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| एनेक्जागोरस ( Anaxagoras ) का दर्शन |
एनेक्जागोरस ( Anaxagoras ) का दर्शन
अनैक्सागोरस ने एम्पीडोकल्स की भांति पार्मेनाइड्स की पद्धति को अपनाते हुए यह माना कि "सत् स्थायी होता है" । इसका अर्थ है कि सत् से न तो सत् निकलता है और न ही असत्, बल्कि यह अपरिवर्तित रहता है । परन्तु अनैक्सागोरस एम्पीडोकल्स की इस दार्शनिक मान्यता से सहमत नहीं थे कि मूल तत्व अनेक हैं, जैसे - पृथ्वी, वायु, अग्नि और जल । उनके अनुसार, प्रत्येक विभाज्य वस्तु, जो गुणात्मक रूप से पूर्ण के समान हैं, वह परम और अव्युत्पन्न है । उदाहरण के लिए, चांदी के एक टुकड़े को दो भागों में बाट दिया जाये तो दूसरे टुकड़े में भी पहले टुकड़े के गुण होंगे । यहां भाग भी पूर्ण के समान होगा । वे वस्तुएं, जिनके भाग किए जाने पर उनके गुण भी वही होते हैं जो पूर्ण के होते हैं, परम और अव्युत्पन्न होते हैं । ये वस्तुएं अनेक गुणात्मक रूप से भिन्न कणों का मिश्रण होती हैं । अनैक्सागोरस के अनुसार कोई कण अकेला नहीं होता है बल्कि सभी प्रकार के कण एक साथ होते हैं और ये अविभाज्य होते हैं । लेकिन वास्तव में कुछ कण प्रभावी होते हैं एवं उन्हीं प्रभावी कणों के गुणों के आधार पर कोई वस्तु सोना और कोई चांदी बनती है । उन्होंने आगे कहा "प्रत्येक दूसरी वस्तु में प्रत्येक वस्तु का भाग होता है ।"
इस प्रकार अनैक्सागोरस ने परिवर्तन और स्थायित्व की अवधारणा को समझाने का प्रयास किया । यदि हम उन्हें सही माने तो यह समझाना आसान है कि मांस वनस्पति से आ सकता है और वनस्पति मांस से । अर्थात एक प्रकृति की वस्तुओं से पूर्णरूप से भिन्न प्रकृति की कोई भी वस्तु उत्पन्न हो सकती है ।
प्रयोजनवाद
प्रयोजनवाद का विचार सर्वप्रथम अनैक्सागोरस के दर्शन में देखने को मिलता है । उन्होंने बढ़ी कुशलता से इसका विश्व व्यवस्था की विशिष्टता और पूर्णता के साथ संबन्ध स्थापित किया । उन्होंने जगत् की समस्त जटिल प्रक्रिया, जैसी यह वर्तमान में दिखाई देती है, को अनिवार्य मूल परिवर्तन चक्र से उत्पन्न लम्बी परिवर्तनों की श्रृंखलाओं का परिणाम माना । आरंभिक गति के लिए उन्होंने एक बौद्धिक सिद्धान्त 'बुद्धि' ( Nous ) को कारक के रूप में प्रस्तुत किया । नाउस एक स्वायत्त सक्रिय सत् है, जो जगत् में समस्त गति और जीवन का मुक्त स्रोत है । नाउस या बुद्धि अनैक्सागोस का दर्शनशास्त्र को एक विशेष योगदान है । नाउस उन सभी छोटी और बड़ी चीजों पर नियंत्रण करता है, जिनमें जीवन है । यह समस्त चक्रण का नियंत्रण कर रहा है और इसने शुरूआत में ही परिक्रमा आरंभ कर दी थी । नाउस एक प्रयोजनवादी या उद्देश्यपरक सिद्धान्त है ।
नैतिक सिद्धान्त
अनैक्सींगोरस की कोई औपचारिक नैतिक शिक्षाएं नहीं थी, लेकिन उन्होंने यूनानी दार्शनिक अध्ययनों में बुद्धि या नाउस की अवधारणा प्रस्तुत की । उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि "बुद्धि अनन्त और स्वचालित है और इसमें कुछ भी मिश्रित नहीं है , बल्कि यह स्वयंभू है ।"
अरस्तू ने अनैक्सागोरस की उनके विचारों की सौम्यता के लिए सराहना की, लेकिन ब्रहमांडीय घटनाओं को समझाने में संगत रूप से नाउस का उपयोग नहीं कर पाने के कारण उनकी आलोचना भी की । यह संभव है कि अनैक्सागोरस की नाउस की अवधारणा ने मानव आचरण के मानसिक पहलुओं की चर्चा करने में अरस्तू की सहायता की हो । कभी - कभी अनैक्सागोरस ने बुद्धि को सभी वस्तुओं में सबसे जटिल तथा रहस्मयी कहा है । इस प्रकार वह इसे एक प्रकार का तत्व घोषित करते प्रतीत होते हैं । नाउस को रचनात्मक तत्व के रूप में नहीं मानना चाहिए । परन्तु यह सर्वव्यापी और परात्पर है । नाउस सभी सजीवों में पाया जाता है । सजीवों के भौतिक शरीरों में अनिवार्य रूप से अन्तर होते हैं , लेकिन उनकी आत्माओं में कोई अन्तर नहीं होता । यद्यपि , अनैक्सागोरस ने मानव चेतना में स्वतंत्र स्वः होने को स्वीकार नहीं किया । उनके नाउस के सिद्धान्त को लेकर एक उलझन विद्यमान है कि यह ईश्वरवादी है या सर्वेश्वरवादी है । अरस्तू ने यह कहते हुए उनकी आलोचना की है कि "अनैक्सागोरस केवल तब-तब 'नाउस' को लेकर आते हैं जब जब वह सत् की यान्त्रिक व्याख्या करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं" ।
एनेक्जागोरस के दर्शन पर आधारित महत्वपूर्ण कथन
- सत् स्थाई होता है ।
- नाउस परम विज्ञान है ।
- प्रत्येक दूसरी वस्तु में प्रत्येक वस्तु का भाग होता है ।
- नाउस उन सभी छोटी और बड़ी चीजों पर नियंत्रण करता है, जिनमें जीवन है ।
- बुद्धि अनन्त और स्वचालित है और इसमें कुछ भी मिश्रित नहीं है, बल्कि यह स्वयंभू है ।
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