Saturday, May 14, 2022

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

 

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- इलियाई सम्प्रदाय को एक व्यवस्थित विचारधारा के रूप में स्थापित करने का श्रेय किसे है ?

  1. पाइथागोरस को 
  2. पार्मेनाइडीज को 
  3. हेराक्लिटस को 
  4. डेमोक्रेटस को 

2- पार्मेनाइडीज के अनुसार सत् का बोध किसके द्वारा होता है ?

  1. अन्तर्भान 
  2. बुद्धि 
  3. आत्मा 
  4. समाधि 

3- पार्मेनाइडीज का 'सत् का सिद्धान्त' किस दार्शनिक के प्रत्यय सिद्धान्त से अनुप्रेरित था ?

  1. प्लेटों 
  2. हीगल 
  3. बर्कले 
  4. इनमें से कोई नहीं 

4- पार्मेनाइडीज के आलोक में दिए गाए अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और सही कूट को चिन्हित कीजिए - 
अभिकथन (A) - रिक्तता सम्भव नहीं । 
तर्क (R) - रिक्त स्थान असत् होगा, इसलिए इसका अस्तित्व नहीं है । 

कूट 

  1.  A और R दोनों सही है तथा R, A की सही व्याख्या है ।
  2. A और R दोनों सही है तथा R, A की सही व्याख्या नहीं है । 
  3. A सही है किन्तु R गलत है । 
  4. A गलत है किन्तु R सही है । 

5- नीचे अभिकथन (A) और तर्क (R) पर विचार कीजिए और सही कूट को चिन्हित कीजिए - 
अभिकथन (A) - पार्मेनाइडीज एक एकतत्त्ववादी था ।  
तर्क (R) - पार्मेनाइडीज के अनुसार सत्ता एक, शाश्वत और अविभाज्य है ।  

कूट 

  1.  A और R दोनों सही है तथा R, A की सही व्याख्या है ।
  2. A और R दोनों सही है तथा R, A की सही व्याख्या नहीं है । 
  3. A सही है किन्तु R गलत है । 
  4. A गलत है किन्तु R सही है । 

 6- भ्रम के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए किस दार्शनिक ने यह तर्क दिया है कि "इन्द्रिय जगत एक भ्रम है" ?

  1. फ्रांसिस बेकन ने  
  2. पार्मेनाइडीज ने 
  3. प्रोटोगोरस ने 
  4. विलियम जेम्स ने 

7- 'शुद्ध सत्' की अवधारणा का प्रतिपादन निम्नलिखित दार्शनिकों में से किसने किया है ?

  1. पाइथागोरस ने 
  2. डेमोक्रेटस ने 
  3. हेराक्लिटस ने 
  4. पार्मेनाइडीज ने 
----------------

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का दर्शन

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का दर्शन 

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का दर्शन  

'सत्' की अवधारणा 

         पार्मेनाइड्स ने हेरेक्लीटस के सम्भवन ( गति ) के विरोध में 'सत्' की अवधारणा को विकसित किया । पार्मेनाइड्स के अनुसार सत् अविनाशक, पूर्ण और ज्ञेय है । उन्होंने 'सत्' को भौतिक माना । उनका सोचना था कि 'सत्' सीमित है, क्योंकि वह एक है । 'सत्' अन्नत भी है, अर्थात इसका न तो उद्गम है और न ही अंत, लेकिन यह देशीय रूप में सीमित है । 

         वे पाइथागोरस के अमूर्त सार की अवधारणा के विषय में विभिन्न मत रखते थे । पाइथागोरस के लिए सत् ज्यामितीय इकाईयां है और प्रत्येक वस्तु को इन इकाईयों जैसे बिंदु, रेखा, त्रिकोण, वृत्त, घन आदि, जो की अमूर्त हैं, के रूप में समझा ज सकता है । पाइथागोरस का कहना है कि 'अस्तित्व’ की सुरक्षा की जानी चाहिए, अस्तित्व को तार्किक घटकों में प्राप्त नहीं किया जा सकता है । अस्तित्व विचार से पहले है । गणित और ज्यामिति से पहले 'सत्' का दर्शन या तत्वमीमांसा का अस्तित्व होता है जिस पर विचार निर्भर करता है, न कि विचार पर अस्तित्व निर्भर करता है ।

