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| सोफिस्ट ( Sophist ) सम्प्रदाय |
सोफिस्ट ( Sophist ) सम्प्रदाय
सोफिस्ट आंदोलन 5 वीं शताब्दी ई. पू. में, सुकरात के काल के अविर्भाव
से कुछ ही पहले शुरू हुआ । जीनोफोन, जो कि चौथी शताब्दी ई. पू.
के एक इतिहासकार थे, ने सोफिस्टों को यायावर शिक्षकों के रूप
में वर्णित किया और उन्हें धन के बदले में बुद्धि को बेचने वाले बताया । इस प्रकार,
सोफिस्ट व्यावसायिक शिक्षक थे, जो एक से दूसरे
शहर में घूमते हुए लोगों को, विशेषरूप से युवाओं को शिक्षा
देते थे । उन्हें उनके कार्य के लिए काफी धन मिलता था ।
सोफिस्ट स्वयं को बुद्धि और सद्गुणों का
शिक्षक कहते थे । यद्यपि, इन शब्दों का सोफिस्टों के
व्यवहारों में मूल अर्थ फलीभूत नहीं होता है । इन शब्दों का अर्थ उनके लिये मात्र
दैनिक जीवन के व्यवहारिक मामलों में प्राप्त दक्षता या कौशल से था । उनका दावा था
कि यही कौशलता या दक्षता व्यक्तियों को सफल बनाती है । उनके अनुसार भौतिक संपदा को
अर्जित करने और उसका सुख भोगने के साथ ही समाज में सत्ता और प्रभावशाली स्थान
अर्जित करना ही सफलता है ।
बौद्धिक संदर्भ
सोफिस्टों के ज्ञानमीमांसात्मक और नैतिक
संशयवाद तथा सापेक्षवाद ने सुकरात पूर्व दार्शनिकों के अमूर्त और आध्यात्मिक दर्शन
के विरूद्ध एक प्रतिक्रिया प्रदर्शित की थी । आरंभिक यूनानी दार्शनिक मुख्य रूप से
ब्रहमांड के मूल तत्व की खोज में दिलचस्पी रखते थे । उनकी दार्शनिक व्याख्याऐं एक दूसरे
से पूर्णतः भिन्न थी । वास्तव में, सोफिस्टों
का ध्यान आरंभिक यूनानी दार्शनिकों के मतों में पाई गई भिन्नताओं के कारण ही
प्राकृतिक समस्याओं से हटकर मनुष्य की समस्याओं की ओर आकर्षित हुआ । जगत् के
विरोधी सिद्धान्तों की चकरा देने वाली दार्शनिक व्याख्याओं को देखते हुए सोफिस्ट
इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि प्रकृति केन्द्रित दार्शनिकों के बीच असहमति मानव तर्क
की नैसर्गिक सीमाओं के कारण है । यद्यपि सोफिस्टों ने मानव बुद्धि को आलोचना के
लिए मुक्त रखा परन्तु इसके फलस्वरूप वे पूर्णतः सापेक्षतावादी निष्कर्ष पर पहुंचे
। उन्होंने ज्ञान की समस्त यथार्थता को नकार दिया और इस प्रकार संशयवाद के लिए राह
बनाई ।
सामाजिक राजनैतिक संदर्भ
पर्सिया के युद्धों ( 500-449 ई. पू. ) के बाद यूनान में राजनैतिक जीवन की गतिविधियां बढ़ गई और ऐसा
विशेषरूप से प्रजातांत्रिक एथेन्स में हुआ, जो इस क्षेत्र
में सघन राजनैतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रियाकलाप का
केन्द्र बन गया था । स्वतंत्र नागरिकों से राष्ट्र के मामलों में सक्रिय भूमिका
निभाने की उम्मीद की जाती थी और इसलिए उन्हें अधिक राजनैतिक जिम्मेदारियाँ निभाने
