Tuesday, May 17, 2022

सोफिस्ट ( Sophist ) सम्प्रदाय

सोफिस्ट ( Sophist ) सम्प्रदाय 

सोफिस्ट ( Sophist ) सम्प्रदाय      

         सोफिस्ट आंदोलन 5 वीं शताब्दी ई. पू. में, सुकरात के काल के अविर्भाव से कुछ ही पहले शुरू हुआ । जीनोफोन, जो कि चौथी शताब्दी ई. पू. के एक इतिहासकार थे, ने सोफिस्टों को यायावर शिक्षकों के रूप में वर्णित किया और उन्हें धन के बदले में बुद्धि को बेचने वाले बताया । इस प्रकार, सोफिस्ट व्यावसायिक शिक्षक थे, जो एक से दूसरे शहर में घूमते हुए लोगों को, विशेषरूप से युवाओं को शिक्षा देते थे । उन्हें उनके कार्य के लिए काफी धन मिलता था ।

          सोफिस्ट स्वयं को बुद्धि और सद्गुणों का शिक्षक कहते थे । यद्यपि, इन शब्दों का सोफिस्टों के व्यवहारों में मूल अर्थ फलीभूत नहीं होता है । इन शब्दों का अर्थ उनके लिये मात्र दैनिक जीवन के व्यवहारिक मामलों में प्राप्त दक्षता या कौशल से था । उनका दावा था कि यही कौशलता या दक्षता व्यक्तियों को सफल बनाती है । उनके अनुसार भौतिक संपदा को अर्जित करने और उसका सुख भोगने के साथ ही समाज में सत्ता और प्रभावशाली स्थान अर्जित करना ही सफलता है ।

बौद्धिक संदर्भ

          सोफिस्टों के ज्ञानमीमांसात्मक और नैतिक संशयवाद तथा सापेक्षवाद ने सुकरात पूर्व दार्शनिकों के अमूर्त और आध्यात्मिक दर्शन के विरूद्ध एक प्रतिक्रिया प्रदर्शित की थी । आरंभिक यूनानी दार्शनिक मुख्य रूप से ब्रहमांड के मूल तत्व की खोज में दिलचस्पी रखते थे । उनकी दार्शनिक व्याख्याऐं एक दूसरे से पूर्णतः भिन्न थी । वास्तव में, सोफिस्टों का ध्यान आरंभिक यूनानी दार्शनिकों के मतों में पाई गई भिन्नताओं के कारण ही प्राकृतिक समस्याओं से हटकर मनुष्य की समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ । जगत् के विरोधी सिद्धान्तों की चकरा देने वाली दार्शनिक व्याख्याओं को देखते हुए सोफिस्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रकृति केन्द्रित दार्शनिकों के बीच असहमति मानव तर्क की नैसर्गिक सीमाओं के कारण है । यद्यपि सोफिस्टों ने मानव बुद्धि को आलोचना के लिए मुक्त रखा परन्तु इसके फलस्वरूप वे पूर्णतः सापेक्षतावादी निष्कर्ष पर पहुंचे । उन्होंने ज्ञान की समस्त यथार्थता को नकार दिया और इस प्रकार संशयवाद के लिए राह बनाई ।

सामाजिक राजनैतिक संदर्भ

          पर्सिया के युद्धों ( 500-449 ई. पू. ) के बाद यूनान में राजनैतिक जीवन की गतिविधियां बढ़ गई और ऐसा विशेषरूप से प्रजातांत्रिक एथेन्स में हुआ, जो इस क्षेत्र में सघन राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रियाकलाप का केन्द्र बन गया था । स्वतंत्र नागरिकों से राष्ट्र के मामलों में सक्रिय भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती थी और इसलिए उन्हें अधिक राजनैतिक जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए प्रशिक्षित किया जाता था । राजनीति को व्यवसाय बनाने के लिए साहित्यशास्त्र और भाषण कला में महारत होना काफी महत्व रखता था । वास्तव में सोफिस्ट भाषण को एक सशक्त हथियार समझते थे, जिससे वक्ता अपने श्रोताओं को सम्मोहित करके उन्हें अपने विचारों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित कर सकता था । यूनानी प्रजातंत्र में धन मुकदमा जीतकर कमाया जा सकता था और यह माना जाता था कि सोफिस्ट मुकदमा जीतने के सही तरीकों को सिखाने में सक्षम हैं । युवाओं को राजनैतिक तार्किक कौशलों की शिक्षा देकर सोफिस्टों ने बुद्धि और क्षमता के एक नए अभिजात्य वर्ग की रचना करने में सहायता की । इस बात पर स्वाभाविक रूप से उसे प्राचीन अभिजात्य वर्ग ने अप्रसन्नता जताई, जो ज्ञान और आचरण की पारंपरिक बौद्धिकता के साथ जीते थे ।

सोफिस्ट शिक्षाए  

         सोफिस्टों का सरोकार, ब्रहमांड की संरचना अथवा सत् के मूल घटकों की अपेक्षा, ज्ञान और आचरण की समस्याओं का पता लगाने से था । प्राचीन दार्शनिकों के साथ उनके परिचय ने उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचा दिया कि बाह्य जगत के वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करना असंभव है और मानव बुद्धि ब्रहमांड की पहेली को नहीं सुलझा सकती । इसलिए मानव ज्ञान की मूल प्रकृति और नैतिक आचरण के व्यवहारिक नियमों की जाँच पड़ताल अधिक प्रासंगिक थी । अतः सोफिस्ट दर्शन का मुख्य योगदान, नीतिशास्त्र और ज्ञानशास्त्र के मूल प्रश्नों के साथ-साथ तार्किक जाँच पड़ताल के उचित तरीकों और लक्ष्य से संबन्धित था सोफिस्टों ने प्रकृति की समस्याओं से मनुष्य की समस्याओं तक दार्शनिक दिलचस्पी के रूप में प्रमुख बदलाव प्रदर्शित किया, यद्यपि इस बदलाव को सुकरात के दर्शन में सबसे अच्छी तरह से देखा जा सकता है ।

