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| पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का दर्शन |
पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का दर्शन
'सत्' की अवधारणा
पार्मेनाइड्स ने हेरेक्लीटस के सम्भवन ( गति ) के विरोध में 'सत्' की अवधारणा को विकसित किया । पार्मेनाइड्स के अनुसार सत् अविनाशक, पूर्ण और ज्ञेय है । उन्होंने 'सत्' को भौतिक माना । उनका सोचना था कि 'सत्' सीमित है, क्योंकि वह एक है । 'सत्' अन्नत भी है, अर्थात इसका न तो उद्गम है और न ही अंत, लेकिन यह देशीय रूप में सीमित है ।
वे पाइथागोरस के अमूर्त सार की अवधारणा के विषय में विभिन्न मत रखते थे । पाइथागोरस के लिए सत् ज्यामितीय इकाईयां है और प्रत्येक वस्तु को इन इकाईयों जैसे बिंदु, रेखा, त्रिकोण, वृत्त, घन आदि, जो की अमूर्त हैं, के रूप में समझा ज सकता है । पाइथागोरस का कहना है कि 'अस्तित्व’ की सुरक्षा की जानी चाहिए, अस्तित्व को तार्किक घटकों में प्राप्त नहीं किया जा सकता है । अस्तित्व विचार से पहले है । गणित और ज्यामिति से पहले 'सत्' का दर्शन या तत्वमीमांसा का अस्तित्व होता है जिस पर विचार निर्भर करता है, न कि विचार पर अस्तित्व निर्भर करता है ।
'सत्' की व्याख्या
'सत्' के संदर्भ में छह व्याख्याएं हैं –
- रहस्यवादी व्याख्या - प्लोटीनस ने पार्मेनाइड्स के 'सत्' की व्याख्या को जीनोफेन्स के यूनम अर्थात ईश्वर के रूप में माना ।
- प्रत्ययवादी व्याख्या - यह व्याख्या हेगेल और स्टेन्जेल द्वारा प्रस्तुत की गई है । पार्मेनाइड्स के अनुसार सत् विचार से उत्पन्न हुआ है और सोचने का अर्थ है होना ।
- भौतिकवादी व्याख्या - सत् भौतिक पिंडों का योग हैं ।
- तार्किक व्याख्या - सत् तर्कवाक्य का संयोजन ( Copula ) है । कोई भी 'सत्' विधेय से पहले नहीं आता, अर्थात व्याकरण और तर्क से पहले नहीं आता है ।
- प्लेटोवादी-अरस्तूवादी या निरपेक्ष व्याख्या - सत् एक परात्पर अवधारणा है, जिसके विभिन्न अर्थ है पदार्थ, गुण, परिमाण, स्थान आदि । ये सत के विभिन्न प्रकार है । 'सत्' एक संप्रत्यय है, जिसे अनेक प्रकारों से व्यक्त किया जाता है ।
- अस्तित्ववादी या तात्विक व्याख्या – ‘सत्’ जगत् में अस्तित्व का मूल और प्राथमिक रूप है ।
डारियो कंपोस्टा के अनुसार अनेक कारणों से पहली चार और छठवीं व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता है । यह सत् ईश्वर नहीं हो सकता, क्योंकि इसे पार्मेनाइड्स के लेखों में कभी-भी ईश्वर नहीं कहा गया है, क्योंकि ऐसा होने पर पार्मेनाइड्स एक शुद्ध एकात्मवादी माने जायेंगे । प्रत्यवादी व्याख्या यूनानियों की चिन्तन परम्परा से मेल नहीं खाती, क्योंकि वे दार्शनिक रूप से यथार्थवादी थे । भौतिकवादी सिद्धान्त भी स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यहां सत् आयोनी दार्शनिकों का आर्क नहीं है । तार्किक व्याख्या को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वह ( पार्मेनाइड्स ) तार्किक निर्णय से सत् को खोजने का काम नहीं कर रहे थे ।