'सत्' की व्याख्या 

'सत्' के संदर्भ में छह व्याख्याएं हैं – 

  1. रहस्यवादी व्याख्या - प्लोटीनस ने पार्मेनाइड्स के 'सत्' की व्याख्या को जीनोफेन्स के यूनम अर्थात ईश्वर के रूप में माना ।
  2. प्रत्ययवादी व्याख्या - यह व्याख्या हेगेल और स्टेन्जेल द्वारा प्रस्तुत की गई है । पार्मेनाइड्स के अनुसार सत् विचार से उत्पन्न हुआ है और सोचने का अर्थ है होना । 
  3. भौतिकवादी व्याख्या - सत् भौतिक पिंडों का योग हैं । 
  4. तार्किक व्याख्या - सत् तर्कवाक्य का संयोजन ( Copula ) है । कोई भी 'सत्' विधेय से पहले नहीं आता, अर्थात व्याकरण और तर्क से पहले नहीं आता है । 
  5. प्लेटोवादी-अरस्तूवादी या निरपेक्ष व्याख्या - सत् एक परात्पर अवधारणा है, जिसके विभिन्न अर्थ है पदार्थ, गुण, परिमाण, स्थान आदि । ये सत के विभिन्न प्रकार है । 'सत्' एक संप्रत्यय है, जिसे अनेक प्रकारों से व्यक्त किया जाता है । 
  6. अस्तित्ववादी या तात्विक व्याख्या – ‘सत्’ जगत् में अस्तित्व का मूल और प्राथमिक रूप है । 

          डारियो कंपोस्टा के अनुसार अनेक कारणों से पहली चार और छठवीं व्याख्या को स्वीकार नहीं किया जा सकता है । यह सत् ईश्वर नहीं हो सकता, क्योंकि इसे पार्मेनाइड्स के लेखों में कभी-भी ईश्वर नहीं कहा गया है, क्योंकि ऐसा होने पर पार्मेनाइड्स एक शुद्ध एकात्मवादी माने जायेंगे । प्रत्यवादी व्याख्या यूनानियों की चिन्तन परम्परा से मेल नहीं खाती, क्योंकि वे दार्शनिक रूप से यथार्थवादी थे । भौतिकवादी सिद्धान्त भी स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यहां सत् आयोनी दार्शनिकों का आर्क नहीं है । तार्किक व्याख्या को भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि वह ( पार्मेनाइड्स ) तार्किक निर्णय से सत् को खोजने का काम नहीं कर रहे थे । 

अपरिवर्तन का सिद्धान्त 

         परर्मेनाइड्स के अनुसार, यह कैसे संभव है की कोई चीज़ है भी और नहीं भी । किस प्रकार कोई एक वस्तु दूसरी में परिवर्तित हो सकती है ? किस प्रकार एक गुण दूसरा गुण बन सकता है ? यदि ऐसा सम्भव हो सकता है, तो हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि कोई वस्तु है और नहीं भी है । साथ ही इसका अर्थ यह भी है कि कोई वस्तु शून्य में से आ सकती है और स्वयं शून्य भी बन सकती है । पार्मेनाइड्स कहते हैं, "यह कभी सिद्ध नहीं किया जा सकता है कि वस्तुऐं जो नहीं हैं, वो हैं ।" तथापि अ-परिवर्तन के सिद्धान्त की तार्किक परिणाली यही है । जिन वस्तुओं का कोई अस्तित्व नहीं है, वे शून्य हैं । शून्य का अर्थ है- 'असत्' । यदि उनका अस्तित्व नहीं है, तो हम यह कैसे सिद्ध कर सकते हैं कि वे हैं ? इसका उत्तर नहीं में है और यह असंभवता है । असंभवता सदैव असंभवता रहती है, यह कभी भी संभवता नहीं बन सकती । 