के लिए प्रशिक्षित किया जाता था । राजनीति को व्यवसाय बनाने के लिए साहित्यशास्त्र
और भाषण कला में महारत होना काफी महत्व रखता था । वास्तव में सोफिस्ट भाषण को एक
सशक्त हथियार समझते थे, जिससे वक्ता अपने श्रोताओं को
सम्मोहित करके उन्हें अपने विचारों को स्वीकार करने के लिए प्रेरित कर सकता था ।
यूनानी प्रजातंत्र में धन मुकदमा जीतकर कमाया जा सकता था और यह माना जाता था कि
सोफिस्ट मुकदमा जीतने के सही तरीकों को सिखाने में सक्षम हैं । युवाओं को राजनैतिक
तार्किक कौशलों की शिक्षा देकर सोफिस्टों ने बुद्धि और क्षमता के एक नए अभिजात्य
वर्ग की रचना करने में सहायता की । इस बात पर स्वाभाविक रूप से उसे प्राचीन अभिजात्य
वर्ग ने अप्रसन्नता जताई, जो ज्ञान और आचरण की पारंपरिक
बौद्धिकता के साथ जीते थे ।
सोफिस्ट शिक्षाए
सोफिस्टों का सरोकार, ब्रहमांड की संरचना अथवा सत् के मूल घटकों की अपेक्षा, ज्ञान और आचरण की समस्याओं का पता लगाने से था । प्राचीन दार्शनिकों के
साथ उनके परिचय ने उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचा दिया कि बाह्य जगत के वास्तविक
ज्ञान को प्राप्त करना असंभव है और मानव बुद्धि ब्रहमांड की पहेली को नहीं सुलझा
सकती । इसलिए मानव ज्ञान की मूल प्रकृति और नैतिक आचरण के व्यवहारिक नियमों की
जाँच पड़ताल अधिक प्रासंगिक थी । अतः सोफिस्ट दर्शन का मुख्य योगदान, नीतिशास्त्र और ज्ञानशास्त्र के मूल प्रश्नों के साथ-साथ तार्किक जाँच
पड़ताल के उचित तरीकों और लक्ष्य से संबन्धित था सोफिस्टों ने प्रकृति की समस्याओं
से मनुष्य की समस्याओं तक दार्शनिक दिलचस्पी के रूप में प्रमुख बदलाव प्रदर्शित
किया, यद्यपि इस बदलाव को सुकरात के दर्शन में सबसे अच्छी
तरह से देखा जा सकता है ।
ज्ञानमीमांसा
सुकरात के पहले के दार्शनिकों ने सत् की
प्रकृति का पता लगाते समय सत्य की प्राप्ति में मानवबुद्धि की क्षमता को विशेष
महत्व नहीं दिया था । उन्होंने कभी भी बुद्धि की आलोचना करने की बात नहीं सोची थी
। इसी पूर्वानुमान के कारण सोफिस्टों ने प्रश्न किया किं ये महान दार्शनिक सत् की
प्रकृति के बारे में न केवल विपरीत बल्कि परस्पर विरोधाभासी निष्कर्षों पर क्यों
और कैसे पहुंचे, जबकि वे सभी एक ही वस्तु की खोज कर रहे थे
? इसके उत्तर में सोफिस्टों द्वारा यह निष्कर्ष निकाला गया
कि ज्ञान विशेष रूप से ज्ञाता पर निर्भर करता है । ज्ञाता को जो सत्य प्रतीत होता
है वह उसके लिए सत्य होता है । कोई वस्तुनिष्ठ सत्य नहीं होता, बल्कि सिर्फ व्यक्तिनिष्ठ मत होता है । इस सम्बंध में प्रोटागोरस का
प्रसिद्ध कथन, “मनुष्य सभी वस्तुओं का मापदण्ड है”, मनुष्य के सहजबुद्धि के निर्णयों के पक्ष में प्रकृतिवादी दार्शनिकों के
