Sunday, May 15, 2022

हेराक्लाइटस ( Heraclitus ) का दर्शन


हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) का दर्शन 

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) का दर्शन 

निरंतर प्रवाह 

       हेरक्लाइटस को उनकी इस ब्रहमांडीय दर्शन की उक्ति के लिए जाना जाता है कि सभी चीजें निरंतर गतिशील या परिवर्तनीय हैं । यह प्रकृति का सबसे मौलिक सिद्धान्त है । उन्होंने प्रकृति की अनुभूति को महत्व दिया । उन्होंने कहा कि नदी के समान प्रत्येक वस्तु प्रवाहमान है । वह कहते है कि कोई भी व्यक्ति एक ही नदी में दो बार प्रवेश नहीं कर सकता हैं और न ही कोई व्यक्ति समान अवस्था में समान नश्वर पदार्थ को दो बार स्पर्श कर सकता हैं"। जब कोई व्यक्ति नदी में दूसरी बार उतरता है, तो न तो वह व्यक्ति स्वयं और न ही नदी समान होती है । व्यक्ति पहले ही परिवर्तित हो चुका होता है, क्योंकि व्यक्ति के शरीर की कोशिकाएं नई बनी होती है । व्यक्ति पहले से ही सम्भवन की प्रक्रिया में होता है और नदी में जल निरंतर प्रवाहित होता रहता है, क्योंकि प्रवाहीत जल ही नदी को नदी बनाता है । अतः जहां व्यक्ति उसमें प्रवेश करता है वह उसी क्षण बदल जाती है । चूंकि उनकी संपूर्ण दार्शनिक अवधारणा सत् के परिवर्तन के बोध से शासित है, इसलिए उन्हें "क्राईंग फिलोसोफर" के रूप में भी जाना जाता है । 

अग्नि और सार्वभौमिक परिवर्तन 

         हेराक्लाइटस के अनुसार जगत का सबसे गतिशील पदार्थ अग्नि है । अग्नि सतत् चलायमान है । यह कभी विश्राम नहीं करती है । उन्होंने इसे वाष्प या प्राण नाम दिया । प्राण जीव का मुख्य जैविक घटक और आत्मा का सार है । कुछ विद्वानों का मानना है कि यह अग्नि एक निरंतर क्रिया या प्रक्रिया के लिए सिर्फ एक मूर्त भौतिक प्रतीक मात्र है । यह स्वयं में कोई पदार्थ नहीं है, बल्कि यह स्वयं सभी पदार्थों को खंडित करती है । यह उस सिद्धान्त को इंगित करता है कि परिवर्तन या रूपान्त्रण निरंतर होते रहते हैं केवल अग्नि ही इन स्थितियों को संतुष्ट कर सकती है । इसमें ऊपर की ओर का परिवर्तन नीचे की ओर के परिवर्तन के समान होता है । अग्नि पहले जल में फिर पृथ्वी में परिवर्तित होती है । पृथ्वी, पुनः जल और अग्नि में बदल जाती है । सभी वस्तुओं की अग्नि से और अग्नि की सभी अन्य वस्तुओं से अदला बदली होती है । जिन वस्तुओं के बारे में हम सोचते हैं कि वे स्थायी हैं, स्थायी नहीं हैं । हम जो नहीं देख पाते हैं वह है, उनमें होने वाली गति । वह कहते हैं कि "जो ठंडा है वह गर्म हो जाता है, जो गर्म है वह ठंडा हो जाता है, गीला सूख जाता है और सूखा गीला हो जाता है"। “जगत का यह क्रम सभी के लिए समान नहीं है, लेकिन यह सदैव विद्यमान था और अनन्त काल तक सजीव-अग्नि के रूप में विद्यमान रहेगा । वह अग्नि जो समय पर प्रज्वलित हो जाती है और समय से बुझ जाती है" । जगत् एक सतत् चलायमान अग्नि है । 

विपरीतों का संगठन 

         विश्व विपरीतों से बना है । विपरीतों की उपस्थिति विश्व को वैसा बनाती है, जैसा वह है । शुभ और अशुभ की अवधारणा का जगत् के क्रम में अपना स्थान है । यदि युद्ध नहीं होगा तो हम शांति कैसे अर्जित करेंगे ? युद्ध में शांति होती है । निर्माण विध्वंस के लिए होता है । जन्म मृत्यु के लिए होता है । निर्बल स्वास्थ्य की आवश्यकता की मांग करता है । यदि गर्मियां न होती तो मानसून की क्या उपयोगिता होती ? 