अविनाशिता का सिद्धान्त 

         सत् अस्तित्वमान न हो यह तार्किक असम्भवता है अथवा जैसा कि फ्रेगमेन्ट 11  में कहा गया है "उस ( सत् ) के लिए न होना संभव नहीं है" । अरस्तूवादी अव्यघातता का सिद्धान्त कहता है कि यदि 'सत्' है (जो नहीं भी हो सकता है), तो वह आवश्यक रूप से है । पार्मेनाइड्स के अनुसार अविनाशिता के सिद्धान्त के आधार पर 'सत्' आवश्यक रूप से अस्तित्वमान है । इसलिए पार्मेनाइड्स ने सत की अ-परिवर्तनीयता पर बल दिया है । जहां तक उन्होंने 'सत्’ ( होने ) को भौतिक रूप में माना है, उन्होंने तत्व की अविनाशिता पर जोर दिया है । अतः पार्मेनाइड्स ने कहा कि 'सत्’ की न तो उत्पति होती है और न ही अंत होता है तथा यही तत्व की अविनाशिता है । सत् स्वयं में पूर्ण सत् है, जिसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता है । यदि यह विभाज्य है तो इसे किसी और से विभाजित होना पड़ेगा । परन्तु सत् के अतिरिक्त कोई दूसरा विद्यमान नहीं हो सकता है । इसका अर्थ है कि 'सत्' के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । इसमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता है, क्योंकि इसमें जो कुछ भी जोड़ा जायेगा, वह भी 'सत्' ही होगा । इस प्रकार सम्भवन अर्थात परिवर्तन का निषेध हो जाता है । 

सत् और असत् ( भाव और अभाव ) 

         अभिव्यक्ति का दूसरा तरीका यह है कि यदि सत् सम्भवन है, तो वह या तो 'सत्' से या 'असत्' से आया है । यदि 'असत्' से, तो यह शून्य से आया है जो कि असंभव है, क्योंकि भाव के अतिरिक्त अभाव की सत्ता सम्भव नहीं है । मेटाफिजिक्स में अरस्तू ने इस पर टिप्पणी की है कि पार्मेनाइड्स के अनुसार सत् को अनिवार्यतः एक ही होना पड़ेगा ताकि उसके अतिरिक्त वह कुछ ओर न हो । इस मामले पर अरस्तू ने स्पष्ट रूप से अपने कार्य फिजिक्स में तर्क किया है कि यदि यह ( अभाव ) भाव से उत्पन्न है तो यह स्वयं से ही आया है । यह ऐसा कहने जैसा है कि यह स्वयं के समान है और इसलिए यह सदा से उपस्थित रहा है । पार्मेनाइड्स ने इससे निष्कर्ष निकाला कि "सभी अस्तित्वमान वस्तुऐं एक है और यह ( एक ) 'सत्’ है", यह तादात्मयता का सिद्धान्त है । अतः केवल एक ही शाश्वत्, अ-व्युत्पन्न, अपरिवर्तनीय 'सत्' हो सकता है और इस सत को अनिवार्यतः सतत् अवभिाज्य और अपरिवर्तित होना चाहिए । 

सत् और विचार 

         'सत्' और 'विचार' एक ही हैं, क्योंकि जो सोचा नहीं जा सकता है, वह अस्तित्वमान भी नहीं हो सकता है और जो नहीं हो सकता है अर्थात् 'असत्' है, उसे सोचा भी नहीं जा सकता है । अर्थात् 'विचार' और 'सत्' समान है । जो कुछ भी विचार योग्य है, उसमें सत् है । पार्मेनाइड्स का संभवतः यह भी मानना था कि सत् और विचार उसी रूप में उपस्थित है जैसे कि सत् मन से संपन्न है । यह दर्शाता है कि "विचार और विचार का कार्य एक समान है, क्योंकि विचार 'सत्', जिसमें इसे अभिव्यक्त किया जाता है, के बिना नहीं मिल सकता । वास्तव में विचार सत् ही है और इसके परे कुछ नहीं है" (फ्रेगमेन्ट बी 8) । 