ज्ञानमीमांसा

         सुकरात के पहले के दार्शनिकों ने सत् की प्रकृति का पता लगाते समय सत्य की प्राप्ति में मानवबुद्धि की क्षमता को विशेष महत्व नहीं दिया था । उन्होंने कभी भी बुद्धि की आलोचना करने की बात नहीं सोची थी । इसी पूर्वानुमान के कारण सोफिस्टों ने प्रश्न किया किं ये महान दार्शनिक सत् की प्रकृति के बारे में न केवल विपरीत बल्कि परस्पर विरोधाभासी निष्कर्षों पर क्यों और कैसे पहुंचे, जबकि वे सभी एक ही वस्तु की खोज कर रहे थे ? इसके उत्तर में सोफिस्टों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया कि ज्ञान विशेष रूप से ज्ञाता पर निर्भर करता है । ज्ञाता को जो सत्य प्रतीत होता है वह उसके लिए सत्य होता है । कोई वस्तुनिष्ठ सत्य नहीं होता, बल्कि सिर्फ व्यक्तिनिष्ठ मत होता है । इस सम्बंध में प्रोटागोरस का प्रसिद्ध कथन, “मनुष्य सभी वस्तुओं का मापदण्ड है”, मनुष्य के सहजबुद्धि के निर्णयों के पक्ष में प्रकृतिवादी दार्शनिकों के विरोधाभासी निष्कर्षों का परित्याग करता है । इस प्रकार का मत, ज्ञान के मामलों में, व्यक्ति विशेष को स्वयं अपने आप में सही-गलत का निर्णयकर्ता बना देता है । इससे एक ही वस्तु के विषय में विभिन्न व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न मत हो सकते है और वे सभी मत सत्य भी कहलायेंगे । इसी प्रकार एक ही विषय पर दो व्यक्तियों द्वारा व्यक्त दो विपरीत सत्य कथन भी सम्भव हो जायेंगे । प्रत्येक कथन व्यक्ति के सापेक्ष हो जाऐगा । इस अवस्था में कथनों की सर्व सत्यता को प्रदर्शित करने का प्रयास करना व्यर्थ रहेगा । बल्कि सोफिस्ट का काम यही था कि वह लोगों को दो विरोधी कथनों में से किसी एक की अपेक्षा दूसरे को अपनाने के लिए तैयार कर लें । नीतिशास्त्र

        सोफिस्टों के नैतिक विचार उनकी ज्ञान मीमांसा के अनुरूप है । अतः स्वभाविक रूप से उनके नैतिक विचार उनके व्यक्तिनिष्ठवादी और सापेक्षतावादी सिद्धान्तों का परिणाम है । यदि यथार्थ एवं सार्वभौमिक ज्ञान असंभव है, तो सही या गलत का वस्तुनिष्ठ ज्ञान भी असम्भव है । प्रत्येक व्यक्ति अपनी चेतना के अनुसार नैतिक चयन करने के लिए स्वतंत्र है । यदि एक ओर आरंभिक यूनानी दार्शनिकों की परस्पर विरोधी ब्रहमांड विज्ञान सम्बंधी व्याख्याओं ने सोफिस्टों के ज्ञानमीमांसीय संशयवाद को जन्म दिया तो वही दूसरी ओर उस समय विभिन्न राष्ट्रों में पाए जाने वाले रीतिरिवाजों, परम्पराओं और नैतिक मूल्यों ने उन्हें आचरण एवं मूल्यों की वस्तुनिष्ठता की वैधता पर प्रश्न करने को प्रेरित किया । सोफिस्ट आरंभिक यूनानी दार्शनिकों से न सिर्फ विषय वस्तु जैसे आध्यात्म और ज्ञान शास्त्र के संदर्भ में भिन्न मत रखते थे बल्कि दार्शनिक अन्वेषण की कार्यविधि और उचित लक्ष्य में भी भिन्न मत रखते थे ।

अन्वेषण की विधि

          सोफिस्टों की अन्वेषण की विधि अनुभूतिमूलक-आगमनात्मक थी । इसके विपरीत, आरंभिक दार्शनिकों की अन्वेषण विधि मुख्यरूप से निगमनात्मक थी । आरंभिक दार्शनिक प्रारूपिक रूप से सामान्य सिद्धान्त से शुरू करके फिर उस सिद्धान्त के अनुसार परिघटना को समझते थे । दूसरी ओर सोफिस्ट किसी विशेष निरीक्षण और तथ्यों से शुरूआत करते थे । उन्होंने अपनी यात्राओं से काफी तथ्यों का भंडार एकत्रित किया था । इनसे वे अपने निष्कर्ष निकालते थे, जो आंशिक रूप से सैद्धान्तिक और आंशिक रूप से व्यवहारिक थे । उदाहरण के लिए मतों और विश्वासों के अन्तरों से संबन्धित अनेक तथ्यों के अध्ययन के कारण वे ऐसे निष्कर्षो पर पहुंचे, जिनके अनुसार किसी ऐसे ज्ञान का होना असंभव था, जो सार्वजनिक रूप से सभी को स्वीकार्य हो ।

दार्शनिक अन्वेषण का लक्ष्य

          ज्ञान-संश्यवादी होने के कारण सोफिस्टों का लक्ष्य वस्तुनिष्ठ नियम स्थापित करना या अनिवार्य सत्यों की खोज करना नहीं था । यहां पुनः वे आरंभिक यूनानी दार्शनिकों से भिन्न थे, जिनका प्राथमिक लक्ष्य सार्वभौम सत्य का पता लगाना था । सभी ब्रहमांडशास्त्री जगत् के बारे में वस्तुनिष्ठ सत्यों का पता लगाना चाहते थे । दूसरी ओर, सोफिस्ट यथार्थ वस्तुनिष्ठ सत्यों तक पहुचनें की नहीं बल्कि सिर्फ सापेक्ष, विषयपरक सत्य की ही उम्मीद करते थे । उन्होंने अपने आपको जीवन पर नियंत्रण और उसकी कला को सिखाने तक सीमित रखा । दूसरे शब्दों में, उनका लक्ष्य सैद्धान्तिक नहीं बल्कि व्यवहारिक था ।