अपरिवर्तन का सिद्धान्त
परर्मेनाइड्स के अनुसार, यह कैसे संभव है की कोई चीज़ है भी और नहीं भी । किस प्रकार कोई एक वस्तु दूसरी में परिवर्तित हो सकती है ? किस प्रकार एक गुण दूसरा गुण बन सकता है ? यदि ऐसा सम्भव हो सकता है, तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि कोई वस्तु है और नहीं भी है । साथ ही इसका अर्थ यह भी है कि कोई वस्तु शून्य में से आ सकती है और स्वयं शून्य भी बन सकती है । पार्मेनाइड्स कहते हैं, "यह कभी सिद्ध नहीं किया जा सकता है कि वस्तुऐं जो नहीं हैं, वो हैं ।" तथापि अ-परिवर्तन के सिद्धान्त की तार्किक परिणाली यही है । जिन वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं है, वे शून्य हैं । शून्य का अर्थ है- 'असत्' । यदि उनका अस्तित्व नहीं है, तो हम यह कैसे सिद्ध कर सकते हैं कि वे हैं ? इसका उत्तर नहीं में है और यह असंभवता है । असंभवता सदैव असंभवता रहती है, यह कभी भी संभवता नहीं बन सकती ।
अविनाशिता का सिद्धान्त
सत् अस्तित्वमान न हो यह तार्किक असम्भवता है अथवा जैसा कि फ्रेगमेन्ट 11 में कहा गया है "उस ( सत् ) के लिए न होना संभव नहीं है" । अरस्तूवादी अव्यघातता का सिद्धान्त कहता है कि यदि 'सत्' है (जो नहीं भी हो सकता है), तो वह आवश्यक रूप से है । पार्मेनाइड्स के अनुसार अविनाशिता के सिद्धान्त के आधार पर 'सत्' आवश्यक रूप से अस्तित्वमान है । इसलिए पार्मेनाइड्स ने सत की अ-परिवर्तनीयता पर बल दिया है । जहां तक उन्होंने 'सत्’ ( होने ) को भौतिक रूप में माना है, उन्होंने तत्व की अविनाशिता पर जोर दिया है । अतः पार्मेनाइड्स ने कहा कि 'सत्’ की न तो उत्पति होती है और न ही अंत होता है तथा यही तत्व की अविनाशिता है । सत् स्वयं में पूर्ण सत् है, जिसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता है । यदि यह विभाज्य है तो इसे किसी और से विभाजित होना पड़ेगा । परन्तु सत् के अतिरिक्त कोई दूसरा विद्यमान नहीं हो सकता है । इसका अर्थ है कि 'सत्' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता है, क्योंकि इसमें जो कुछ भी जोड़ा जायेगा, वह भी 'सत्' ही होगा । इस प्रकार सम्भवन अर्थात परिवर्तन का निषेध हो जाता है ।
सत् और असत् ( भाव और अभाव )
अभिव्यक्ति का दूसरा तरीका यह है कि यदि सत् सम्भवन है, तो वह या तो 'सत्' से या 'असत्' से आया है । यदि 'असत्' से, तो यह शून्य से आया है जो कि असंभव है, क्योंकि भाव के अतिरिक्त अभाव की सत्ता सम्भव नहीं है । मेटाफिजिक्स में अरस्तू ने इस पर टिप्पणी की है कि पार्मेनाइड्स के अनुसार सत् को अनिवार्यतः एक ही होना पड़ेगा ताकि उसके अतिरिक्त वह कुछ ओर न हो । इस मामले पर अरस्तू ने स्पष्ट