         हेराक्लाइटस की शिक्षा की नवीनता विविधता में एकता और एकता में भिन्नता की अवधारणा में है । वह 'एक' (सत्) की उपस्थिति के लिए विपरीतों को अनिवार्य मानते हैं । तथ्य यह 'है’ कि 'एक' सिर्फ विपरीतों की उपथिति में होता है । यह विपरीत की उपस्थिति 'एक' की एकता के लिए अनिवार्य है । हिराक्लाइटस के लिए सत् एक है , लेकिन साथ ही यह अनेक भी है । ऐसा संयोगवश नहीं, बल्कि अनिवार्य रूप से है । यह सत् का अनिवार्य गुण है कि इसे एक ही समय पर एक और अनेक होना चाहिए । 

          हिराक्लाइटस की शिक्षा अनेक में विधमान 'एक' ( सत् ) के अधिक समीप है । इसकी पहचान भिन्नता में है । उन्होंने स्वीकार किया कि सभी चीजें एक हैं और एकता सिर्फ विपरीतों के संघर्ष से ही फलीभूत होती है । विपरीतों को 'एक' में संगठित करने का एक सिद्धान्त है । ब्रहमांड का अद्वैतवादी सिद्धान्त लोगोस के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है तर्क बुद्धि । हेराक्लाइटस की तर्क बुद्धि 'सार्वभौमिक तर्क बुद्धि' है । यह ब्रहमाण्ड में पाई जाने वाली सभी वस्तुओं का मार्गदर्शन करती है । सतत् जटिल परिवर्तनों में यह सार्वभौमिक तर्क बुद्धि ब्रहमांड में एकता स्थापना का कार्य करती है । किसी एक का सृजन दूसरे का विध्वसं है और पुनः किसी वस्तु का विध्वंस किसी और के सृजन की शुरूआत है । प्रत्येक वस्तु अपने विपरीत में परिवर्तित होती रहती है । इस जगत् में कुछ भी अपने गुणों में स्थायी नहीं रहता है । प्रत्येक वस्तु है और नहीं भी है । इसलिए प्रत्येक वस्तु स्वयं में विपरीतों को जोड़े रखती है । उदाहरण के लिए, संगीत में मेल ऊंचे और नीचे सुरों के समन्वय से होता है, जिसका अर्थ होता है विपरीतों का योग । इसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् विपरीतों का संयोजन है । "युद्ध सबका जनक और सबका राजा है" क्योंकि, शांति में युद्ध समाहित है । यदि हम लड़ेंगे नहीं तो हमें शांति नहीं मिलेगी । इसलिए शांति युद्ध में शामिल हैं और युद्ध से शांति आती है । 

नैतिक सिद्धान्त 

         हेराक्लाइटस के द्वारा लिखे हुए अंशों से ज्ञात होता हैं कि प्रक्रिया या सम्भवन में एक सतत् रूप से पाया जाने वाला बौद्धिक आदर्श ( लोगोस ) है । हेराक्लाइटस के अनुसार, "नैतिक होने का अर्थ ऐसा बौद्धिक जीवन जीना है तर्क की आज्ञा का पालन करना है जो हम सभी के लिए समान है, पूरे जगत् के लिए समान है ।" मनुष्य ने स्वयं को अपनी इन्द्रियों के सुपुर्द कर दिया है और वह ऐसे जीता है मानो वह अपस्मारी ( मिर्गी ) से ग्रसित है । विपरीतों, जैसे प्रेम और घृणा के बीच संघर्ष का समाधान मापन प्रक्रिया ( मेट्रोन ) के अनुसार करना चाहिए । 

