकार के कथनों
की व्याख्या आसानी से धर्म में आस्था के विरोधी के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है
। यद्यपि,
वास्तव में ऐसा नहीं है । प्रोटागोरस में सोफिस्ट उस समय अपनी
नैसर्गिक आस्था की अधीनता की स्तुति करते हैं, जब वह राष्ट्र
के कानूनों के पालन की वकालत करते हैं । इसी प्रकार, यदि हम
पूर्ण सत्य को लेकर निश्चित नहीं हो सकते हैं, तो हमें अपने
पूर्वजों के धर्म को नकारने का कोई अधिकार नहीं है । किसी भी कीमत पर, प्रोटागोरस की सोच वास्तव में इतनी विध्वंसक नहीं है जितनी कि धार्मिक
रूढीवादी सोचते हैं । वास्तविकता यह है कि यूनानी धर्म तार्किक आस्था पर आधारित
नहीं था । उनका मुख्य जोर पूजा पर था, न कि धर्म सैद्धान्तिक
अनुमोदनों या खंडनों पर यद्यपि सोफिस्ट चिंतन की सामान्य प्रकृति मनुष्य की परंपरा
में आस्था को कमजोर करना था । प्रोटागोरस स्वंय स्वभाव से रूढ़िवादी थे और उनकी
क्रांतिकारियों को शिक्षित करने की कोई मंशा नहीं थी । इसके विपरीत, उनका दावा था कि उनका काम अच्छे नागरिकों को शिक्षित करना है । सभी
मनुष्यों में जन्मजात नैतिक प्रवृत्तियां सिर्फ संगठित समाजों में ही फलीभूत होती
हैं । इसलिए एक अच्छे नागरिक को सामाजिक परंपराओं को आत्मसात् करके अपने
उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए । माना कि यह परंपरा पूर्ण सत्य
नहीं है, लेकिन यह अच्छे नागरिक के लिए एक मानक है ।
प्रोटागोरस ( Protagoras ) के प्रमुख दार्शनिक विचार
- मानव सभी बातों का मापदंड है ।
- सद्गुण और सुख परस्पर अभिन्न नहीं है ।
- जो है वह वास्तविक है और जो नहीं है वह वास्तविक नहीं है ।
- एक व्यक्ति के लिए जो सत्य है यह आवश्यक नहीं कि वह दूसरों के लिए भी सत्य हो । अतः सत्य व्यक्तिनिष्ठ होता है ।
- राष्ट्र के कानून के विरूद्ध अपना निजी निर्णय न स्थापित करें, क्योंकि कोई भी संहिता दूसरे से अधिक सत्य नहीं होती है ।
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