सत् और भ्रम 

         सभी परिवर्तन अग्राहीय है और इसलिए इन्द्रिय जगत् एक भ्रम है । प्रत्यक्ष जगत को सत्य मानना असत् को सत् मानने जैसा है । पार्मेनाइड्स बुद्धि में दृढ़ विश्वास रखते हैं । उनका मानना है कि सत् से तात्पर्य तर्क का अनुसरण करना है और जो भी विचार का विरोधी है वह सत् नहीं हो सकता है । “उन्होंने यह दावा नहीं किया कि 'सत्' विचार है, बल्कि यह कहा कि सत् को विचार द्वारा ही समझा जा सकता है ।" यदि यह बुद्धिपरक सत् पार्मेनाइड्स के लिए ज्ञान है तो उनके शुभ की अवधारण भी बुद्धि आधारित ही सिद्ध होती है । यह निश्चित है कि कुछ न कुछ बौद्धिक तत्व निश्चित रूप से उनकी एगेथोस ( शुभ ) की अवधारणा को पूरा करता है और अरस्तू के नैतिक सद्गुण की अपेक्षा बौद्धिक गुण के नियंत्रण के बहुत निकट प्रतीत होता है ।

पार्मेनाइड्स के प्रमुख दार्शनिक कथन 

  • सत् विज्ञानरूप है । 
  • सत् व्यवहार का मार्ग है । 
  • इन्द्रिय जगत एक भ्रम है । 
  • शुद्ध सत् शुद्ध चित्त भी है । 
  • सत्ता और बोध एक ही है । 
  • गति या परिवर्तन भ्रांति है । 
  • शुद्ध सत् परमार्थ का मार्ग है । 
  • तत्व सत् है परिणाम या गति नहीं । 
  • सत् सदा समरस या एक सा रहता है । 
  • सत् निरपेक्ष, पूर्ण, स्वयम्भू और नित्य है । 
  • जो कुछ है "है", जो "है नहीं" उसे जाना नहीं जा सकता  
  • तत्व शुद्ध सत्ता है । वह एक, अद्वितीय, नित्य, अपरिणामी, अविनाशी और कूटस्थ है । 
  • सृष्टि का मूल आधार एक अपरिवर्तनशील, अद्वितीय, अविनाशी और कूटस्थ विशुद्ध सत्ता है । 
  • रिक्तता सम्भव नहीं क्योंकि रिक्त स्थान असत् होगा इसलिए इसका अस्तित्व नहीं । 


----------

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

पार्मेनाइड्स ( Parmenides ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 540 ई० पू० से 480 ई० पू० 

प्रमुख दार्शनिक विचार - "तत्व सत् है परिणाम या गति नहीं" 

प्रमुख उपाधि - यूरोपीय विज्ञान का संस्थापक 

प्रमुख कथन - तत्व शुद्ध सत्ता (Pure Being) है । वह एक, अद्वितीय, नित्य, अपरिणामी, अविनाशी और कूटस्थ है ।  

       पार्मेनाइड्स यूनानी दर्शन के एलियाई परम्परा के दार्शनिक थे । उन्होंने ही 'सम्भवन' ( गति ) की अवधारणा के विरोध में 'सत्' ( स्थिति ) की अवधारणा को विकसित किया । इनका समय ईसा पूर्व पाँचवी शताब्दी रहा है । प्लेटों के अनुसार, जब एथेन्स में इनका वार्तालाप सॉक्रेटीज से हुआ तब इनकी अवस्था 65 वर्ष की थी । पार्मेनाइड्स ने एक कविता में अपनी दार्शनिक कृति लिखी है जिसमें ये स्वर्ग पहुँचते है और वहाँ एक देवी इनको सत्य का दर्शन करती है। 

     पार्मेनाइड्स का दर्शन हेरेक्लिाइटस के क्षणिकवाद के खण्डन से प्रारम्भ होता है और सत् को एक, अद्वितीय, नित्य, अपरिणामी, अविनाशी और कूटस्थ के रूप में स्थापित कर एक विशुद्ध विज्ञान के रूप में स्थापित करता है । इनका यह दर्शन "व्यवहार का मार्ग" (Way of Opinion) के नाम से भी जाना जाता है । इसलिए पार्मेनाइड्स को यूरोपीय विज्ञानवाद का संस्थापक भी माना जाता है । 

------------------


Friday, May 13, 2022

पाइथागोरस ( Pythagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न

पाइथागोरस ( Pythagoras ) के दर्शन पर आधारित वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1- इनमें से किसने आत्मा के आवागमन सिद्धान्त को स्वीकार किया है ?