विरोधाभासी निष्कर्षों का परित्याग करता है । इस प्रकार का मत, ज्ञान के मामलों में, व्यक्ति विशेष को स्वयं अपने
आप में सही-गलत का निर्णयकर्ता बना देता है । इससे एक ही वस्तु के विषय में
विभिन्न व्यक्तियों के भिन्न-भिन्न मत हो सकते है और वे सभी मत सत्य भी कहलायेंगे
। इसी प्रकार एक ही विषय पर दो व्यक्तियों द्वारा व्यक्त दो विपरीत सत्य कथन भी
सम्भव हो जायेंगे । प्रत्येक कथन व्यक्ति के सापेक्ष हो जाऐगा । इस अवस्था में
कथनों की सर्व सत्यता को प्रदर्शित करने का प्रयास करना व्यर्थ रहेगा । बल्कि
सोफिस्ट का काम यही था कि वह लोगों को दो विरोधी कथनों में से किसी एक की अपेक्षा
दूसरे को अपनाने के लिए तैयार कर लें । नीतिशास्त्र
सोफिस्टों के नैतिक विचार उनकी ज्ञान मीमांसा
के अनुरूप है । अतः स्वभाविक रूप से उनके नैतिक विचार उनके व्यक्तिनिष्ठवादी और
सापेक्षतावादी सिद्धान्तों का परिणाम है । यदि यथार्थ एवं सार्वभौमिक ज्ञान असंभव
है,
तो सही या गलत का वस्तुनिष्ठ ज्ञान भी असम्भव है । प्रत्येक व्यक्ति
अपनी चेतना के अनुसार नैतिक चयन करने के लिए स्वतंत्र है । यदि एक ओर आरंभिक
यूनानी दार्शनिकों की परस्पर विरोधी ब्रहमांड विज्ञान सम्बंधी व्याख्याओं ने
सोफिस्टों के ज्ञानमीमांसीय संशयवाद को जन्म दिया तो वही दूसरी ओर उस समय विभिन्न
राष्ट्रों में पाए जाने वाले रीतिरिवाजों, परम्पराओं और
नैतिक मूल्यों ने उन्हें आचरण एवं मूल्यों की वस्तुनिष्ठता की वैधता पर प्रश्न
करने को प्रेरित किया । सोफिस्ट आरंभिक यूनानी दार्शनिकों से न सिर्फ विषय वस्तु
जैसे आध्यात्म और ज्ञान शास्त्र के संदर्भ में भिन्न मत रखते थे बल्कि दार्शनिक
अन्वेषण की कार्यविधि और उचित लक्ष्य में भी भिन्न मत रखते थे ।
अन्वेषण की विधि
सोफिस्टों की अन्वेषण की विधि अनुभूतिमूलक-आगमनात्मक
थी । इसके विपरीत, आरंभिक दार्शनिकों की अन्वेषण
विधि मुख्यरूप से निगमनात्मक थी । आरंभिक दार्शनिक प्रारूपिक रूप से सामान्य
सिद्धान्त से शुरू करके फिर उस सिद्धान्त के अनुसार परिघटना को समझते थे । दूसरी
ओर सोफिस्ट किसी विशेष निरीक्षण और तथ्यों से शुरूआत करते थे । उन्होंने अपनी
यात्राओं से काफी तथ्यों का भंडार एकत्रित किया था । इनसे वे अपने निष्कर्ष
निकालते थे, जो आंशिक रूप से सैद्धान्तिक और आंशिक रूप से
व्यवहारिक थे । उदाहरण के लिए मतों और विश्वासों के अन्तरों से संबन्धित अनेक
तथ्यों के अध्ययन के कारण वे ऐसे निष्कर्षो पर पहुंचे, जिनके
अनुसार किसी ऐसे ज्ञान का होना असंभव था, जो सार्वजनिक रूप
से सभी को स्वीकार्य हो ।
दार्शनिक अन्वेषण का लक्ष्य
ज्ञान-संश्यवादी होने के कारण सोफिस्टों का