रूप से अपने कार्य फिजिक्स में तर्क किया है कि यदि यह ( अभाव ) भाव से उत्पन्न है तो यह स्वयं से ही आया है । यह ऐसा कहने जैसा है कि यह स्वयं के समान है और इसलिए यह सदा से उपस्थित रहा है । पार्मेनाइड्स ने इससे निष्कर्ष निकाला कि "सभी अस्तित्वमान वस्तुऐं एक है और यह ( एक ) 'सत्’ है", यह तादात्मयता का सिद्धान्त है । अतः केवल एक ही शाश्वत्, अ-व्युत्पन्न, अपरिवर्तनीय 'सत्' हो सकता है और इस सत को अनिवार्यतः सतत् अवभिाज्य और अपरिवर्तित होना चाहिए ।
सत् और विचार
'सत्' और 'विचार' एक ही हैं, क्योंकि जो सोचा नहीं जा सकता है, वह अस्तित्वमान भी नहीं हो सकता है और जो नहीं हो सकता है अर्थात् 'असत्' है, उसे सोचा भी नहीं जा सकता है । अर्थात् 'विचार' और 'सत्' समान है । जो कुछ भी विचार योग्य है, उसमें सत् है । पार्मेनाइड्स का संभवतः यह भी मानना था कि सत् और विचार उसी रूप में उपस्थित है जैसे कि सत् मन से संपन्न है । यह दर्शाता है कि "विचार और विचार का कार्य एक समान है, क्योंकि विचार 'सत्', जिसमें इसे अभिव्यक्त किया जाता है, के बिना नहीं मिल सकता । वास्तव में विचार सत् ही है और इसके परे कुछ नहीं है" (फ्रेगमेन्ट बी 8) ।
सत् और भ्रम
सभी परिवर्तन अग्राहीय है और इसलिए इन्द्रिय जगत् एक भ्रम है । प्रत्यक्ष जगत को सत्य मानना असत् को सत् मानने जैसा है । पार्मेनाइड्स बुद्धि में दृढ़ विश्वास रखते हैं । उनका मानना है कि सत् से तात्पर्य तर्क का अनुसरण करना है और जो भी विचार का विरोधी है वह सत् नहीं हो सकता है । “उन्होंने यह दावा नहीं किया कि 'सत्' विचार है, बल्कि यह कहा कि सत् को विचार द्वारा ही समझा जा सकता है ।" यदि यह बुद्धिपरक सत् पार्मेनाइड्स के लिए ज्ञान है तो उनके शुभ की अवधारण भी बुद्धि आधारित ही सिद्ध होती है । यह निश्चित है कि कुछ न कुछ बौद्धिक तत्व निश्चित रूप से उनकी एगेथोस ( शुभ ) की अवधारणा को पूरा करता है और अरस्तू के नैतिक सद्गुण की अपेक्षा बौद्धिक गुण के नियंत्रण के बहुत निकट प्रतीत होता है ।
पार्मेनाइड्स के प्रमुख दार्शनिक कथन
- सत् विज्ञानरूप है ।
- सत् व्यवहार का मार्ग है ।
- इन्द्रिय जगत एक भ्रम है ।
- शुद्ध सत् शुद्ध चित्त भी है ।
- सत्ता और बोध एक ही है ।
- गति या परिवर्तन भ्रांति है ।
- शुद्ध सत् परमार्थ का मार्ग है ।
- तत्व सत् है परिणाम या गति नहीं ।
- सत् सदा समरस या एक सा रहता है ।
- सत् निरपेक्ष, पूर्ण, स्वयम्भू और नित्य है ।
- जो कुछ है "है", जो "है नहीं" उसे जाना नहीं जा सकता
- तत्व शुद्ध सत्ता है । वह एक, अद्वितीय, नित्य, अपरिणामी, अविनाशी और कूटस्थ है ।
- सृष्टि का मूल आधार एक अपरिवर्तनशील, अद्वितीय, अविनाशी और कूटस्थ विशुद्ध सत्ता है ।
- रिक्तता सम्भव नहीं क्योंकि रिक्त स्थान असत् होगा इसलिए इसका अस्तित्व नहीं ।
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