  1. थेल्स 
  2. एनेक्जागोरस 
  3. अनाक्जमेनीज 
  4. पाइथागोरस 

2- इनमें से किसने संख्या को सृष्टि की उत्पत्ति का मूल आधार माना है ?

  1. पाइथागोरस 
  2. थेल्स 
  3. हेराक्लिट्स
  4. इनमें से कोई नहीं 

3- पाइथागोरस के अनुयायियों के अनुसार विश्व का केन्द्र है -

  1. पृथ्वी 
  2. सूर्य 
  3. अग्नि 
  4. जल 

4- "शरीर आत्मा का बंदीगृह है" - यह कथन किसका है ?

  1. पार्मेनाइडीज 
  2. पाइथागोरस 
  3. हेराक्लिट्स 
  4. थेल्स 

5- पाइथागोरस के दर्शन के अनुसार निम्नलिखित में से कौन सुसंगत नहीं है ?

  1. आत्मा का आवगम सिद्धान्त चिरस्थाई है । 
  2. सम एवं विषम क्रमशः असीमित एवं सीमित से सम्बन्धित है । 
  3. शरीर पूर्णजन्म का बंदीगृह है । 
  4. मानव आत्मा एक दैवी सम्पदा है । 

6- निम्नलिखित में से किसका विचार है कि 'पदार्थ, पदार्थ है क्योंकि उनकी गणना की जा सकती है' -

  1. पाइथागोरस  
  2. एनेक्जागोरस 
  3. एम्पेडोक्लीज 
  4. डेमोक्रेट्स 

7- निम्नलिखित कथनों पर पाइथागोरस के दृष्टिकोण से विचार करें और सही कूट का चयन करें । 

  1. पाइथागोरस शाश्वत पुनः आवर्तन की अवधारणा में विश्वास रखता था । 
  2. पाइथागोरस का विचार था कि आत्मा अमर है और इसका पुनर्जन्म होता है । 
  3. पाइथागोरस ने इस विचार को अस्वीकृत किया कि विश्व की प्रक्रिया अंतहीन और अपरिवर्तनीय है । 
     कूट 
  1. केवल 1 
  2. केवल 2 
  3. 1 और 3 
  4. 1 और 2 

8- 'तीन श्रेणी के मनुष्य - बुद्धि के प्रेमी, सम्मान के प्रेमी और अर्जन के प्रेमी' - सिद्धान्त प्रतिपादित किया ?

  1. पाइथागोरस ने 
  2. हेराक्लिट्स ने 
  3. अरस्तू ने 
  4. ल्यूसिपस् ने 
--------------

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का दर्शन

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का दर्शन 

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का दर्शन 

नैतिक संस्था

      पाइथागोरस के समय के समाज में धार्मिक पुनरुद्धार की प्रबल भावना थी । अतः उनसे वास्तविक धार्मिक शिक्षाएं प्रदान करने की शुरूआत हुई । पाइथागोरस ने नैतिक, धार्मिक और राजनैतिक उद्देश्य के लिए एक संस्था की स्थापना की । उनका उद्देश्य अपने अनुयायियों के बीच राजनैतिक सद्गुणों को विकसित करना था, जिससे उन्हें राष्ट्र की भलाई की शिक्षा दी जा सके और वे अच्छी प्रजा बन सके । इसके लिये व्यक्ति को स्वयं पर नियंत्रण रखना, अपने मनोविकारों का दमन करना, अपनी आत्मा के साथ सामंजस्य करना सीखना चाहिए । उसके मन में अपने बड़ों, शिक्षकों और राष्ट्र के लिए सम्मान होना चाहिए । इसी कारण यह धारण बनी कि पाइथागोरियन मात्र एक राजनैतिक समुदाय था । लेकिन पाइथागोरियन अनिवार्य रूप से राजनैतिक नहीं बल्कि धार्मिक या नैतिक थे । उनकी शिक्षा का मुख्य अभिप्राय उन धार्मिक-सन्यासी विचारों से था जो शुद्ध और शुद्धता पर आधारित थे । 