सोफिस्ट दर्शन का महत्व

        पांचवी शताब्दी ई. पू. का सोफिस्ट आंदोलन एक संक्रामी प्रावस्था को प्रदर्शित करता है । यह ब्रहमांड की पहेली को सुलझाने में मानव बुद्धि की शक्ति के प्रति बढ़ते अविश्वास और उसके फलस्वरूप पारंपरिक मूल्यों और संस्थानों में विश्वास की कमी को प्रदर्शित करता है । यह आंदोलन पूरी तरह से संशयवादी और क्रांतिकारी था । यह आध्यात्मिक चिंतन से विरक्त ही नहीं बल्कि उसका विरोधी भी था । तथापि, यह मनुष्य की समस्याओं के प्रति ध्यान आकर्षित करने में मानव ज्ञान और आचरण की समस्या के पूर्ण परीक्षण की आवश्यकता पर बल देते हुए इन्हीं मान्यताओं के साथ सुकरात के काल में प्रवेश कर जाता है । सकारात्मक रूप से कहे तो सोफिस्टों ने दर्शन को आम आदमी की पहुँच तक ला दिया । उन्होंने दार्शनिकों का बाह्य प्रकृति के चिंतन से ध्यान हटाकर स्वयं मनुष्य पर केन्द्रित कर दिया । दूसरे, उन्होंने मानव जीवन और दर्शन के सभी क्षेत्रों में गहराई से चिंतन करने की भावना को प्रोत्साहित किया । इन्होंने दार्शनिकों को चिंतन की प्रक्रिया की जांच पड़ताल करने के लिए बाध्य किया और इससे ज्ञान के सिद्धान्त का निरूपण हुआ । इसी प्रकार, उनके तार्किक भ्रांतियों और सोफिस्ट सिद्धान्तों के प्रयोग ने चिंतन के सही नियमों के अध्ययन को अनिवार्य बना दिया । कालान्तर में, इससे द्वंद्ववाद (प्लेटो) और तर्क शास्त्र (अरस्तू) का विकास हुआ । इसी प्रकार सही और गलत की आम धारणाओं और सार्वजनिक और निजी न्याय की उनकी मूलभूत आलोचना ने दार्शनिकों को नीतिशास्त्र और राजनीति के आधारों के पुनः परीक्षण के लिए बाध्य किया । संतुलित अर्थों में कहे तो सोफिस्ट हेल्लास के महान शिक्षक थे । उन्होंने दर्शन को और अधिक ठोस आधार प्रदान करने पर बल दिया, जिससे कि ज्ञान, सत्य, सही और गलत की तथा मानव संस्थाओं और धर्म के अर्थ और उद्देश्य की मौलिक अवधारणाओं की अधिक बारीकी से जांच पड़ताल की जा सके ।

प्रमुख सोफिस्ट दार्शनिक 

प्रोटोगोरस ( Protagoras ) का दर्शन


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Monday, May 16, 2022

डेमोक्रीटस ( Democritus ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

डेमोक्रीटस ( Democritus ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

डेमोक्रीटस ( Democritus ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- डेमोक्रीटस के अनुसार परमाणुओं में पाया जाता है ? 

  1. केवल मात्रात्मक भेद 
  2. मात्रात्मक एवं गुणात्मक भेद 
  3. केवल गुणात्मक भेद 
  4. इनमें से कोई नहीं 

2- किस दार्शनिक ने विश्व की व्याख्या परमाणुओं के आधार पर स्वीकार की है ?

  1. प्रोटोगोरस 
  2. डेमोक्रीटस
  3. हेराक्लिटस 
  4. पाइथागोरस 

3- डेमोक्रीटस के अनुसार आत्मा की उत्पत्ति होती है ?

  1. परमाणुओं के संयोग से 
  2. पंचमहाभूतों के संयोग से 
  3. चेतना के तत्त्वों के संघात से 
  4. इनमें से कोई नहीं 

4- डेमोक्रीटस के अनुसार आत्मा को ज्ञान की प्राप्ति होती है ?

  1. बुद्धि के द्वारा 
  2. प्रत्यक्ष के द्वारा 
  3. 1 और 2 दोनों के द्वारा 
  4. इनमें से कोई नहीं 

5- डेमोक्रीटस के अनुसार सर्वोच्च ज्ञान के रूप में स्वीकार किया जाता है ?

  1. प्रत्यक्ष के द्वारा प्राप्त ज्ञान 
  2. बुद्धि के द्वारा प्राप्त ज्ञान 
  3. अंतर्भान के द्वारा प्राप्त ज्ञान 
  4. इनमें से कोई नहीं 
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डेमोक्रीटस ( Democritus ) का दर्शन

डेमोक्रीटस ( Democritus ) का दर्शन 

डेमोक्रीटस ( Democritus ) का दर्शन 

परमाणु सिद्धान्त 

        परमाणुवादियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण समस्या यह थी कि प्रकृति के भौतिक तत्वों, जिनसे प्रकृति की रचना हुई है, को अनिश्चित रूप से अपेक्षाकृत छोटे कणों में नहीं बांटा जा सकता है । यदि ऐसा संभव हो जाए तो प्रकृति के स्थायी गुणों को खतरा उत्पन्न हो जाएगा । तब प्रकृति में कोई स्थायित्व भी नहीं होगा । वे पार्मेनाइड्स की इस बात से सहमत थे कि "भाव से अभाव की उत्पत्ति नहीं होती” । अतः प्रकृति का भौतिक कण शाश्वत् एवं सत्य होना चाहिए । तब ही उसमें से प्रकृति की उत्पत्ति हो सकती है । ये शाश्वत् कण जो परमाणु है, दृढ़ और ठोस होते हैं, लेकिन ये एकसमान नहीं होते हैं । अन्यथा, प्रकृति की अनेकता और एकता असंभव हो जायेगी । जबकि हम पर्वतों, सागरों, आकाश, अमीबा, पक्षियों, मछली, फूलों, जंतु और मनुष्यों आदि विभिन्न जीवों एवं वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देखते हैं । उन्होंने इसकी पुष्टि की कि ब्रहमांड विभिन्न प्रकार के असत्य असीमित परमाणुओं से निर्मित है । इनमें से कुछ गोल और चिकने, कुछ अनियमित और दांतेदार होते हैं । यथार्थरूप से अपनी अनंत बहुरूपता के कारण ये एक दूसरे से संयोजन करके असीमित पिंड बनाते हैं । जब पिंड ( शरीर ) विघटित होता या गल जाता है, तो परमाणु मुक्त हो जाते हैं और ये पिंडों के नए संयोजनों के लिए पुनः तैयार हो जाते हैं । परमाणु अंतरिक्ष में गति करते रहते हैं और अकस्मात रूप से एक दूसरे से उलझ जाते हैं तथा एक साथ मिलकर नई रचना करने के लिए स्वतंत्र होते हैं । 