          हेराक्लाइटस पर अनुसंधान दर्शाते हैं कि उनके नैतिक मत उनकी दार्शनिक शिक्षा में प्राथमिक महत्व रखते हैं । नैतिकता का अर्थ कानून के लिए सम्मान, आत्म अनुशासन, मनोभावों पर नियंत्रण रखना है और नैतिक होने का अर्थ स्वयं को बौद्धिक सिद्धान्तों से नियंत्रित करना है । उनके लेखन से निम्नलिखित उद्धरण उनके नैतिकता सम्बंधि उच्च आदर्शवाद को प्रदर्शित करते हैं । "चरित्र मनुष्य का दिव्य रक्षक है", "मनोभावों को जीतना कठिन है, क्योंकि व्यक्ति जो भी ( अनैतिक ) प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे आत्मा की कीमत पर प्राप्त करता है", " मेरे लिए एक ( चरित्रवान ) व्यक्ति दस हजार ( चरित्रहीनों ) से बेहतर है, यदि वह श्रेष्ठ है" । यदि हम मनुष्य के मन में झांकते हैं उसकी नैतिक स्थिति अच्छी नहीं पाते है । यहां हमारी शुभ की अवधारणा की समृद्धि में एक और तत्व जुड़ गया है । क्या अरस्तू अपने सद्गुण के सिद्धान्त के अनुसार व्यक्तियों के चरित्र निर्धारण की प्रक्रिया में हेराक्लाइटस के इस सिद्धांत से अत्यधिक प्रभावित नहीं जान पड़ते ? अरस्तू कहते हैं कि अच्छे कार्य अच्छे नैतिक चरित्र की स्थायी अवस्था से स्फुटित होते हैं । "अनेक ( चरित्रहीनों ) का कोई महत्व नहीं होता है, सिर्फ कुछ ( चरित्रवान ) ही मूल्यवान होते हैं" । हेराक्लाइटस सत्य की प्राप्ति में इन्द्रिय ज्ञान के महत्व को नहीं स्वीकारते हैं । उनकी नैतिक अवधारणा बाह्य से आन्तरिक और आंतरिक से दैवीय के क्रम में स्फूटित होती है । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कितनी यात्रा ( खोज ) करते हैं । भले ही आप प्रत्येक सड़क ( राह ) से गुजर ले ( अर्थात सभी सम्भव ढ़ंगों और योग्यताओं से अन्वेषण कर ले ) आप कभी भी आत्मा की सीमाओं को नहीं छू सकते हैं, क्योंकि इसमें प्रबल लोगोस पाया जाता है" । 

           हेराक्लाइटस के अनुसार मनुष्य को बौद्धिक गुणों से युक्त होना चाहिए । उसे तात्कालिक मूर्त आंकड़ों से स्वयं को विमुख करके उनमें उपस्थित सार भूत एकता को प्राप्त करना चाहिए । इस एकता के स्तर पर व्यवहारिक अनुभव सिद्धांतों में समाहित हो जाते हैं । हेराक्लाइटस की यह संवृत्तिवादी दृष्टि व्यक्ति को स्वयं के अन्वेषण की ओर लेकर जाती है । वह वास्तव में सत्य अन्वेषी थे । इसके माध्यम से वे बौद्धिक चरित्र ( व्यक्ति ) में बौद्धिक प्रज्ञा को प्राप्त करने में सफल हुए । 