आत्म विचार 

     पाइथागोरसवादियों ने मानव-आत्मा को प्राण आत्मा के उस रूप में देखा जो व्यक्ति के पहले शरीर की मृत्यु के बाद भी रहती है और फिर दूसरे मानव या जंतु शरीर में प्रवास करती है । आत्माओं के पुर्नजन्म या देहांतरण का यह सिद्धान्त नैतिक रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आगामी पुर्नजन्मों में अच्छे कार्यों के लिए पुरुस्कार और बुरे कर्मों के लिए सजा का प्रावधान करता है । उन्होंने आत्मा के मृदुकरण के लिए मौन, संगीत और गणित की शिक्षा दी । हम निश्चित रूप से यह नहीं कह सकते हैं कि ये सभी शिक्षाएं पाइथागोरस की है अथवा उसके अनुयायियों द्वारा दी गई हैं । डायोजीन्स, लेशियस, जीनोफेन्स की उस कविता के बारे में बताते हैं जिसमें पाइथागोरस ने किसी व्यक्ति को कुत्ते को मारता हुआ देखकर उसे कुत्ते को मारना बंद करने के लिए कहा, क्योंकि उन्हें उस कुत्ते की चीत्कार में किसी मित्र की आवाज का अनुभव हुआ था । यह पुनर्जन्म की शिक्षा को मजबूती से प्रस्तुत करता है । अतः उन्होंने शरीर को नहीं बल्कि आत्मा को महत्व दिया । इसीलिए उन्होंने अपने जीवन में आत्मा के शुद्धीकरण और आत्मा के प्रशिक्षण पर जोर दिया । यह कहा जाता है कि ऐसा उनके ओरफियसवाद ( orphicism ) से प्रभावित होने के कारण था, जो कि वस्तुतः दर्शन की अपेक्षा एक धर्म था और उसका झुकाव सर्वेश्वरवाद की ओर था । यह मात्र विश्वविज्ञान का कोई पूर्वानुमान न होकर एक जीवनपद्धति भी थी । इस अर्थ में पाइथागोरस के अनुनायियों ने ऑफियसवाद से कुछ बातों को ग्रहण अवश्य किया था । 

विपरीतों का सिद्धान्त 

       पाइथागोरस के अनुयायियों ने विपरीतों का सिद्धान्त भी विकसित किया जिसमें ससीम और असीम मुख्य जोड़ा था । उन्होंने ससीम को किसी वस्तु के निश्चित और मापनीय गुण के रूप में समझा तथा असीम उसे समझा जो पाइथागोरस के अनुसार परिभाषा और मापन के प्रयासों के विरूद्ध था । असीम का उनका मानक ज्यामितीय उदाहरण किसी आयत का विकर्ण था । इसके अनुसार महज पार्श्व भागों के संदर्भ में विकर्ण की लंबाई को व्यक्त करना असंभव है । 

नैतिक सिद्धान्त 

      नैतिक समस्याओं को समझने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण प्रस्थान बिन्दु यह है कि 'शुभम' को उचित और बुद्धिमत्तापूर्ण अतः, चौथी शताब्दी ई.पू. में, एक बाद के पाइथागोरियन टारेन्टम के आर्कीटस ने सबसे पहले यह प्रतिपादित किया कि 'उचित तर्क' अच्छे व्यवहार की कुंजी है । उन्होंने यह भी कहा कि "सही समझ का पता चल जाने पर यह नागरिक संघर्ष को रोक देता है और मेलमिलाप को बढ़ा देता है ... (यह) एक मानक है जो गलत करने वालो को रोकता है।" वास्तव में नैतिक निर्णय के रूप में उचित तर्क (रेक्टा राशा) का अरस्तुवादी और मध्ययुगीन सिद्धान्त पाईथागोरियन बौद्धिकता का प्रत्यक्ष रूप से ऋणी है । प्राचीन यूनान में तर्क पूर्ण (लोगोस) जीवन का अत्यधिक सम्मान किया जाता था । अरस्तू के नीतिशास्त्र की रचना मानव-आत्मा की बुद्धिमता के महत्व से ही की गई है । पाइथागोरस के 'शुभ' की अवधारणा के कारण ही होमर के 'शुभ' का, इसके सभी गुणों के साथ, बौद्धिकीकरण किया गया और उसे दर्शन के स्तर पर स्थापित किया गया । 