          परमाणुवादियों के अनुसार, सिर्फ परमाणु और शून्य ही विद्यमान है । ब्रहमांड की उनकी व्याख्या में 'आत्मा' और 'बल' की अधिक भूमिका नहीं है । 'आत्मा' मस्तिष्क से जुड़ी है । जब मस्तिष्क विघटित हो जाता है, तो चेतना भी गुम हो जाती है और तब विशेष प्रकार के चिकने गोल आकार के आत्मा के परमाणु सभी दिशाओं में फैल जाते हैं । उनका मानना था कि परमाणु के अतिरिक्त और कुछ भी ब्रहमांड को प्रभावित नहीं कर सकता है । इन्हें कुछ अन्य नए पिंडों द्वारा प्राप्त किया जा सकता है । इसका अर्थ है कि मनुष्यों में शाश्वत आत्मा जैसा कुछ नहीं होता है । इसी कारण से उन्हें भौतिकवादी कहा जाता था, क्योंकि वह भौतिक वस्तुओं को ही यर्थाथ मानते थे । प्रकृति में सभी वस्तुऐं काफी यांत्रिक रूप से होती हैं । इसका यह अर्थ नहीं है कि वस्तुऐं बेतरतीब रूप से होती हैं । उनके अनुसार आवश्यकता के अपरिहार्य नियम होते हैं । एक प्राकृतिक कारक जो सभी में नैसर्गिक रूप से है, प्रकृति में घटनाओं के घटित होने का मार्गदर्शन करता है । अतः ब्रहमांड में सभी प्रक्रियाएं यान्त्रिक होते हुए भी प्राकृतिक है । 

ज्ञान का सिद्धान्त 

           परमाणुवादी मत के अनुसार ज्ञान का सिद्धान्त इन्द्रियों के अनुभवों से प्राप्त ज्ञान से विकसित हुआ है । इन्द्रिय-ज्ञान निर्गम की क्रिया द्वारा अनुभूत पिंड के समान होता है । सभी पिंड वायु के द्वारा अपने बिंब को भेजते हैं । बिंब, जो शरीर द्वारा संचारित होता है, प्रभावित वस्तु को बहुत कुछ अपने समान रूपांतरित कर लेता है । अंत में, यह किसी मनुष्य या सजीव की इन्द्रियों तक पहुंच जाता है । यदि संचरण की प्रक्रिया में अन्य वस्तुओं से निकलने वाले बिंब, अन्य बिंबों के मार्ग में बाधा पहुंचाते हैं, तो भ्रम उत्पन्न होता है । यदि ये बिना किसी बाधा के आगे बढ़ते हैं, तो सत्यात्मक ज्ञान प्राप्त होता है । अर्थात यह सीधे संवेदन अंगों और अंततः आत्मा पर सीधा आघात करते हैं । 

         संवेदन के गुण ( रंग, ध्वनि, स्वाद, गंध और स्पर्श ) स्वयं वस्तुओं में नहीं होते हैं । यह महज हमारी इन्द्रियों पर परमाणुओं के संयोजन का प्रभाव है । परमाणुओं में मूल रूप से आकार ओर विस्तार के अतिरिक्त अन्य कोई गुण नहीं होते हैं । अतः इन्द्रियों से प्राप्त वस्तुओं का वास्तविक ज्ञान प्रदान नहीं करता है । यह केवल यह दर्शाता है कि वस्तुएं किस प्रकार मनुष्यों को प्रभावित करती हैं । यूनानी परमाणुवादियों ने पहले ही प्राथमिक गुणों ( आकार, अभेद्यता, इत्यादि ) और द्वितीयक गुणों ( रंग, ध्वनि, गंध आदि ) के बीच अन्तर कर दिया था । यह भेद आज भी आधुनिक दर्शन में मुख्य चर्चा विषय है । 

          हम परमाणु के बारे में सिर्फ सोच ही सकते हैं । हम उन्हें उनके वास्तविक रूप में नहीं देख सकते हैं । इन्द्रिय-ज्ञान से हमें स्पष्ट ज्ञान प्राप्त नहीं होता है । विचार, जो हमारे इन्द्रिय प्रत्यक्षों और प्रतीतियों को बेधकर परमाणु तक पहुंचता है, ही सही ज्ञान है । डेमोक्रीटस एक बुद्धवादी दार्शनिक थे । बुद्धिपरक विचार की शुरूआत वहां से होती है , जहां इन्द्रिज्ञान समाप्त होता है । यह जानने का विशुद्ध तरीका है । तर्क आत्मा का उच्चतम कार्य है । डेमोक्रीटस के लिए आत्मा और तर्क एक समान है । 

नैतिक सिद्धान्त 

         डेमोक्रीटस आत्मा को मानव कल्याण का केन्द्रबिंदु मानते थे । उनके आत्मप्रसाद ( eudaimonia ) के सिद्धान्त में 'अच्छे अस्तित्व' ( eu-esto ) और 'अच्छी भावना' ( eu-thumise ) की धारणा दोनों सम्मिलित थी । पेस गोसलिंग और टेलर का मानना है कि डेमोक्रीटस व्यवस्थित रूप में नैतिक सिद्धान्त को प्रस्तुत करने वाले पहले यूनानी दार्शनिक थे । डेमोक्रीटस के नैतिक सिद्धान्त में क्रम-व्यवस्थापन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण चरण, इस व्यर्थ नैतिक सोच में बदलाव था कि प्रत्येक व्यक्ति खुश, प्रसन्न और समस्याओं से मुक्त रहना चाहता है । 

         नीतिशास्त्र पर डेमोक्रीटस के लेखनों की सूची में एक निबन्ध पेरी यूथाइमियास ( Perieuthymias ) मिला है जिसके सिर्फ एक या दो वाक्य ही बचे हैं । बाद के डोक्सोग्राफर्स ( ईश्वर का महिमामंडन करने वाले ) ने सुखशांतिवादी सिद्धान्तों ( eudaimonistic theories ) की रूपरेखा की कल्पना करके हमें बताया है कि डेमोक्रीटस ने सुख-शान्ति ( eythymia ) को जीवन का लक्ष्य माना है ।   

