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थेल्स ( Thales ) का दर्शन

थेल्स ( Thales ) का दर्शन 

थेल्स ( Thales ) का दर्शन 

    थेल्स को अरस्तू एक सन्त कहकर पुकारते थे क्योंकि वे उस समय के महान सात सन्तो में से एक थे। अरस्तू ने थेल्स को दर्शनशास्त्र का आरम्भकर्ता माना है। थेल्स पहले आयोनी दार्शनिक थे जिन्होंने ब्रह्माण्ड के मूल तत्व के कारण के बारे में स्वयं को समर्पित किया था। थेल्स ने ब्रह्माण्ड का मूल तत्व जल को माना क्योंकि जल ठोस, द्रव और वाष्प तीनों रूपों में बदल सकता है। जल के कारण बीज का पोषण होता है जो कि जीवन के लिए अनिवार्य है। उनका मानना था कि पृथ्वी जल पर तैरने वाली एक सपाट डिस्क है। अतः जल सभी वस्तुओ का कारक है ।

थेल्स के दर्शन का आधार उसके तीन पूर्वानुमान थे-

  1. उनका मानना था कि ब्रह्माण्ड को मौलिक व्याख्या किसी एक आधारभूत तत्व से ही सम्भव है। ब्रह्माण्ड के रहस्य के पीछे दो सत्तायें नहीं हो सकती। प्रकृति का नियन्त्रण करने वाला तत्व एक ही होना चाहिए।
  2. यह एक मात्र सत् अवश्य ही कोई तत्व होना चाहिए। इस एक सत् को अवश्य ही निश्चित भी होना चाहिए। यह निश्चित तत्व जल है, जो प्रत्येक वस्तु में पाए जाने की क्षमता रखता है।
  3. एस एक तत्व में स्वयं में गतिमान और परिवर्तित होने की क्षमता होनी चाहिए।

    इस प्रकार उपरोक्त इन तीन अनुमानों के आधार पर उन्होंने जीव की अनेकता (फिजिस) और एकता (आर्क) पर एक विशिष्ट सिद्धान्त दिया जिसे थेल्स का दर्शन कहा जाता है। अरस्तू ने डी एनीमा (De Anima) में थेल्स के विषय में लिखा है- “थेल्स का मानना है कि "सभी वस्तुओं में ईश्वर है" और इसलिए फिजिस अपने अस्तित्व और परिवर्तन दोनों रूपों में दिव्य है। हमरे पास जो है वह महज प्राथमिक प्रतिबिम्ब स्वरूप है लेकिन यह दार्शनिक निहितार्थों से पूर्ण है।" फिजिस अर्थात अनेकता तत्व की परिवर्तन की क्षमता है और आर्क अर्थात एकता उसका सभी पदार्थों में अस्तित्व होना है। यह दोनों गुण केवल जल में दिखाई देते है। अतः जल ही सृष्टि के मूल में हो सकता है। इसी कारण थेल्स ने कहा कि- "Water is the arche" अर्थात "जल ही आर्क है"। यही थेल्स का दर्शन है।  


थेल्स के दर्शन पर आधारित महत्वपूर्ण कथन 

  • पृथ्वी एक सपाट डिस्क है जो जल पर तैरती है । 
  • सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जल से घिरा है । 
  • जल ब्रह्माण्ड का आधारभूत स्रोत है । 
  • सभी वस्तुओं में देवता भरे हुए है । 
  • सर्वात्मवाद का आधार ज्यामिति है जिसके अनुसार प्रत्येक तत्त्व में चैतन्य का वास होता है । 
  • चुम्बक में आत्मा है क्योंकि चुम्बक अन्य वस्तुओं को हिलाने की क्षमता रखती है । 


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