संख्या की अवधारणा 

      अरस्तू अपने लेखन 'मेटाफिजिक्स' में पाइथागोरस के अनुयायीयों को गणित के प्रति समर्पित बताते हैं । वे पहले लोग थे जिन्होंने इस अध्ययन की शुरूआत की । पाइथागोरस की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा यह है कि सभी वस्तुओं का मूल तत्व संख्या है । संख्या सभी वस्तुओं का आधार है और ब्रहमांड का सिद्धान्त है । उन्होंने ब्रहमांड को संख्याओं की अवधारणा से समझाया । सभी वस्तुएँ गणनीय हैं और हम अनेक वस्तुओं को सांख्यिकीय रूप से व्यक्त कर सकते हैं । इसलिए दो संबन्धित वस्तुओं के बीच संबन्ध को गणनीय अनुपात के अनुसार प्रदर्शित किया जा सकता है । जिस प्रकार संगीत के सुर संख्या पर निर्भर है, उसी प्रकार ब्रहमांड का सामंजस्य संख्या पर निर्भर है । विश्व सिर्फ व्यवस्था, सौंदर्य और तंत्र नहीं, बल्कि बुद्धिमत्तापर्ण और बहु अनुपातों या संख्याओं का संबन्ध है । फिलोलॉस ने इसे निम्न शब्दों में सही तरीके से व्यक्त किया है, "प्रत्येक ज्ञात वस्तु के मूल के में संख्या है और इसके (संख्या के) बिना कुछ भी सोचा या ज्ञात नहीं किया जा सकता है .... असत्य कभी भी संख्या तक नहीं पहुच सकता है, क्योंकि संख्या की प्रकृति असत्यता की विरोधी है, जबकि सत्य संख्या के साथ उपयुक्त और स्वभाविक रूप से मेल खाता है। प्रेम, मित्रता, न्याय, गुण, स्वास्थ्य आदि संख्याओं पर चित्रित है । प्रेम और मित्रता की गणना आठ की संख्या से की जाती है, क्योंकि इनमें समन्वय है और अष्टक में भी समन्वय है”। 

पाइथागोरस ने संख्याओं को देशीय ( Spatially ) रूप में माना है । बिन्दु एक संख्या को, रेखा दो को, सतह तीन को तथा ठोस चार संख्या को प्रदर्शित करता है । अब यह कहना कि 'सभी चीजें संख्याएं हैं', का अर्थ होगा कि अंतरिक्ष में सभी पिंड बिंदु या इकाई है, जो एक साथ मिलकर संख्या बनाते हैं । अतः बिंदु, रेखाएं और सतह वास्तविक इकाईयां है जो प्रकृति के समस्त तात्विक पिंडो को बनाती है और इस अर्थ में सभी तात्विक पिंडों को संख्या समझना चाहिए । उनका मानना था कि वस्तुएं संख्या की प्रतियां या नकल है । ब्रहमांड की पूरी परिघटना को संख्याओं के तहत् अभिव्यक्त किया जा सकता है ।

पाइथागोरस ( Pythagoras )  के प्रमुख कथन 

  • शरीर आत्मा का बंदीगृह है । 
  • संख्या सृष्टि का मूल आधार है । 
  • मानव आत्मा एक दैवी सम्पत्ति है । 
  • संख्या ब्रह्माण्ड का आधारभूत स्रोत है । 
  • आत्मा का आवागमन सिद्धान्त चिरस्थाई है । 
  • पदार्थ, पदार्थ है क्योंकि इसकी गणना की जा सकती है । 
  • सम एवं विषम क्रमशः असीमित एवं सीमित से सम्बन्धित है । 
  • तीन श्रेणी के मनुष्य होते है - बुद्धि के प्रेमी, सम्मान के प्रेमी और अर्जन के प्रेमी ।   

-------- 



पाइथागोरस ( Pythagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां

 

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

पाइथागोरस ( Pythagoras ) का जीवन परिचय एवं उपलब्धियां 

दार्शनिक जीवन - 580 ई.पू. से 497 ई.पू.