         डेमोक्रीटस नैतिक जीवन में तर्क की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हैं । मानव के समस्त आचरण का अंत समाज का और अंततः मनुष्य का कल्याण है । कल्याण का अर्थ सिर्फ बौद्धिक सन्तुष्टि नहीं, बल्कि इंद्रियों का सुख भी हैं । हम डेमोक्रीटस की शिक्षाओं में सुखवाद के बाजों को देख सकते हैं । वास्तविक प्रसन्नता मनुष्य के जीवन का परम लक्ष्य है । यह संतुष्टि या सुख की भीतरी अवस्था है, जो आत्मा की शांति, मेल और निर्भयता पर निर्भर करती है । यह प्रसन्नता, संपत्ति या भौतिक वस्तुओं से नहीं आती है और न ही शरीर के सुखों से मिलती है । इसके लिए थोड़ा कष्ट उठाना पड़ता है और इसके लिए आनंद की पुनरावृत्ति और संयम की आवश्यकता होती है । अपकी इच्छाएं जितनी कम होगी आपको उतनी ही कम निराशा होगी । सभी सद्गुण तभी मूल्यवान है, यदि ये प्रसन्नता पैदा करने में सहायक हैं । शत्रुता, ईर्ष्या और मन की कड़वाहट वैमनस्य पैदा करते हैं और ये सभी को नष्ट कर देते हैं । सही काम करने के लिए कर्तव्य का बोध होना चाहिए । किसी भी नैतिक आचरण को सजा के डर से नहीं करना चाहिए । हमें राष्ट्र की भी सेवा करनी चाहिए क्योंकि यदि राष्ट्र में शांति होगी तो राष्ट्र के सभी क्षेत्रों में वृद्धि होगी । यदि राष्ट्र के शासन में भ्रष्टाचार हो तो वहां कोई कानून या व्यवस्था नहीं होगी बल्कि सिर्फ अव्यवस्था ही होगी । 

डेमोक्रीटस का ईश्वर सिद्धान्त 

          डेमोक्रीटस के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व है । ईश्वर परमाणुओं से बना है । ईश्वर भी मनुष्य की भांति मरते हैं, लेकिन उनका जीवन काल मनुष्यों की अपेक्षा अधिक होता है । वे मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली होते हैं और उनमें उच्चस्तर की तर्कबुद्धि पाई जाती है । ईश्वर के बारे में मनुष्यों को सपनों में पता चलता है । वे मनुष्यों के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं, इसलिए मनुष्य को उनसे डरना नहीं चाहिए । अन्य सभी चीजों की तरह ही ईश्वर भी परमाणुओं की गति से संचालित होते हैं । मनुष्यों को अच्छे कार्यों को करने और उन पर चिंतन के लिए मानसिक शक्ति प्राप्त करनी चाहिए । 

डेमोक्रीटस ( Democritus ) के प्रमुख दार्शनिक कथन 

  • परमाणु मौलिक, अविभाज्य, अतीन्द्रिय, नित्य, उत्पत्ति-विनाश-रहित जड़ तत्व हैं । 
  • गति परमाणुओं का धर्म है । 
  • परमाणुओं में केवल संख्या, परिमाण और आकार का भेद है; अन्य गुणों का भेद उनमें नहीं है । 
  • परमाणु आकाश में स्थित हैं और एक दूसरे से अलग हैं । 
  • सृष्टि की उत्पत्ति का अर्थ है - परमाणुओं का परस्पर संयोग और विनाश का अर्थ है - परमाणुओं का परस्पर वियोग । 
  • आत्मा या विज्ञान जैसा कोई अलग तत्व नहीं है, वह भी परमाणुओं के विशिष्ट संयोग से उत्पन्न होता है । 
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डेमोक्रीटस ( Democritus ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

डेमोक्रीटस ( Democritus ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

डेमोक्रीटस ( Democritus ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन460 ई.पू. से 370 ई.पू. तक 

प्रमुख दार्शनिक विचार ब्रहमांड की रचना एक प्रकार के छोटे अदृश्य कणों ( परमाणु ) से हुई है ।

प्रमुख उपाधिपरमाणुवादी मत के संस्थापक हैं ।

प्रमुख कथनपरमाणुओं में स्वतः गति होती है । ये यांत्रिक नियमों के कारण गतिशील है । 


          डेमोक्रीटस परमाणुवादी मत के संस्थापक हैं । एबडेरा के डेमोक्रीटस का जन्म 460 ई.पू. के आस पास थ्रेस के तट पर स्थित एबडेरा के व्यावसायिक शहर में हुआ था और 370 ई.पू. में उनकी मृत्यु हुई । उन्होंने बताया कि ब्रहमांड की रचना एक प्रकार के छोटे अदृश्य कणों से हुई है । शाश्वतता और अपरिवर्तनीयता इन कणों की विशेषताएं हैं । उन्होंने इन छोटी इकाईयों को 'परमाणु' अर्थात अविभाज्य कण नाम दिया । 

        डिमॉक्रिटस के परमाणु मौलिक, अविभाज्य, अतीन्द्रिय, नित्य, उत्पत्ति-विनाश-रहित जड़ तत्व हैं । गति उनका धर्म है । उनमें केवल संख्या, परिमाण और आकार का भेद है, अन्य गुणों का भेद उनमें नहीं है । वे आकाश में स्थित हैं और एक दूसरे से अलग हैं । सृष्टि की उत्पत्ति का अर्थ है - उनका परस्पर संयोग और विनाश का अर्थ है - उनका परस्पर वियोग । आत्मा या विज्ञान कोई अलग तत्व नहीं है, वह भी इन परमाणुओं के विशिष्ट संयोग से उत्पन्न होता है । 

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Sunday, May 15, 2022

हेराक्लाइटस ( Heraclitus ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- 'सम्भूति का सिद्धान्त' का प्रतिपादन किसके द्वारा किया गया ?

  1. पाइथागोरस के द्वारा 
  2. डेमोक्रेट्स के द्वारा 
  3. हेराक्लेट्स के द्वारा 
  4. इनमें से कोई नहीं 

2- हेराक्लेट्स के अनुसार समस्त परिवर्तन का आधार क्या है ?

  1. बुद्धि 
  2. अग्नि 
  3. द्रव्य 
  4. वायु 

3- हेराक्लेट्स की दार्शनिक मान्यताएं किस पर आधारित थी ?

  1. बुद्धिवाद पर 
  2. सापेक्षतावाद पर 
  3. 1 और 2 दोनों पर 
  4. इनमें से कोई नहीं 

4- हेराक्लेट्स के अनुसार एक भौतिक तत्व का दूसरे में परिवर्तन होता है 

  1. निषेध के द्वारा 
  2. समन्वय के द्वारा 
  3. सामंजस्य के द्वारा 
  4. बुद्धि के द्वारा 

5- हेराक्लेट्स के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए -

  1. ब्रह्माण्ड का मूल द्रव्य अग्नि है । 
  2. सत् निरंतर परिवर्तनशील है । 
  3. सत् अपरिवर्तनशील है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 3 
  4. 1 और 2 

6- निम्नलिखित में से किस प्रारम्भिक दार्शनिक ने आभास और सत् को सतत परिवर्तन के आभासित स्थायित्व और निरन्तर परिवर्तन की प्रच्छन्न वास्तविकता में अन्तर के रूप में निरूपित किया ?