लोगोस की अवधारणा 

           हेराक्लाइटस के लिए शब्द लोगोस का एक निश्चित दार्शनिक अर्थ है । दार्शनिक महत्व ब्रह्मांड को एकीकृत करने के उसके मूल्य में निहित है । लोगोस विरोधों को समन्वय के रूप में अथवा 'विरोधों के सहअस्तित्व" या संतुलन के रूप में ले आता है । हेराक्लाइटस के सूत्रों में अवस्थित विभिन्नता व्याख्याओं की विभिन्नता को भी इंगित करती है । इन विभिन्नताओं को मूलतः समूहों में बांटा जा सकता है । वस्तुतः लोगोस विरोधों से खाली नहीं है, बल्कि उनका अंतर्भूत नियम है । इस सम्बंध में गूथरी ने कहा है कि विरोधों के समन्वय में तीन अभिकथन होते हैं । ये हैं – 

  1. प्रत्येक वस्तु विरोधों से परिपूर्ण है 
  2. विरोधों में समरूपता होती हैं 
  3. संघर्ष उनका रचनात्मक बल और प्रधान निदेशक होता है । 

निष्कर्ष के रूप में हेराक्लाइटस की शिक्षा त्रिगुणात्मक हैं- भाषाई, गूढविज्ञानी और तात्विक । लोगोस स्वयं को प्रदर्शित करता है । यह स्वयं सोचता है और यह अस्तित्वमान है । यद्यपि ईश्वर, अग्नि और लोगोस को त्रिएक के रूप में देखना उचित नहीं है । हेराक्लाइटस प्रबुद्ध ईश्वर के रूप में एकत्व को प्रमुखता देते हैं । ईश्वर विश्वव्यापी बुद्धि है । यह एक सर्व कानून है जो सभी वस्तुओं में सर्वव्यापी है और सभी वस्तुओं को एकता में बांधकर सार्वभौमिक नियम के अनुसार सतत् परिवर्तन का निर्धारण करता है । व्यक्तिक बुद्धि इस विश्वव्यापी बुद्धि में क्षणिक तत्व है । इसलिए मनुष्य को अपरिवर्तनीय नियम की सत्ता के अनुसार जीने के लिए संघर्ष करना पड़ता है । मनुष्य की बुद्धि और चेतना जो अग्निमय तत्व हैं, मूल्यवान तत्व हैं । शुद्ध अग्नि के बिना शरीर मूल्यहीन है ।

हेराक्लाइटस  ( Heraclitus ) के प्रमुख दार्शनिक कथन 

  • जगत् एक सतत् चलायमान अग्नि है ।
  • युद्ध सबका जनक और सबका राजा है । 
  • चरित्र मनुष्य का दिव्य रक्षक है । 
  • मेरे लिए एक ( चरित्रवान ) व्यक्ति दस हजार ( चरित्रहीनों ) से बेहतर है, यदि वह श्रेष्ठ है । 
  • अनेक ( चरित्रहीनों ) का कोई महत्व नहीं होता है, सिर्फ कुछ ( चरित्रवान ) ही मूल्यवान होते हैं । 
  • नैतिक होने का अर्थ ऐसा बौद्धिक जीवन जीना है तर्क की आज्ञा का पालन करना है जो हम सभी के लिए समान है, पूरे जगत् के लिए समान है ।
  • मनोभावों को जीतना कठिन है, क्योंकि व्यक्ति जो भी ( अनैतिक ) प्राप्त करने की इच्छा रखता है उसे आत्मा की कीमत पर प्राप्त करता है । 
  • मेरा दर्शन इने-गिने सुयोग्य व्यक्तियों के लिए ही है, क्योंकि गधों को घास चाहिए, स्वर्ण नहीं । 
  • अखंड गति, निरन्तर परिवर्तन, अविच्छिन प्रवाह, अटूट धारा - यही संसार का नियम है । 
  • विरोध का अभाव मृत्यु है । विरोध या निषेध के बिना गति सम्भव नहीं । 
  • जीवन अग्नि है, सुषुप्ति जल है और मृत्यु पृथ्वी है । इसलिए अग्नि, जल और पृथ्वी - यह अवनत मार्ग है तथा पृथ्वी, जल और अग्नि - यह उन्नत मार्ग है ।
  

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