प्रमुख दार्शनिक विचार - संख्या सभी वस्तुओं का आधार है और ब्रहमांड का सिद्धान्त है ।

प्रमुख उपाधि - संख्या का जनक 

प्रमुख कथन - सभी वस्तुओं का मूल तत्व संख्या है ।

         आयोनी दर्शन पाइथागोरस के कार्य द्वारा दक्षिण इटली में पहुंचा । सामोस के पाइथागोरस, पाइथोगोरसीय दार्शनिक परम्परा के संस्थापक थे । उनका जन्म सामोस में 580 और 570 ई.पू. के बीच हुआ था । वह वर्ष 529 ई.पू. के आसपास दक्षिण इटली में यूनानी कोलोनी में चले गए थे । एम्ब्लीकस मानते थे कि पाइथागोरस दिव्य दर्शन शास्त्र के जनक और मार्ग दर्शक थे । वी. कापेरेली ने लिखा है कि ‘पाइथागोरस का दर्शन, ज्ञान के साथ प्रबल धार्मिक भावना का मिश्रण है’ । अनैक्सीमिनिज के दर्शन पर उनकी निर्भरता स्पष्ट । वे मानते हैं कि ब्रहमांड एक पवित्र वृत्त है, जिसके केन्द्र में दिव्य शाश्वत् अग्नि या न्यूमा है, जो केंन्द्र में स्पंदन कर रहा है और सभी चीजों को ब्रहमांडीय श्वांस से अनुप्राणित कर रहा है । 

     नव-पाइथागोरियनों ने केन्द्रीय अग्नि की पहचान यूनानी जेयुस अथवा आदि देव ओलम्पस, केस्ल ऑफ जेयुस आदि से की है । अग्नि यहां एकता के कारक के रूप में है, जिससे हर वस्तु की उत्पति हुई है । उन्होंने ब्रहमांडविज्ञान, मानवविज्ञान और नैतिकशास्त्र पर अपना ध्यान केन्द्रित किया । 

-------------

आयोनियन्स ( Ionians ) दर्शन

आयोनियन्स ( Ionians ) दर्शन 

आयोनियन्स ( Ionians ) दर्शन 

           आयोनियन्स ( Ionians ) यूनान में स्थापित एक प्रमुख दार्शनिक सम्प्रदाय एवं दार्शनिक स्कूल था । इसका केन्द्र यूनान में मिलेटस नामक स्थान था । आयोनियन्स स्कूल ने सर्वप्रथम दर्शन को एक तार्किक और वैज्ञानिक पद्धति के रूप में स्थापित किया । थेल्स, अनेक्जागोरस और अनाक्जमेनीज को प्रारम्भिक आयोनियन्स ( Ionians ) दार्शनिक माना जाता है। इनके बाद जीनोफेन्स और एम्पेडोकुल्स को इस दार्शनिक सम्प्रदाय के मुख्य दार्शनिकों में माना जाता है । दोनों दार्शनिकों ने सृष्टि की एकतत्त्ववादी व्याख्या की । जीनोफेन्स ने जल और मिट्टी को सृष्टि के मूल तत्त्व के रूप में माना जबकि एम्पेडोकुल्स ने जल, अग्नि, वायु और मिट्टी को मूल तत्व के रूप में स्वीकार किया । 

----------- 

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन

अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  अरस्तू ( Aristotle ) का दर्शन  तर्क शास्त्र           अरस्तू तर्क शास्त्र के क्षेत्र के वास्तविक अन्वेषक थे ।...