  1. हेराक्लेट्स
  2. एनेक्जागोरस 
  3. एम्पेडोक्लीज 
  4. डेमोक्रेट्स 

7- हेराक्लेट्स के दृष्टिकोण से निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए और सही कूट का चयन कीजिए - 

  1. हेराक्लेट्स ने माना कि संसार हमेशा से अस्तित्व में था और इसलिए विश्वोत्पत्ति को अस्वीकार किया । 
  2. संसार और इसके घटक निरंतर प्रवाहमान है । 
  3. उन्होंने तर्क दिया कि ऊर्ध्वगामी मार्ग अधोगामी मार्ग के समान है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. 1 और 2 
  3. 1, 2 और 3 
  4. 1 और 3 

8- निम्नलिखित कथनों में से हेराक्लेट्स के सन्दर्भ में कौन-से सही है ?

  1. हेराक्लेट्स ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को अस्वीकार किया । 
  2. विश्व निरन्तर प्रवाह में है । 
  3. हेराक्लेट्स विरूद्धों की एकता में विश्वास नहीं करता है । 
कूट 
  1. केवल 1 
  2. 1 और 2 
  3. 1, 2 और 3 
  4. 3 और 1 

9- हेराक्लेट्स के सम्भूति सिद्धान्त के अनुसार -

  1. परिवर्तन ही सत् है । 
  2. स्थिरता और अभेद असत् है 
  3. जगत की प्रत्येक वस्तु अस्थिर है 
  4. उपरोक्त सभी 
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हेराक्लाइटस ( Heraclitus ) का दर्शन


हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) का दर्शन 

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) का दर्शन 

निरंतर प्रवाह 

       हेरक्लाइटस को उनकी इस ब्रहमांडीय दर्शन की उक्ति के लिए जाना जाता है कि सभी चीजें निरंतर गतिशील या परिवर्तनीय हैं । यह प्रकृति का सबसे मौलिक सिद्धान्त है । उन्होंने प्रकृति की अनुभूति को महत्व दिया । उन्होंने कहा कि नदी के समान प्रत्येक वस्तु प्रवाहमान है । वह कहते है कि कोई भी व्यक्ति एक ही नदी में दो बार प्रवेश नहीं कर सकता हैं और न ही कोई व्यक्ति समान अवस्था में समान नश्वर पदार्थ को दो बार स्पर्श कर सकता हैं"। जब कोई व्यक्ति नदी में दूसरी बार उतरता है, तो न तो वह व्यक्ति स्वयं और न ही नदी समान होती है । व्यक्ति पहले ही परिवर्तित हो चुका होता है, क्योंकि व्यक्ति के शरीर की कोशिकाएं नई बनी होती है । व्यक्ति पहले से ही सम्भवन की प्रक्रिया में होता है और नदी में जल निरंतर प्रवाहित होता रहता है, क्योंकि प्रवाहीत जल ही नदी को नदी बनाता है । अतः जहां व्यक्ति उसमें प्रवेश करता है वह उसी क्षण बदल जाती है । चूंकि उनकी संपूर्ण दार्शनिक अवधारणा सत् के परिवर्तन के बोध से शासित है, इसलिए उन्हें "क्राईंग फिलोसोफर" के रूप में भी जाना जाता है । 

अग्नि और सार्वभौमिक परिवर्तन 

         हेराक्लाइटस के अनुसार जगत का सबसे गतिशील पदार्थ अग्नि है । अग्नि सतत् चलायमान है । यह कभी विश्राम नहीं करती है । उन्होंने इसे वाष्प या प्राण नाम दिया । प्राण जीव का मुख्य जैविक घटक और आत्मा का सार है । कुछ विद्वानों का मानना है कि यह अग्नि एक निरंतर क्रिया या प्रक्रिया के लिए सिर्फ एक मूर्त भौतिक प्रतीक मात्र है । यह स्वयं में कोई पदार्थ नहीं है, बल्कि यह स्वयं सभी पदार्थों को खंडित करती है । यह उस सिद्धान्त को इंगित करता है कि परिवर्तन या रूपान्त्रण निरंतर होते रहते हैं केवल अग्नि ही इन स्थितियों को संतुष्ट कर सकती है । इसमें ऊपर की ओर का परिवर्तन नीचे की ओर के परिवर्तन के समान होता है । अग्नि पहले जल में फिर पृथ्वी में परिवर्तित होती है । पृथ्वी, पुनः जल और अग्नि में बदल जाती है । सभी वस्तुओं की अग्नि से और अग्नि की सभी अन्य वस्तुओं से अदला बदली होती है । जिन वस्तुओं के बारे में हम सोचते हैं कि वे स्थायी हैं, स्थायी नहीं हैं । हम जो नहीं देख पाते हैं वह है, उनमें होने वाली गति । वह कहते हैं कि "जो ठंडा है वह गर्म हो जाता है, जो गर्म है वह ठंडा हो जाता है, गीला सूख जाता है और सूखा गीला हो जाता है"। “जगत का यह क्रम सभी के लिए समान नहीं है, लेकिन यह सदैव विद्यमान था और अनन्त काल तक सजीव-अग्नि के रूप में विद्यमान रहेगा । वह अग्नि जो समय पर प्रज्वलित हो जाती है और समय से बुझ जाती है" । जगत् एक सतत् चलायमान अग्नि है । 

विपरीतों का संगठन 

         विश्व विपरीतों से बना है । विपरीतों की उपस्थिति विश्व को वैसा बनाती है, जैसा वह है । शुभ और अशुभ की अवधारणा का जगत् के क्रम में अपना स्थान है । यदि युद्ध नहीं होगा तो हम शांति कैसे अर्जित करेंगे ? युद्ध में शांति होती है । निर्माण विध्वंस के लिए होता है । जन्म मृत्यु के लिए होता है । निर्बल स्वास्थ्य की आवश्यकता की मांग करता है । यदि गर्मियां न होती तो मानसून की क्या उपयोगिता होती ? 