लक्ष्य वस्तुनिष्ठ नियम स्थापित करना या अनिवार्य सत्यों की खोज करना नहीं था ।
यहां पुनः वे आरंभिक यूनानी दार्शनिकों से भिन्न थे, जिनका
प्राथमिक लक्ष्य सार्वभौम सत्य का पता लगाना था । सभी ब्रहमांडशास्त्री जगत् के
बारे में वस्तुनिष्ठ सत्यों का पता लगाना चाहते थे । दूसरी ओर, सोफिस्ट यथार्थ वस्तुनिष्ठ सत्यों तक पहुचनें की नहीं बल्कि सिर्फ सापेक्ष,
विषयपरक सत्य की ही उम्मीद करते थे । उन्होंने अपने आपको जीवन पर
नियंत्रण और उसकी कला को सिखाने तक सीमित रखा । दूसरे शब्दों में, उनका लक्ष्य सैद्धान्तिक नहीं बल्कि व्यवहारिक था ।
सोफिस्ट दर्शन का महत्व
पांचवी शताब्दी ई. पू. का सोफिस्ट आंदोलन एक
संक्रामी प्रावस्था को प्रदर्शित करता है । यह ब्रहमांड की पहेली को सुलझाने में
मानव बुद्धि की शक्ति के प्रति बढ़ते अविश्वास और उसके फलस्वरूप पारंपरिक मूल्यों
और संस्थानों में विश्वास की कमी को प्रदर्शित करता है । यह आंदोलन पूरी तरह से
संशयवादी और क्रांतिकारी था । यह आध्यात्मिक चिंतन से विरक्त ही नहीं बल्कि उसका
विरोधी भी था । तथापि, यह मनुष्य की समस्याओं के
प्रति ध्यान आकर्षित करने में मानव ज्ञान और आचरण की समस्या के पूर्ण परीक्षण की
आवश्यकता पर बल देते हुए इन्हीं मान्यताओं के साथ सुकरात के काल में प्रवेश कर
जाता है । सकारात्मक रूप से कहे तो सोफिस्टों ने दर्शन को आम आदमी की पहुँच तक ला
दिया । उन्होंने दार्शनिकों का बाह्य प्रकृति के चिंतन से ध्यान हटाकर स्वयं मनुष्य
पर केन्द्रित कर दिया । दूसरे, उन्होंने मानव जीवन और दर्शन
के सभी क्षेत्रों में गहराई से चिंतन करने की भावना को प्रोत्साहित किया ।
इन्होंने दार्शनिकों को चिंतन की प्रक्रिया की जांच पड़ताल करने के लिए बाध्य किया
और इससे ज्ञान के सिद्धान्त का निरूपण हुआ । इसी प्रकार, उनके
तार्किक भ्रांतियों और सोफिस्ट सिद्धान्तों के प्रयोग ने चिंतन के सही नियमों के
अध्ययन को अनिवार्य बना दिया । कालान्तर में, इससे
द्वंद्ववाद (प्लेटो) और तर्क शास्त्र (अरस्तू) का विकास हुआ । इसी प्रकार सही
और गलत की आम धारणाओं और सार्वजनिक और निजी न्याय की उनकी मूलभूत आलोचना ने
दार्शनिकों को नीतिशास्त्र और राजनीति के आधारों के पुनः परीक्षण के लिए बाध्य
किया । संतुलित अर्थों में कहे तो सोफिस्ट हेल्लास के महान शिक्षक थे । उन्होंने
दर्शन को और अधिक ठोस आधार प्रदान करने पर बल दिया, जिससे कि
ज्ञान, सत्य, सही और गलत की तथा मानव
संस्थाओं और धर्म के अर्थ और उद्देश्य की मौलिक अवधारणाओं की अधिक बारीकी से जांच पड़ताल
की जा सके ।
प्रमुख सोफिस्ट दार्शनिक
प्रोटोगोरस ( Protagoras ) का दर्शन
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