         हेराक्लाइटस की शिक्षा की नवीनता विविधता में एकता और एकता में भिन्नता की अवधारणा में है । वह 'एक' (सत्) की उपस्थिति के लिए विपरीतों को अनिवार्य मानते हैं । तथ्य यह 'है’ कि 'एक' सिर्फ विपरीतों की उपथिति में होता है । यह विपरीत की उपस्थिति 'एक' की एकता के लिए अनिवार्य है । हिराक्लाइटस के लिए सत् एक है , लेकिन साथ ही यह अनेक भी है । ऐसा संयोगवश नहीं, बल्कि अनिवार्य रूप से है । यह सत् का अनिवार्य गुण है कि इसे एक ही समय पर एक और अनेक होना चाहिए । 

          हिराक्लाइटस की शिक्षा अनेक में विधमान 'एक' ( सत् ) के अधिक समीप है । इसकी पहचान भिन्नता में है । उन्होंने स्वीकार किया कि सभी चीजें एक हैं और एकता सिर्फ विपरीतों के संघर्ष से ही फलीभूत होती है । विपरीतों को 'एक' में संगठित करने का एक सिद्धान्त है । ब्रहमांड का अद्वैतवादी सिद्धान्त लोगोस के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है तर्क बुद्धि । हेराक्लाइटस की तर्क बुद्धि 'सार्वभौमिक तर्क बुद्धि' है । यह ब्रहमाण्ड में पाई जाने वाली सभी वस्तुओं का मार्गदर्शन करती है । सतत् जटिल परिवर्तनों में यह सार्वभौमिक तर्क बुद्धि ब्रहमांड में एकता स्थापना का कार्य करती है । किसी एक का सृजन दूसरे का विध्वसं है और पुनः किसी वस्तु का विध्वंस किसी और के सृजन की शुरूआत है । प्रत्येक वस्तु अपने विपरीत में परिवर्तित होती रहती है । इस जगत् में कुछ भी अपने गुणों में स्थायी नहीं रहता है । प्रत्येक वस्तु है और नहीं भी है । इसलिए प्रत्येक वस्तु स्वयं में विपरीतों को जोड़े रखती है । उदाहरण के लिए, संगीत में मेल ऊंचे और नीचे सुरों के समन्वय से होता है, जिसका अर्थ होता है विपरीतों का योग । इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् विपरीतों का संयोजन है । "युद्ध सबका जनक और सबका राजा है" क्योंकि, शांति में युद्ध समाहित है । यदि हम लड़ेंगे नहीं तो हमें शांति नहीं मिलेगी । इसलिए शांति युद्ध में शामिल हैं और युद्ध से शांति आती है । 

नैतिक सिद्धान्त 

         हेराक्लाइटस के द्वारा लिखे हुए अंशों से ज्ञात होता हैं कि प्रक्रिया या सम्भवन में एक सतत् रूप से पाया जाने वाला बौद्धिक आदर्श ( लोगोस ) है । हेराक्लाइटस के अनुसार, "नैतिक होने का अर्थ ऐसा बौद्धिक जीवन जीना है तर्क की आज्ञा का पालन करना है जो हम सभी के लिए समान है, पूरे जगत् के लिए समान है ।" मनुष्य ने स्वयं को अपनी इन्द्रियों के सुपुर्द कर दिया है और वह ऐसे जीता है मानो वह अपस्मारी ( मिर्गी ) से ग्रसित है । विपरीतों, जैसे प्रेम और घृणा के बीच संघर्ष का समाधान मापन प्रक्रिया ( मेट्रोन ) के अनुसार करना चाहिए । 

          हेराक्लाइटस पर अनुसंधान दर्शाते हैं कि उनके नैतिक मत उनकी दार्शनिक शिक्षा में प्राथमिक महत्व रखते हैं । नैतिकता का अर्थ कानून के लिए सम्मान, आत्म अनुशासन, मनोभावों पर नियंत्रण रखना है और नैतिक होने का अर्थ स्वयं को बौद्धिक सिद्धान्तों से नियंत्रित करना है । उनके लेखन से निम्नलिखित उद्धरण उनके नैतिकता सम्बंधि उच्च आदर्शवाद को प्रदर्शित करते हैं । "चरित्र मनुष्य का दिव्य रक्षक है", "मनोभावों को जीतना कठिन है, क्योंकि व्यक्ति जो भी ( अनैतिक ) प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे आत्मा की कीमत पर प्राप्त करता है", " मेरे लिए एक ( चरित्रवान ) व्यक्ति दस हजार ( चरित्रहीनों ) से बेहतर है, यदि वह श्रेष्ठ है" । यदि हम मनुष्य के मन में झांकते हैं उसकी नैतिक स्थिति अच्छी नहीं पाते है । यहां हमारी शुभ की अवधारणा की समृद्धि में एक और तत्व जुड़ गया है । क्या अरस्तू अपने सद्गुण के सिद्धान्त के अनुसार व्यक्तियों के चरित्र निर्धारण की प्रक्रिया में हेराक्लाइटस के इस सिद्धांत से अत्यधिक प्रभावित नहीं जान पड़ते ? अरस्तू कहते हैं कि अच्छे कार्य अच्छे नैतिक चरित्र की स्थायी अवस्था से स्फुटित होते हैं । "अनेक ( चरित्रहीनों ) का कोई महत्व नहीं होता है, सिर्फ कुछ ( चरित्रवान ) ही मूल्यवान होते हैं" । हेराक्लाइटस सत्य की प्राप्ति में इन्द्रिय ज्ञान के महत्व को नहीं स्वीकारते हैं । उनकी नैतिक अवधारणा बाह्य से आन्तरिक और आंतरिक से दैवीय के क्रम में स्फूटित होती है । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितनी यात्रा ( खोज ) करते हैं । भले ही आप प्रत्येक सड़क ( राह ) से गुजर ले ( अर्थात सभी सम्भव ढ़ंगों और योग्यताओं से अन्वेषण कर ले ) आप कभी भी आत्मा की सीमाओं को नहीं छू सकते हैं, क्योंकि इसमें प्रबल लोगोस पाया जाता है" । 

           हेराक्लाइटस के अनुसार मनुष्य को बौद्धिक गुणों से युक्त होना चाहिए । उसे तात्कालिक मूर्त आंकड़ों से स्वयं को विमुख करके उनमें उपस्थित सार भूत एकता को प्राप्त करना चाहिए । इस एकता के स्तर पर व्यवहारिक अनुभव सिद्धांतों में समाहित हो जाते हैं । हेराक्लाइटस की यह संवृत्तिवादी दृष्टि व्यक्ति को स्वयं के अन्वेषण की ओर लेकर जाती है । वह वास्तव में सत्य अन्वेषी थे । इसके माध्यम से वे बौद्धिक चरित्र ( व्यक्ति ) में बौद्धिक प्रज्ञा को प्राप्त करने में सफल हुए । 

लोगोस की अवधारणा 

           हेराक्लाइटस के लिए शब्द लोगोस का एक निश्चित दार्शनिक अर्थ है । दार्शनिक महत्व ब्रह्मांड को एकीकृत करने के उसके मूल्य में निहित है । लोगोस विरोधों को समन्वय के रूप में अथवा 'विरोधों के सहअस्तित्व" या संतुलन के रूप में ले आता है । हेराक्लाइटस के सूत्रों में अवस्थित विभिन्नता व्याख्याओं की विभिन्नता को भी इंगित करती है । इन विभिन्नताओं को मूलतः समूहों में बांटा जा सकता है । वस्तुतः लोगोस विरोधों से खाली नहीं है, बल्कि उनका अंतर्भूत नियम है । इस सम्बंध में गूथरी ने कहा है कि विरोधों के समन्वय में तीन अभिकथन होते हैं । ये हैं – 

  1. प्रत्येक वस्तु विरोधों से परिपूर्ण है 
  2. विरोधों में समरूपता होती हैं 
  3. संघर्ष उनका रचनात्मक बल और प्रधान निदेशक होता है । 

निष्कर्ष के रूप में हेराक्लाइटस की शिक्षा त्रिगुणात्मक हैं- भाषाई, गूढविज्ञानी और तात्विक । लोगोस स्वयं को प्रदर्शित करता है । यह स्वयं सोचता है और यह अस्तित्वमान है । यद्यपि ईश्वर, अग्नि और लोगोस को त्रिएक के रूप में देखना उचित नहीं है । हेराक्लाइटस प्रबुद्ध ईश्वर के रूप में एकत्व को प्रमुखता देते हैं । ईश्वर विश्वव्यापी बुद्धि है । यह एक सर्व कानून है जो सभी वस्तुओं में सर्वव्यापी है और सभी वस्तुओं को एकता में बांधकर सार्वभौमिक नियम के अनुसार सतत् परिवर्तन का निर्धारण करता है । व्यक्तिक बुद्धि इस विश्वव्यापी बुद्धि में क्षणिक तत्व है । इसलिए मनुष्य को अपरिवर्तनीय नियम की सत्ता के अनुसार जीने के लिए संघर्ष करना पड़ता है । मनुष्य की बुद्धि और चेतना जो अग्निमय तत्व हैं, मूल्यवान तत्व हैं । शुद्ध अग्नि के बिना शरीर मूल्यहीन है ।

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) के प्रमुख दार्शनिक कथन 

  • जगत् एक सतत् चलायमान अग्नि है ।
  • युद्ध सबका जनक और सबका राजा है । 
  • चरित्र मनुष्य का दिव्य रक्षक है । 
  • मेरे लिए एक ( चरित्रवान ) व्यक्ति दस हजार ( चरित्रहीनों ) से बेहतर है, यदि वह श्रेष्ठ है । 
  • अनेक ( चरित्रहीनों ) का कोई महत्व नहीं होता है, सिर्फ कुछ ( चरित्रवान ) ही मूल्यवान होते हैं । 
  • नैतिक होने का अर्थ ऐसा बौद्धिक जीवन जीना है तर्क की आज्ञा का पालन करना है जो हम सभी के लिए समान है, पूरे जगत् के लिए समान है ।
  • मनोभावों को जीतना कठिन है, क्योंकि व्यक्ति जो भी ( अनैतिक ) प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे आत्मा की कीमत पर प्राप्त करता है । 
  • मेरा दर्शन इने-गिने सुयोग्य व्यक्तियों के लिए ही है, क्योंकि गधों को घास चाहिए, स्वर्ण नहीं । 
  • अखंड गति, निरन्तर परिवर्तन, अविच्छिन प्रवाह, अटूट धारा - यही संसार का नियम है । 
  • विरोध का अभाव मृत्यु है । विरोध या निषेध के बिना गति सम्भव नहीं । 
  • जीवन अग्नि है, सुषुप्ति जल है और मृत्यु पृथ्वी है । इसलिए अग्नि, जल और पृथ्वी - यह अवनत मार्ग है तथा पृथ्वी, जल और अग्नि - यह उन्नत मार्ग है ।
  

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हेराक्लाइटस ( Heraclitus ) का जीवन-परिचय एवं उपलब्धियां

 

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) का जीवन-परिचय एवं उपलब्धियां 

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) का जीवन-परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 536 ई० पू० से - 470 ई० पू० 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "सृष्टि का मूल तत्व अग्नि या तेजस्तत्व है"  

प्रमुख उपाधि - विपरीत सम्भूति का सिद्धान्त 

प्रमुख कथन - "मेरा दर्शन इने-गिने सुयोग्य व्यक्तियों के लिए ही है, क्योंकि गधों को घास चाहिए, स्वर्ण नहीं"


         हेराक्लाइटस का जन्म ईफेसस में हुआ था, वे एक संभ्रात परिवार के पुत्र थे और ईसा से पूर्व छठी शताब्दी के अन्त और पाँचवी शताब्दी के आरम्भ में पैदा हुए थे । इनका जन्म भगवान बुद्ध के अन्तिम दिनों में हुआ था । ये राजकुल में पैदा हुए और अपने छोटे भाई को उत्ताधिकारी घोषित कर विरक्त हो गए थे । इन्होंने प्रजातन्त्र का सदैव पूरजोर ढंग से विरोध किया । उनके लेखन के लगभग सौ अंश मौजूद हैं । इनमें अधिकतर ब्रहमाण्ड एवं आत्मा से सम्बंधित सूक्तियां और पहेलियां हैं । 

         हेराक्लाइटस क्षणभंगवादी थे । इनका मानना था कि संसार में कुछ भी नित्य नहीं, सब अनित्य और क्षणिक है । ये अग्नि को परम तत्व के रूप में स्वीकार करते थे और अग्नि को ही सब परिवर्तन का आधार मानते थे । ये कहते थे कि अग्नि और परिणाम दोनों एक है। agni में अखंड गति, निरन्तर परिवर्तन, अविच्छिन प्रवाह और अटूट धारा है और यही संसार का नियम है"। 

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